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राजनीतिक बयार में आ रहा है बदलाव

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  October 28, 2019

इस वर्ष मॉनसून सामान्य से लंबा खिंचा। बहरहाल अब हवा अपना रुख बदल रही है। राजधानी में पश्चिम से शुष्क हवाएं आने लगी हैं। ये पंजाब और हरियाणा में जल रहे फसल अवशेष का धुआं साथ ला रही हैं। शरद ऋतु का आगमन हो चुका है। इतने स्पष्ट ढंग से नहीं लेकिन राजनीतिक हवाओं में भी बदलाव आया है। बीते कुछ वर्षों से अर्थव्यवस्था में ठहराव है लेकिन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने चरम राष्ट्रवाद और धर्म के मिश्रण को बढ़ावा देना जारी रखा। आम चुनाव के आसपास बालाकोट और अभिनंदन प्रकरण के वक्त यह चरम पर पहुंच गया।

 
मतदाताओं को यह यकीन दिलाया गया कि बीते सात दशकों से पाकिस्तान देश के अस्तित्व के लिए खतरा बना हुआ है लेकिन किसी ने इस बारे में कुछ नहीं दिया, अब मोदी इस समस्या से निर्णायक ढंग से निपट रहे हैं। वह ऐसा निर्णायक, निर्भय और प्रतिकारक सैन्य कार्रवाई के साथ कर रहे हैं और विश्व स्तर पर भारत का कद ऊंचा कर पाकिस्तान को अलग-थलग कर रहे हैं। एक बार जब ज्यादा लोग इस पर यकीन करने लगें तो वे अपनी पारंपरिक राजनीतिक प्रतिबद्धताएं भूल जाते हैं।
 
बाकी काम खुद ब खुद होता है। पाकिस्तान मुस्लिम मुल्क है। वह जिहाद के नाम पर आतंक फैलाता है। खून के प्यासे जिहादी पूरी दुनिया के लिए समस्या हैं। एक बार फिर जोर इसी बात पर कि खतरा इस्लाम से है, भारतीय मुस्लिम भी इससे अछूते नहीं हैं और हिंदुओं को एकजुट होना होगा। जाहिर सी बात है कि यह सब इतना कारगर नहीं होता अगर कल्याण योजनाओं में गरीबों को 12 लाख करोड़ रुपये नहीं दिए गए होते। घरेलू गैस, शौचालय, घर और मुद्रा ऋण आदि इसके उदाहरण हैं। मैंने चुनाव प्रचार के दिनों में इस बारे में अक्सर लिखा है।
 
चुनावी दृष्टि से राष्ट्रवाद, धर्म और लोक कल्याण का मिश्रण घातक होता है। विपक्ष ने राफेल का जिक्र छेड़ा उसका मजाक उड़ा। नोटबंदी के बाद वृद्धि दर में गिरावट और बेरोजगारी आदि के मुद्दे की अनदेखी हुई। पिछले दिनों दो विधानसभा चुनावों के नतीजों ने हवा का रुख बदलने का संकेत दे दिया है। हालांकि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। यदि ऐसा होता तो भाजपा कम से कम हरियाणा में हार जाती। केवल उनकी बदौलत ही हरियाणा में पार्टी को इतने मत मिले। हालांकि पांच महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव के 58 फीसदी मतों की तुलना में वे घटकर 36.5 फीसदी रह गए। परंतु ये मत इतने तो थे कि मोदी ने मतगणना की शाम दोहरी जीत की घोषणा की।
 
हाल के दिनों में सबसे प्रतिष्ठित रहे इंडिया टुडे-ऐक्सिस सर्वे से इसके कुछ संकेत मिलते हैं। हरियाणा में उसने बताया कि भाजपा को कांग्रेस पर 9 फीसदी की बढ़त हासिल है लेकिन ग्रामीण युवाओं, बेरोजगारी, किसान, कृषि श्रम आदि विषयों पर वह पिछड़ रही थी। उसे जरूरी शहरी मध्य वर्ग, उच्च जातियों और पंजाबी बहुल आबादी ने शर्मिंदगी से बचाया। इसी प्रकार महाराष्ट्र में जहां पार्टी ने लोकप्रिय और स्वच्छ छवि वाले मुखिया के नेतृत्व में बेहतर शासन किया वहां भी उसके प्रदर्शन में गिरावट आई। ऐसा तब हुआ जब कांग्रेस और राकांपा के कई प्रमुख नेता भाजपा में शामिल हो गए थे या सरकारी एजेंसियों के कोपभाजन थे।
 
