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एफआरडीआई विधेयक पर फिर सुगबुगाहट शुरू

सुदीप्त दे /  October 28, 2019

आईएलऐंडएफएस का कारोबार बैठने से और अब मौजूदा आर्थिक हालात में कई गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) का दम फूलने से नियामकों की नींद खराब हो गई है। हाल में ही पंजाब ऐंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव (पीएमसी) बैंक कांड के बाद सरकार और आरबीआई दोनों के माथे पर शिकन आ गई है। इन सभी घटनाओं के बाद ऐसा लगता है कि सरकार सहित विभिन्न नियामकों को इन मामलों से निपटने का कोई पुख्ता विकल्प नहीं मिल मिल रहा है। ऐसे में पिछले एक साल से वित्तीय क्षेत्र में हो रही उठापटक के बाद सरकार को एक बार फिर वित्तीय समाधान एवं जमा बीमा (एफआरडीआई) विधेयक पर दोबारा विचार करने पर विवश होना पड़ा है। जमाकर्ताओं (डिपॉजिटर) और संबंधित पक्षों की कड़ी आपत्ति के बाद सरकार ने पिछले साल अगस्त में एफआरडीआई बिल को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। इन्होंने इस विधेयक में 'बेल-इन' (जमाकर्ताओं एवं कर्जदाताओं द्वारा वित्तीय संस्थानों का समाधान) प्रावधान को लेकर चिंता जताई थी।

 
ईवाई में प्रमुख (फाइनैंशियल सर्विसेस, रीस्ट्रक्चरिंग ऐंड टर्नअराउंडड सर्विसेस), अबिजेर दीवानदी कहते हैं, 'एफआरडीआई विधेयक, 2017 को लेकर पुख्ता तैयारी नहीं की गई थी। अगर यह विधेयक प्रभाव में होता तो आईएलऐंडएफएस मामले में समस्या का त्वरित समाधान खोजने में आसानी होती।' इस विधेयक में वित्तीय सेवा प्रदाताओं की वित्तीय सेहत पर नजर रखने के लिए सरकार नियंत्रित रिजॉल्यूशन कॉर्पोरेशन (आरसी) नियुक्त किए जाने का प्रस्ताव था। इसके तहत संकटग्रस्त कंपनियों को पांच श्रेणियों- लो, मॉडरेट, मटीरियल, इमिनेंट और क्रिटिकल- में विभाजित करने का प्रावधान था। आरसी को 'इमिनेंट' (चूक करने के कगार पर) और 'क्रिटिकल' (गंभीर स्थिति में) श्रेणियों की कंपनियों के मामले में त्वरित कदम उठाने का अधिकार होता। कॉर्पोरेशन के पास परिसंपत्ति एवं देनदारी वित्तीय सेवा कंपनी को स्थानांतरित करने, जमाकर्ताओं और संबंधित पक्षों की मदद से समाधान निकालने और कंपनी की बिक्री शामिल जैसे अधिकार होते।  हालांकि बेल-इन प्रावधान को लेकर जबरदस्त आपत्ति दर्ज हुई, जिसके बाद सरकार को विवश होकर यह विधेयक लाने का विचार त्यागना पड़ा। 
 
पिछले एक साल के दौरान वित्तीय क्षेत्र में एक के बाद एक पैदा हुए संकटों के बाद एक व्यापक समाधान संहिता (संकट की शुरू में ही पहचान से लेकर चरणबद्ध समाधान) लाने की जरूरत बढ़ गई है। विधि कंपनी एजेडबी ऐंड पार्टनर्स में पार्टनर सुहर्ष सिन्हा के अनुसार एफआरडीआई कानून होता तो शुरुआती दिक्कतों का पता लगाने, सुधार के कदम उठाने और पूरी प्रणाली में समस्या फैलने से रोकने में मदद मिलती। विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के देवांशु मुखर्जी, लीड (कॉर्पोरेट लॉ ऐंड फाइनैंशियल रेग्युलेशन) कहते हैं, 'हालांकि इस कानून से फर्जीवाड़ा या कारोबार असफल रहने के वाजिब कारणों को रोकने में मदद नहीं मिलती, लेकिन इससे बड़ी एनबीएफसी और आवास वित्त कंपनियों जैसे आईएलऐंडएफएस और डीएचएफएल में वित्तीय शिष्टाचार बहाल करने में जरूर मदद मिलती।'
 
