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राजनेताओं के सर चढ़कर बोलता है सत्ता का नशा

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  November 01, 2019

हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे आने शुरू हो चुके थे जब वहां से ताल्लुक रखने वाले एक उबर ड्राइवर ने मुझसे कहा था, 'अहंकार, मैडम...बहुत अहंकार आ गया है इनमें।' धीरे-धीरे यह साफ हो गया कि 90 में से 75 सीटों पर जीत हासिल करना तो दूर, भारतीय जनता पार्टी को राज्य में सरकार बनाने के लिए गठबंधन साझेदार की तलाश तक करनी पड़ी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सन 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस के बारे में कहा था कि उसका अहंकार ही उसे ले डूबेगा। उनका कहना सही था। 

 
लोग सार्वजनिक बेइज्जती को कभी क्षमा नहीं करते। तब तो बिल्कुल भी नहीं जब कि उन्होंने अपने नेताओं को चुनावी जीत दिलाकर ऊंचे पायदान पर बिठाया हो। वे चीजों को देखते हैं, दर्ज करते हैं और अपने मस्तिष्क में रखते हैं। कुछ ऐसी घटनाएं हैं जिन्होंने शायद अलग-अलग समय पर भूमिका निभाई हो लेकिन एक सामूहिक धारणा यह बनी है कि ताकतवर लोगों को एक हद तक जमीनी हकीकत से रूबरू कराने का वक्त है। कांग्रेस उस वक्त सत्ता में थी और एक विदेश मंत्री जिन्हें पार्टी में बहुत सम्मान हासिल था और जो अपने गुस्से के लिए जाने जाते थे, वह एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करने की तैयारी कर रहे थे। रस्मी तौर पर पत्रकारों के बीच बांटने के लिए कुछ सामग्री तैयार की गई थी। मंत्री ने बोलना शुरू किया और उनके निदेशक (जो एक कड़ी परीक्षा पास करके और एक कठिन साक्षात्कार से गुजरकर इस पद पर पहुंचे थे) ने वह सामग्री बांटनी शुरू कर दी। कागज की खडख़ड़ाहट और हलचल ने मंत्री का ध्यान बंटाया। मंत्री नाराज हो गए और गाली देते हुए कहा कि अधिकारी से किसने उक्त सामग्री वितरित करने को कहा? अधिकारी का चेहरा जर्द पड़ गया। संवाददाता इस प्रकरण को देखते रहे। कुछ दिलचस्पी से तो कुछ अन्य सहानुभूति के साथ। अधिकारी ने कागजात वापस बटोरे और कमरे से चला गया। 
 
ऐसी बेशुमार कहानियां हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल में एक मंत्री प्रधानमंत्री के पास पहुंचे और उनसे कहा कि उनका मंत्रालय बदल दिया जाए क्योंकि अधिकारी उनके साथ सहयोग नहीं कर रहे। वाजपेयी ने नकारते हुए कहा कि किसी भी आदमी को उन उपकरणों से नहीं लडऩा चाहिए जिनका इस्तेमाल किया जाता है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल की एक मंत्री ने अतिथियों की मौजूदगी में अपने चौथे माले पर स्थित कार्यालय की खिड़की से बाहर झांकते हुए अपने सचिव (अत्यंत अनुभवी लेकिन अडिय़ल आईएएस अधिकारी) से कहा, 'अगर मैं आपको इस खिड़की से बाहर फेंक दूं तो क्या होगा? क्या कोई खबर बनेगी?' अधिकारी ने किसी तरह विनम्र बने रहने की कोशिश की और फुसफुसाकर कुछ कहा। इसके बाद मंत्री महोदया ने अतिथियों से पूछा कि उन्हें क्या करना चाहिए? क्या अधिकारी को फेंक देना चाहिए? बहरहाल अतिथियों ने विषय बदला और अधिकारी कक्ष से बाहर चले गए।
 
मौजूदा सरकार में भी ऐसे तमाम किस्से हैं। एक मंत्री ने अपने नए मंत्रालय में कार्य भार संभालने के बाद अधिकारियों के साथ बैठक आयोजित की। नए मंत्री से जान-पहचान कायम करने की कोशिश में तमाम अधिकारी वहां पहुंचे। मंत्री ने कहना शुरू किया, 'यदि मैं कहूं कि मुझे लगता है कि आयात देश के लिए अच्छा नहीं है और उसकी इजाजत नहीं होनी चाहिए, तो क्या कोई ऐसा है जो इस बात से असहमत होगा?' एक अधिकारी को लगा कि उसे अपनी राय साफ-साफ रखनी चाहिए। उसने अपना हाथ उठाया और यह बताने की कोशिश की कि हर प्रकार का आयात बुरा नहीं होता और कुछ आयात ऐसा होता है जिसका मूल्यवर्धन करके देश के लिए पैसे कमाए जा सकते हैं, वगैरह। मंत्री ने अपनी निगाहें अधिकारी पर टिकाईं और उनसे उनका नाम और पद पूछा। इसके बाद उन्होंने अधिकारी से कहा, 'मेरी राय है कि आप यहां काफी समय से पदस्थ हैं। आपको लंबी छुट्टी पर जाना चाहिए। आप अवकाश लीजिए या कुछ और कीजिए लेकिन कोशिश यह रहे कि आप यहां वापस न आएं।' इतना कहकर वह आगे की बातचीत में लग गए। जो लोग सुनना चाहते हैं उनके लिए ऐसे तमाम किस्से मौजूद हैं। 
 
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर का एक वीडियो विधानसभा चुनावों के दौरान वायरल हुआ था, उसे भी भाजपा के कमजोर प्रदर्शन की वजहों में शुमार किया जा सकता है। खट्टर के बारे में माना जाता है कि वह भ्रष्ट नहीं हैं लेकिन उन तक पहुंच बनाना भी आसान नहीं है। उस वीडियो में एक भाजपा समर्थक जो सरकार के निवर्तमान कर्मचारी चयन बोर्ड का सदस्य भी था, उसने भीड़ के बीच मौजूद खट्टर के माथे पर चांदी का एक ताज रखने की कोशिश की। लोगों की भीड़ खट्टर को तोहफे में देने के लिए लाया गया फरसा लहरा रही थी। खट्टर उस समर्थक से यह कहते सुनाई देते हैं, 'क्या कर रहे हो? अगर तुम नहीं मानोगे तो मैं इस फरसे से तुम्हारी गरदन काट दूंगा।' बाद में उन्होंने स्पष्ट किया उनकी प्रतिक्रिया इसलिए आई क्यों चांदी का ताज कांग्रेस की राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा है और वह कार्यकर्ता वर्षों से भाजपा में है इसलिए उसने खट्टर की डांट का बुरा नहीं माना होगा। गौरतलब है कि कार्यकर्ता केवल खट्टर की प्रतिष्ठा बढ़ाने का प्रयास ही कर रहा था। अंतत: चुनाव तो आखिर चुनाव ही है। भाजपा यह कह सकती है कि वह उन दोनों राज्यों में सत्ता में लौट आई है जहां पहले उसकी सरकार थी। लेकिन कई बार शुुरुआती संकेतकों पर ध्यान देना हमेशा अच्छा रहता है। 
Keyword: election, haryana, BJP, congress,,
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