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पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा बिक्री पर बड़ा फैसला

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  October 30, 2019

दीवाली से कुछ दिन पहले केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों के खुदरा विपणन पर अपनी नीति को उदार बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया। यह पिछले 17 वर्षों में इस क्षेत्र में लिया गया सबसे बड़ा फैसला है। वर्ष 2002 में पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा बिक्री को निजी क्षेत्र के लिए खोला गया था लेकिन इसके लिए आवेदक को पेट्रोलियम क्षेत्र में कम से कम 2,000 करोड़ रुपये निवेश करने की शर्त जुड़ी थी। पिछले सप्ताह लिए गए फैसले के तहत 250 करोड़ रुपये से अधिक हैसियत वाली कोई भी कंपनी पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा बिक्री के क्षेत्र में उतर सकती है। 

 
उम्मीद है कि गैर-पेट्रोलियम क्षेत्र की कई कंपनियों की पेट्रोल और डीजल की खुदरा बिक्री में दिलचस्पी होगी। टोटाल और सऊदी अरामको जैसी दिग्गज अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारतीय बाजार में उतर सकती हैं। खुदरा क्षेत्र की बड़ी कंपनियां भी पेट्रोल पंप खोलने पर विचार कर सकती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा बिक्री के क्षेत्र में उतरने वाली कंपनी के लिए पेट्रोलियम क्षेत्र में निवेश करने की शर्त को खत्म कर दिया गया है। लेकिन नीति को उदार बनाने की यह पहल कितनी सफल होगी?
 
स्पष्ट है कि 2002 में जब खुदरा नीति को उदार बनाया गया था तो उसके वांछित परिणाम नहीं आए। वर्ष 2002 में पेट्रोल और डीजल के खुदरा विपणन में सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों का दबदबा था। तब देश में 18,924 पेट्रोल पंप थे। पिछले 17 वर्षों में इन कंपनियों ने 39,000 पेट्रोल पंप जोड़े और उनके पेट्रोल पंपों की संख्या 57,924 पहुंच गई। इसके विपरीत 2002 में नीतिगत उदारीकरण के बावजूद पेट्रोल पंप खोलने के मामले में निजी क्षेत्र का प्रदर्शन बहुत खराब रहा है। इन 17 वर्षों में निजी क्षेत्र ने केवल 6,700 पेट्रोल पंप खोले। इनमें नयारा एनर्जी लिमिटेड (पहले एस्सार ऑयल) ने 5,128, रिलायंस पेट्रो ने 1,400 और शेल इंडिया ने 145 पेट्रोल पंप खोले हैं। इस अवधि के दौरान कई उत्पादों के लिए बाजार से जुड़ी मूल्य व्यवस्था नहीं होने के कारण निजी क्षेत्र ने इसे ज्यादा भाव नहीं दिया।
 
