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वृद्घि, आय, गरीबी और नोबेल पुरस्कार

आलोक शील /  October 30, 2019

नियंत्रण वाले बेतरतीब परीक्षण के नतीजों को हर जगह-हर समय लागू करने को लेकर सतर्कता बरतनी होगी। इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाल रहे हैं आलोक शील

 
वर्ष 2019 के लिए अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार अभिजित बनर्जी, एस्टर डफ्लो और माइकल क्रेमर को संयुक्त रूप से दिया गया है। उन्हें यह पुरस्कार 'ऐसे नियंत्रित बेतरतीब परीक्षण के प्रयोगात्मक कार्य के लिए दिया गया जिसने दुनिया भर में गरीबी से लडऩे में अहम सहायता की है। महज दो दशक में इस नए प्रयोग पर आधारित रुख ने विकासात्मक अर्थशास्त्र में काफी बदलाव उत्पन्न किया है और यह अब शोध के क्षेत्र में काफी फल फूल रहा है।' उनके काम के केंद्र में कम लागत वाले हस्तक्षेप हैं जो ऐेसे प्रायोगिक शोध से निकले हैं जो बताता है कि किस तरह का हस्तक्षेप कारगर है और कैसा नहीं। दालों का मुफ्त वितरण बाल टीकाकरण केंद्रों पर बच्चों की आवक सुधारता है या नहीं अथवा नि:शुल्क मच्छरदानी वितरण से मलेरिया के मामलों में कमी आती है या उन्हें रियायती दर पर बांटने से ऐसा होता है, आदि इस शोध के उदाहरण हैं। 
 
उनका काम गरीबों की सहायता और उन पर केंद्रित सरकारी योजनाओं पर व्यय होने वाली राशि को अधिक उपयोगी बनाने वाला है लेकिन इस दावे पर करीबी नजर डालनी होगी कि उनके काम ने विकास अर्थशास्त्र में आमूलचूल बदलाव उत्पन्न किया है। इसकी तीन मोर्चों पर परख आवश्यक है। पहला, 2015 में अर्थशास्त्र का नोबेल एंगस डीटन को इसी काम के लिए दिया गया था। उनका अध्ययन भी गरीबी, खपत और लोक कल्याण पर था। यह बात भी स्पष्ट नहीं है कि प्रायोगिक नियंत्रित बेतरतीब परीक्षण डीटन के तरीके से बेहतर है या नहीं। डीटन का काम विस्तृत विश्लेषण पर आधारित था। 
 
दूसरा, प्राकृतिक विज्ञान में आजमाए जाने वाले वैज्ञानिक तौर तरीकों को सामाजिक विज्ञान में अपनाए जाने की पर्याप्त वजह है। भौतिक जगत जिस तरह प्राकृतिक कानूनों का अनुगामी होता है, मानव विज्ञान के साथ ऐसा नहीं है। एक सेब के माध्यम से गुरुत्व का सिद्घांत खारिज हो सकता है लेकिन इंसानी मामलों में लोग अलग-अलग घटनाओं पर अलग प्रतिक्रिया देंगे। बनर्जी, डफ्लो और क्रेमर की शोध प्रवृत्ति तथा व्यवहारात्मक अर्थशास्त्री कास संस्टेन, रिचर्ड थालेर और स्टीवन लेविट के तरीकों में काफी समानता है। उन्होंने भी ऐसा ही प्रयोगात्मक रुख अपनाया जो औषधीय मनोविज्ञान पर आधारित था जिसमें लोगों के वांछित व्यवहार का अध्ययन किया गया। मसलन स्कूल के बाहर वाहन धीमे करना, पुरुषों के शौचालय में यत्र-तत्र पेशाब छलकाना। बहरहाल व्यवहार अर्थशास्त्र राजकोषीय गुणक सुधारने में नाकाम रहा। रिचर्ड थालेर को 2017 में नोबेल मिला। उन्होंने कर कटौती भुगतान की मदद से आय में स्थायी वृद्घि का भ्रम रचने की बात की थी। परंतु सांस्कृतिक अंतर के कारण आय वृद्घि का लोगों पर अलग असर हो सकता है। विभिन्न प्रकार के हस्तक्षेप पर भी भिन्न-भिन्न स्थान और समय पर उनकी प्रतिक्रिया भी अलग-अलग हो सकती है। जाहिर है ऐसे में यह बात काफी महत्त्वपूर्ण हो जाती है कि आखिर बेतरतीब परीक्षण कहां और कब किए गए। इसके बाद ही उन्हें सफलतापूर्वक आजमाया जा सकता है। 
 