ज्यादातर कानून विशेषज्ञों का मानना हैै कि दिवालिया संहिता के साथ ही एफआरडीआई विधेयक पारित हो जाता तो सरकार को संकट से निपटने में बहुत मदद मिलती। विधेयक में बड़े वित्तीय संस्थानों और असफल होने वाले संस्थानों की निगरानी के लिए एक संरचनात्मक दृष्टिकोण का प्रस्ताव दिया गया था। सरकार की नीतियों पर नजर रखने वाले लोगों का कहना है कि जब यह विधयेक 2017 में लाया गया था तो नियामक एवं नियामकीय तंत्र के अंदर से कुछ खेमों ने इस पर आपत्ति जताई थी। सिन्हा का मानना है कि रिजॉल्यूशन कॉर्पोरेशन जैसी कोई पेशेवर एजेंसी सरकार की निगरानी क्षमता और समय रहते जोखिम पहचानने की ताकत में इजाफा करती। उनके अनुसार इससे संचालन संबंधी मुद्दे दूर करने में आसानी होती। जहां तक एक असफल वित्तीय संस्थान के जमाकर्ताओं और संबंधित पक्षों द्वारा बेल-इन प्रावधान की बात है तो ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि डिपॉजिट इंश्योरेंस लोगों के जेहन में पूरी तरह स्पष्ट नहीं था। 
 
सिरिल अमरचंद मंगलदास में पार्टनर धनंजय कुमार कहते हैं, 'एफआरडीए विधेयक में वित्तीय संस्थानों के लिए नए डिपॉजिट इंश्योरेंस पर विचार हुआ था।' हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि किसी को शत-प्रतिशत जमा बीमा नहीं दिया  जा सकता है, क्योंकि इस पर खर्च काफी ज्यादा आएगा। उन्होंने कहा कि इसका उत्तर गहराई से जांचने और जोखिम की नियमित समीक्षा के बाद ही सामने आएगा। मुखर्जी इस बात से सहमत हैं कि डिपॉजिट इंश्यारेंस में इजाफा काफी समय से नहीं हुआ है, लेकिन वह भी कहते हैं कि केवल डिपॉजिट इंश्योरेंस से ही बात, खासकर संकट के समय में, बनने वाली नहीं है। उन्होंने कहा, 'यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि जब कोई बैंक धराशायी होता है तो बीमित रकम यथासंभव लौटाई जाती है।' हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि सहकारी बैंकों के इर्द-गिर्द एफआरडीआई विधेयक से बहुत मदद नहीं मिलेगी। उनके अनुसार बैंकों को दोहरे नियमन के दायरे से मुक्त करने की जरूरत है। मुखर्जी कहते हैं, 'केंद्र सरकार को राज्यों के साथ परामर्श शुरू करना चाहिए और एक संविधान संशोधन का प्रस्ताव रखना चाहिए ताकि आरबीआई सहकारी बैंकों पर और अधिक निगरानी रख सके।' ज्यादातर विशेषज्ञ निगरानी और पैनी करने के लिए नियामकों के लिए अधिक संस्थागत क्षमता और परिचालन स्वतंत्रता की जरूरत पर जोर देते हैं। वे इस बात को लेकर भी आगाह करते हैं कि नियामकीय प्रतिक्रिया इस तरह होनी चाहिए कि इसका वित्तीय सेवा क्षेत्र की वृद्धि दर पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़े।
Keyword: FRDI, law, policy, IL&FS,,
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