ऐसे में पेट्रोल पंपों की अधिकांश मांग को सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने पूरा किया। पिछले 17 वर्षों में पेट्रोल और डीजल की बिक्री 6 फीसदी की सालाना चक्रवृद्घि दर (सीएजीआर) से बढऩे का  अनुमान है। इस दौरान पेट्रोल पंपों की सीएजीआर 7.5 फीसदी रही। काफी हद तक इस वृद्घि को बनाए रखने में सार्वजनिक क्षेत्र के पेट्रोल पंपों का योगदान रहा। पिछले सप्ताह के फैसले से पहले सरकार ने एक विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया। इस समिति को 2002 के नीतिगत उदारीकरण के प्रभावों की समीक्षा करने का काम सौंपा गया था। समिति का कहना था कि सरकार को तेल विपणन क्षेत्र में नई कंपनियों को प्रवेश देने का अधिकार अपने पास रखना चाहिए और बाकी नियमों में ढील देनी चाहिए। समिति ने साथ ही सुझाव दिया था कि 250 करोड़ रुपये की हैसियत रखने वाली किसी भी कंपनी को देश के पेट्रोल पंप स्थापित करने की अनुमति दी जानी चाहिए। समिति ने साथ ही यह सिफारिश भी की थी कि सरकार को यह शर्त रखनी चाहिए कि नई कंपनियों को अपने कम से कम 5 फीसदी पेट्रोल पंप दूरदराज के अधिसूचित इलाकों के खोलने होंगे। उन्हें पेट्रोल खोलने की अनुमति मिलने के पांच साल के भीतर ऐसा करना होगा। हालांकि नई नीति कितनी कारगर होगी, इस पर कई सवाल उठ रहे हैं। नई कंपनियां दूरदराज के अधिसूचित इलाकों में 5 फीसदी पेट्रोल पंप खोलने की शर्त कैसे पूरी करती हैं, इसकी निगरानी से विवेक का मसला खड़ा होगा। इससे समस्या खड़ी हो सकती है और मुद्दे का राजनीतिकरण हो सकता है। इस तरह के सशर्त नीतिगत प्रोत्साहनों के दुरुपयोग की संभावना बहुत अधिक रहती है। इसमें पूर्व के उदाहरणों को नहीं भुलाया जाना चाहिए। निर्यात दायित्वों से जुड़ी आयात रियायतों की योजना का कैसे दुरुपयोग किया गया था और खराब निगरानी की गई थी। 
 
इसी तरह नई नीति को और उदार बनाए जाने की गुंजाइश है। इस बात की कोई वजह नहीं है कि नई कंपनियों को विभिन्न तेलशोधक संयंत्रों से प्राप्त पेट्रोलियम उत्पादों को एक ही पेट्रोल पंप से बेचने की अनुमति क्यों नहीं दी जा सकती है। अगर नए पेट्रोल पंप पारदर्शिता बनाए रखते हैं और इस बात का खुलासा करते हैं कि खरीदार किस तेलशोधक संयंत्र का तेल खरीद रहे हैं, तो इस बात का कोई कारण नहीं है कि उनके लिए विभिन्न तेलशोधक संयंत्रों से खरीदे गए ईंधन को अलग-अलग पेट्रोल पंपों के जरिये बेचना अनिवार्य बनाया जाए।
 
ज्यादा परेशान करने वाला सवाल यह है कि अगर नीति को उदार बनाने का मकसद तेल विपणन में ज्यादा प्रतिस्पद्र्घा का दौर शुरू करना है तो सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सार्वजनिक तेलशोधक संयंत्र पेट्रोलियम उत्पादों के मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता लाएं। कारगर प्रतिस्पद्र्घा तभी शुरू होगी जब नई कंपनियां वास्तव में मौजूदा तेलशोधक संयंत्रों से तेल खरीद पाएंगी। अभी उनके पास अपने तेलशोधक कारखाने नहीं हैं। तेलशोधक संयंत्रों में पारदर्शी मूल्य व्यवस्था के अभाव में इस तरह की खरीद मुश्किल होगी। 
 
पेट्रोल पंप के क्षेत्र में उतरने वाली नई कंपनियां पेट्रोल और डीजल का आयात कर सकती हैं और उन्हें ऐसे दाम पर बेच सकती हैं जिससे सार्वजनिक तेलशोधक संयंत्रों को प्रतिस्पद्र्घा का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन देश के सार्वजनिक तेलशोधक संयंत्र खुदरा तेल के मूल्य में ज्यादा सुधार लाने के लिए इस अवसर का उपयोग क्यों न करें। इस तरह की पारदर्शिता से सार्वजनिक क्षेत्र के तेलशोधक संयंत्रों के बीच उस अंतिम मूल्य के लिए प्रतिस्पद्र्घा होगी जिस पर पेट्रोल पंपों के जरिये पेट्रोलियम उत्पाद बेचे जाएंगे। इस तरह के सुधार लागू होने के बाद नई कंपनियों को पेट्रोल पंप लगाने की अनुमति देने के सरकार के कदम की प्रभावशीलता में काफी सुधार होगा। 
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