अगर इन तमाम लाभों के बावजूद किसी तरह जीत हासिल हुई तो यह देखना होगा कि पार्टी का करिश्मा कैसे टूटा? यदि पश्चिमी महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में अपेक्षाकृत बड़ी पार्टी कांग्रेस के स्थान पर राकांपा ने भाजपा की राह रोकी तो यह स्पष्ट है कि कई किसानों और बेरोजगारों ने पक्ष बदल लिया है। याद रहे यह सब कश्मीर में अनुच्छेद 370 के खात्मे के 11 सप्ताह, हाउडी मोदी आयोजन, मोदी और डॉनल्ड ट्रंप की बातचीत और संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण के पांच सप्ताह के भीतर हुआ है। इसमें कुछ और बातें जोड़ लें- मामल्लपुरम में शी चिनफिंग के साथ टीवी शो, पी चिदंबरम और डी के शिवकुमार की गिरफ्तारी और राकांपा नेता प्रफुल्ल पटेल को आतंकियों को फंड देने के कथित मामले में इकबाल मिर्ची से जोडऩा आदि। इस बीच सर्वोच्च न्यायालय में अयोध्या मामले की सुनवाई लगभग रोजाना होती रही और यह मुद्दा देश में अहम हो चुका था।
 
यदि इन कारकों के बावजूद महज पांच महीने में इतने सारे मतदाताओं ने दूरी बनाई तो यह इस बात का संकेत है कि राष्ट्रवाद की हवा, पाकिस्तान विरोध और धार्मिक उन्माद ने आर्थिक मसलों और रोजगार की जिन चिंताओं को ढक दिया था वे दोबारा सामने आ रहे हैं। मतदाता अब बुनियादी मुद्दों की ओर लौट रहे हैं। आम चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान हम अक्सर गरीब, बेरोजगार लोगों के पास पहुंचते थे जो कहते कि वे दुखी हैं और हालात वादे के मुताबिक नहीं सुधरे हैं। इसके बावजूद उन्होंने मोदी के लिए मतदान करने की बात कही। क्यों: देश के लिए। वह भावना कम नहीं हुई है। इसे मतदाता की तरह देखें तो उसे लगता है कि मोदी को देश की रक्षा के लिए वोट देने की खातिर उसने अपनी तमाम निजी चुनौतियों को किनारे कर दिया है। देश सुरक्षित है अब आप बताइए कि आपने घटती आय, बढ़ती बेरोजगारी और किसानों आदि के लिए क्या किया है।
 
मेरा मानना है कि धर्म के साथ जुड़े राष्ट्रवाद की हवा पर अब अर्थव्यवस्था में ठहराव, बेरोजगारी और आम नाराजगी हावी होने लगी है। पाकिस्तान के खिलाफ कदम, कश्मीर और आतंकवादी के खिलाफ शोर इन्हें दबा नहीं सकता, बशर्ते कि कोई बड़ी सैन्य कार्रवाई न हो जाए। क्या राम मंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय का अनुकूल निर्णय अंतर पैदा करेगा? शायद हिंदी प्रदेशों में कुछ हद तक ऐसा हो। लेकिन इतना पर्याप्त नहीं है क्योंकि अब लोगों की दिक्कतें बढ़ गई हैं। वे आर्थिक आशावाद की वापसी चाहते हैं।
 
हम देश में बार-बार चुनावों की बात करते हैं। भाजपा एक देश-एक चुनाव के विचार की समर्थक है लेकिन फिर भी मोदी सरकार महाराष्ट्र और हरियाणा के साथ झारखंड चुनाव नहीं चाहती थी। शायद उसे संकट का आभास हो गया था। शायद उसे यह समझ में आ गया है कि उनके पास वोट जुटाने वाला एक ही नेता है और उसे तीनों राज्यों में पर्याप्त समय देने की आवश्यकता है। झारखंड चुनावों के बाद पता चल जाएगा कि इसका उलटा असर तो नहीं हो रहा है। यह अंदाजा ही लगाया जा सकता है कि उत्तर में हरियाणा और पश्चिम में महाराष्ट्र से चली बदलाव की हवाएं झारखंड पहुंचेंगी या नहीं इस बारे में तो केवल कयास ही लगाया जा सकता है। लेकिन यह तय है कि विपक्ष अब कड़ी मेहनत करेगा। परंतु ऐसे वक्त में जबकि सभी जीतों का श्रेय एक नेता को दिया जाता है, उसे हार की जवाबदेही से बचा पाना मुश्किल है। खासतौर पर मौजूदा दौर में जबकि हार नहीं बल्कि जीत के कम अंतर को भी निराशाजनक माना जा रहा है।
 
भारत में लगातार चलने वाले चुनावों की एक अच्छी बात यह है कि राजनीति कभी ठहरती नहीं। झारखंड के बाद दिल्ली में चुनाव होंगे। भाजपा को तब यह निर्णय लेना होगा कि उसे मोदी को सामने रखना है या नहीं। क्योंकि तब लड़ाई मोदी बनाम केजरीवाल की हो जाएगी। क्या एक आधे राज्य के लिए इस तरह का दांव खेलना उचित होगा जबकि तमाम नगर निकायों, जमीन और पुलिस तक पर केंद्र का नियंत्रण है। मैं केवल यह कह सकता हूं कि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की तैयारी हरियाणा में कांग्रेस की तुलना में बहुत बेहतर है। देश में राजनीति में बदलाव आने में लंबा वक्त लगता है। परंतु राजनीतिक मौसम बदलते रहते हैं। इसका अंदाजा आपको अभी लग रहा होगा।
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