बिजनेस स्टैंडर्ड - मुवक्किल-वकील संवाद का विशेषाधिकार बने रहना जरूरी
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मुवक्किल-वकील संवाद का विशेषाधिकार बने रहना जरूरी

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  October 31, 2019

अगर पिछले कुछ दिनों की मीडिया रिपोर्ट पर यकीन करें तो एक बार फिर जांच एजेंसियों ने वकीलों के कार्यक्षेत्र में दखल देने की कोशिश करते हुए उनके मुवक्किलों की जांच करने की अनुमति मांगी है। यह किसी भी लोकतांत्रिक समाज का निर्माण करने वाले बुनियादी नियमों में से एक का उल्लंघन करता है। ऐसा कोई भी दूसरा पेशा नहीं है जिसमें भरोसा बनाए रखने की व्यवस्था कानून में ही की गई है। साक्ष्य संबंधी कानून के तहत एक वकील और मुवक्किल के बीच होने वाली गोपनीय बातचीत को साक्ष्य के तौर पर पेश करने से संरक्षा दी गई है। मुकदमे से जुड़ जाने के बाद वकील की उसके मुवक्किल के साथ होने वाली बातचीत को अभियोजन के दौरान साक्ष्य के तौर पर नहीं रखा जा सकता है। इस व्यावसायिक संबंध को यह विशेषाधिकार मिला है कि मुवक्किल को दी गई सलाह, तथ्यों के बारे में दी गई जानकारी और इससे संबंधित सारे कागजात को एक पवित्र संरक्षित जगह दी गई है और वहां पर कोई भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। 

 
वैसे इस विशेषाधिकार को खुद मुवक्किल हटा सकता है और वकील से कह सकता है कि ऐसी विशेषाधिकृत सामग्री को जाहिर करे। इसी तरह, अगर वकील कानूनी सेवा नहीं दे रहा है और वह खुद ही कानून के उल्लंघन के किसी मामले में जांच का सामना कर रहा है तो फिर इस विशेषाधिकार का संरक्षण नहीं मिलेगा। यही वह बिंदु है जहां जांच एजेंसी वकील पर कानून के उल्लंघन में संलिप्त होने के आरोप लगाकर विशेषाधिकार को कमजोर कर सकती है। हरेक समाज के अपने मानदंड एवं स्वीकृति स्तर होते हैं कि इन स्थानों में किस हद तक दखल दिया जा सकता है? किसी खास मामले में वकील द्वारा दी जाने वाली कानूनी सलाह की गुणवत्ता के बारे में जांच एजेंसियों द्वारा फैसला सुनाए जाने की मांग करने संबंधी खबर पर यकीन करें तो एक गंभीर अन्वेषण हस्तक्षेप आकार लेने वाला है। अगर अपने मुवक्किल को दी गई सलाह के सही या गलत होने को लेकर वकील के खिलाफ जांच होती है तो न केवल इस विशेषाधिकार का हनन होगा बल्कि गैर-अभियोजन हालात में भी वकील 'अफसरशाह' हो जाएंगे।
 
अफसरशाही के लिए 'भारत का लौह ढांचा' शब्दावली का इस्तेमाल निंदात्मक लहजे में किया जाता है। किसी मसले पर कोई स्पष्ट रुख  लिए बगैर सुरक्षित ढंग से काम करने की प्रवृत्ति इसकी वजह है। पिछले कई वर्षों से अफसरशाही का झुकाव और उसकी क्षमता निर्णायक होने के मामले में क्षीण हुई है। रोजमर्रा के फैसलों में भी नजीरों का हवाला देने को भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच के दौरान सवालों का सामना करना पड़ता है। इसके चलते फिलहाल पद पर बैठे अधिकारी डर से भरी जिंदगी जी रहे हैं।
 
निजी निवेश के क्षेत्र में उस स्थिति की कल्पना कीजिए जहां वकील पूंजी निवेश के बारे में मुवक्किलों को सलाह दे रहे हैं। अर्थव्यवस्था के साथ आज केंद्रीय समस्या यह है कि निजी पूंजी सृजन को लेकर बुरी धारणा बनी हुई है। अगर निवेशकों को दी गई कानूनी सलाह पर सवाल उठते हैं तो इस नकारात्मक धारणा ने पूंजी निवेश के बारे में खूब हतोत्साहित किया। मुवक्किल और वकीलों के बीच संवाद के सिलसिले को सुरक्षित रखने के वाजिब कारण हैं। हमारा समाज मानता है कि निष्पक्ष सुनवाई के बगैर सच की आलोचना नहीं की जा सकती है। हमारे समाज की मान्यता है कि किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किए बगैर स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। इस मान्यता को साक्ष्य संबंधी कानून के अलावा संविधान में भी स्थान मिला हुआ है।
 
गलत काम में लिप्त रहने के आरोपी शख्स को एक ऐसी सुरक्षित जगह की निजता की जरूरत होती है जहां पर वह अभियोजन से जुड़े तथ्य एवं विवरणों के बारे में खुलकर बात कर सके। अगर ऐसी जगह नहीं दी जाती है तो केवल आरोप लगाने वालों का ही पक्ष नजर आएगा। उस स्थिति में किसी को गलत काम में लिप्त रहने का दोषी ठहराने के लिए केवल उस पर आरोप लगाने की ही जरूरत होगी। सच है कि अदालतों से लगातार यह कहा जा रहा है कि हिरासत में होने वाली पूछताछ जरूरी है क्योंकि संदिग्ध 'सहयोग नहीं कर रहा' है। 'सहयोग नहीं करना' आज 'अभियोग स्वीकार नहीं करने' का पर्याय हो गया है। 
 
कानूनी पेशेवरों के बीच समस्यापरक नीतिशास्त्र हो सकता है लेकिन यह किसी भी पेशे और उसमें संलग्न लोगों के साथ ऐसा होता है। वकालत पेशे के नियमन का दायित्व रखने वाले संस्थान के समक्ष इसके नैतिक पहलू अनुशासनात्मक कार्यवाही का विषय हैं। यह काम वकीलों के ग्राहकों की जांच करने वाली जांच एजेंसियों का नहीं है। वकीलों को लेकर तमाम मजाक किए जाते हैं और खुद पर हंसना एक आदत भी है। हरेक मुकदमे में एक विरोधात्मक स्वर और विचारों के प्रसार की गुंजाइश होती है जिन्हें दूसरे पक्ष के वकील जोरदार ढंग से चुनौती देते हैं। इससे वकीलों के भीतर खुद पर हंसने की क्षमता आती है। लेकिन अगर मुवक्किल के खिलाफ चल रही जांच के दौरान वकील को ही निशाना बनाया जाने लगे तो यह एक मनहूस समाज बनाने का ही मसाला होगा। एक संपूर्ण समाज का 'यूटोपिया' एक मरीचिका ही है क्योंकि इसे हासिल कर पाना मुश्किल है। लेकिन यह मतलब नहीं है कि पूरी तरह विरोधी समाज 'डिस्टोपिया' की तरफ कदम बढ़ाया जाए जिसे हासिल कर पाना बेहद आसान है। 
Keyword: advocate, court,,
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