तीसरी बात, वृहद स्तर पर गरीबी उन्मूलन का सबसे तेज तरीका अब भी उच्च वृद्घि, निवेश और उत्पादक रोजगार है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार बीते दो दशक में अत्यधिक गरीबी में भारी कमी आई और यह करीब 30 फीसदी से घटकर 10 फीसदी के आसपास रह गई। यह ऐसी अवधि भी रही जब उभरते और विकासशील देशों में जहां सबसे अधिक गरीब रहते थे वहां विकास में तेजी आई। सन 1999 से 2015 के बीच में गरीबी में कमी की गति सन 1981 से 1999 की तुलना में कहीं तेज थी। चीन, भारत और सब-सहारा अफ्रीका में गरीबी में आई कमी के अंतर को वृद्घि दर में अंतर से समझा जा सकता है। ऐसे में ट्रिकल डाउन के सिद्घांत की चाहे जितनी आलोचना की गई हो, वह यहां सही प्रतीत होता है। 
 
इसे प्रति व्यक्ति आय और अत्यधिक गरीबी के बीच के आपसी संबंध से अच्छी तरह समझा जा सकता है। सन 2015 में कम आय वर्ग में अत्यधिक गरीबी 43.9 फीसदी, निम्र मध्य वर्ग में 13.9 फीसदी और उच्च मध्य तथा उच्च वर्ग में क्रमश: 1.7 फीसदी और 0.7 फीसदी थी। हालांकि संकेत यह भी है कि ट्रिकल डाउन का असर उच्च और उच्च मध्य आय वर्ग वाले देशों में कहीं बेहतर है जबकि निम्र मध्य आय और निम्र आय वाले देशों में कम। हालांकि वियतनाम और भारत प्रति व्यक्ति आय के मामले में बहुत अलग नहीं हैं लेकिन वियतनाम में प्रति व्यक्ति आय न केवल काफी कम है बल्कि वह उच्च मध्य आय वर्ग वाले देश ब्राजील से भी कम है। यहां तक कि अत्यधिक गरीबी के मामले में नेपाल भी भारत से बेहतर स्थिति में है। 
 
अत्यधिक गरीबी को लेकर ऐसे अलग अनुभव बताते हैं कि वृद्घि और प्रति व्यक्ति आय तथा अत्यधिक गरीबी के बीच का रिश्ता निम्र मध्य आय और अल्प आय वाले देशों में कारगर नहीं है। नोबेल विजेताओं द्वारा किए गए हस्तक्षेप जैसे नीतिगत हस्तक्षेप इन देशों में बड़ा अंतर पैदा कर सकते हैं। उच्च आय और उच्च मध्य आय वाले देशों में ध्यान अत्यधिक गरीबी से सामाजिक गरीबी और असमानता की ओर स्थानांतरित हो गया है। वैश्विक स्तर पर अत्यधिक गरीबी सन 1990 के 35.9 फीसदी से घटकर 2015 में 10 फीसदी रह गई, सामाजिक गरीबी (विश्व बैंक के अनुसार प्रति व्यक्ति 5.5 डॉलर) 67 फीसदी से घटकर केवल 46 फीसदी पर आई। इस तरह देखें तो आधी दुनिया गरीब है। वृद्घि ने सुधार तो किया लेकिन असमान। चूंकि अत्यधिक गरीबी के मानक नीचे हैं इसलिए इसमें तेजी से गिरावट आई। तेज वृद्घि के कारण असमानता में भी तेज गति से इजाफा होता है। चूंकि ऐसे देशों में सामाजिक गरीबी और असमानता कम करने के लिए लक्षित नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है तो क्या यहां नियंत्रित बेतरतीब परीक्षण का प्रयोग किया जा सकता है? हमने ऊपर जिन तीन बिंदुओं की चर्चा की वे किसी तरह बनर्जी, डफ्लो या क्रेमर के महत्त्वपूर्ण काम को सीमित करने का प्रयास नहीं है। नोबेल समिति द्वारा उनका चयन ही उनकेे काम को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है। हमने जिन बिंदुओं की बात की, इन शोधकर्ताओं ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इन्हें स्वीकार भी किया है। ऐसे हस्तक्षेप सर्वाधिक गरीबों के जीवन में सुधार कर सकते हैं और सामाजिक गरीबों के मामले में भी ऐसी दलील का इस्तेमाल किया जा सकता है। परंतु ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं है जिससे गरीबी एक झटके में दूर हो जाए। हमें उक्त परीक्षण के नतीजों को लागू करते समय सावधानी बरतनी होगी और वृहद स्तर की नीति से जुड़े हस्तक्षेप पर लगातार ध्यान देना होगा। ऐसा करके ही तेज वृद्घि, निवेश और उत्पादक रोजगार का समुचित माहौल तैयार किया जा सकेगा। 
 
(लेखक इक्रियर में मैक्रोइकनॉमिक्स के आरबीआई चेयर प्रोफेसर हैं।)
Keyword: noble prize, Abhijit Banerjee, economy, india,,
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