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सरकार की समिति ने की आरसीईपी की वकालत

शुभायन चक्रवर्ती / नई दिल्ली October 30, 2019

प्रस्तावित क्षेत्रीय समग्र साझेदारी समझौते (आरसीईपी) पर बैंकॉक में होने जा रही अंतिम बातचीत के महज कुछ दिन पहले कारोबार पर सरकार की ओर से नियुक्त समिति ने इस समझौते का जोरदार समर्थन किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 4 नवंबर को इस बातचीत में हिस्सा लेने बैंकॉक जाएंगे। भारत के बढ़ते कारोबार पर उच्च स्तरीय सलाहकार समूह (एचएलएजी) ने आज अपनी रिपोर्ट में कहा कि आरसीईपी की मौजूदा चुनौतियों के बावजूद यह खास तौर पर भारत के लिए फायदेमंद है। आरसीईपी देश भारत पर लगातार दबाव बनाए हुए हैं कि वह 4 नवंबर को इस समझौते पर अंतिम फैसला करे, जो इसके लिए आखिरी तिथि रखी गई है। 
 
राष्ट्रीय व्यावहारिक आर्थिक अनुसंधान परिषद (एनसीएईआर) के एक अध्ययन का हवाला देते हुए एचएलएजी की रिपोर्ट में आगे यह तर्क दिया गया है कि अगर चीन और अमेरिका वैश्विक कारोबारी जंग में फंसे रहते हैं, तब भी भारत को फायदा होगा। घरेलू उद्योग खासकर विनिर्माण और कृषि क्षेत्र इस समझौते का कड़ा विरोध कर रहे हैं, जिन्हें डर है कि समझौते के बाद भारत में चीनी सामान भर जाएगा।  लेकिन इस रिपोर्ट में दीर्घावधि कारोबारी फायदे का हवाला देकर इस तरह के डर को खारिज किया गया है।  एचएलएजी ने कहा है, 'चीन की अर्थव्यवस्था धीरे धीरे सुस्त हो रही है और यह स्थिति बने रहने की संभावना है। इस समय चीन घरेलू खपत पर ज्यादा जोर दे रहा है। उसे अमेरिकी कोप का सामना करना पड़ रहा है और संभवत: अभी वह कुछ समय तक ऐसा करना जारी रखेगा। इस वजह से वह इस समय थोड़ा कमजोर बना हुआ है।' 
 
वाणिज्य विभाग द्वारा अक्टूबर 2018 में गठित 12 सदस्यों के एचएलएजी में अर्थशास्त्री, नीति निर्माता और शिक्षाविद शामिल हैं और इसके अध्यक्ष अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत का कार्यकारी निदेशक नियुक्त किया गया है। इस रिपोर्ट में वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने, द्विपक्षीय संबंध बढ़ाने और नए दौर के  मुताबिक नीति बनाने पर जोर दिया गया है। आरसीईपी के मामले में भारत ने ऐसी व्यवस्था का सुझाव दिया है, जिसमें खासकर चीन से आयात की मात्रा तय हो। भारत ने किसी कारोबारी बातचीत में पहली बार इस तरह की शर्त रखी है। एक अधिकारी ने कहा कि बातचीत के दौरान चीन ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और उसका अन्य देशों ने भी समर्थन किया। इसके पहले भारत सभी देशों के लिए 76 सामान पर कर कम करने पर सहमत था, जबकि चीन के लिए विशेष कदम उठाने की बात कही थी। वहीं अन्य ने यह मांग की है कि भारत कम से कम सभी वस्तुओं में से 90 प्रतिशत के लिए बाजार खोले। 
 
इस समय यह व्यापक रूप से स्वीकार कर लिया गया है कि आरसीईपी की वजह से कारोबार वाले 28 प्रतिशत वस्तुओं पर कर खत्म हो जाएगा। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से 35 प्रतिशत वस्तुएं इसके दायरे में आ जाएंगी।  रिपोर्ट में कुछ मसलोंं का भी जिक्र किया गया है, जिसके कारण निर्यात में ठहराव है। भल्ला ने कहा, 'भारत में कारोबार सबसे ज्यादा पूंजी और श्रम लागत के संकट से जूझ रहा है।'  उन्होंने आगे कहा कि यह दुख की बात है कि कृषि व वित्तीय निर्यात की भारत के निर्यात में तेजी में भूमिका नहीं रही है। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि मौजूदा वित्तीय निर्यात 1980 में भारत के कृषि निर्यात से भी कम है। 
 
निर्यातकोंं की लंबे समय से चल रही शिकायत के विपरीत रिपोर्ट में यह भी तर्क दिया गया है कि भारतीय रुपये का ज्यादा मूल्यांकन नहीं किया गया है।  इसमें कहा गया है, 'जिन देशों ( बांग्लादेश और वियतनाम) ने वास्तव में बेहतर प्रदर्शन किया है, उनकी वास्तविक विनिमय दर में भारी बढ़ोतरी (30 प्रतिशत से ज्यादा) हुई है। चीन, फिलीपींस और थाईलैंड के लिए दरों में क्रमश: 28, 21 और 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।' अमेरिका-चीन के बीच कारोबारी जंग बढऩे के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर भारत पर ज्यादा शुल्क नहीं लगाया जाता है तो इससे फायदा होगा। इसमेंं कहा गया है, 'भारत के लिए यह उचित नहींं होगा कि अमेरिका-चीन के कारोबारी जंग में वह शुल्क बढ़ाए। दरअसल अपना शुल्क कम करना बुद्धिमानी वाला कदम होगा।' 
 
रिपोर्ट में 5 साल की अवधि के दौरान सीमा शुल्क में व्यापक कमी की भी बात कही गई है। एचएलएजी ने कहा है, 'कथित शुल्क बाधा (2 से 3 प्रतिशत तक) से मकसद कम ही पूरा होता है, जिसे 3 साल की अवधि के दौरान घटाकर शून्य किया जाना चाहिए।' 
Keyword: RCEP, FTA, metal,,
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