बिजनेस स्टैंडर्ड - प्रदूषित दिल्ली से हरित पटाखों की राह
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प्रदूषित दिल्ली से हरित पटाखों की राह

ऋत्विक शर्मा /  October 25, 2019

'हम अवैध पटाखे नहीं बेच रहे हैं।' आप इस तरह के नोटिस पुरानी दिल्ली में ऐतिहासिक जामा मस्जिद के आसपास की कुछ दुकानों के बाहर लिखे देख सकते हैं। इन दुकानों के अंदर दो प्रकार के पटाखे मौजूद हैं: फुलझड़ी (स्पार्कल) और अनार (फ्लॉवरपॉट्स)। ये पटाखे भारत के सबसे बड़े शोध एवं विकास संगठन वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) द्वारा 'ग्रीन पटाखों' के लिए निर्धारित फॉर्मूले के अनुकूल हैं। प्रेम फायरवक्र्स के मालिक अंकुर ने अपने स्टोर में आधी भरी हुई अलमारियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि हमने तीन दशक पहले पटाखे की बिक्री का काम शुरू किया था। वर्ष 2016 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिल्ली में पटाखों की बिक्री प्रतिबंधित किए जाने के बाद उन्होंने अपने रिश्तेदारों से कुछ पैसे लेकर पीतल की मूर्तियां बेचना शुरू किया है। हालांकि ग्राहक अभी भी उनके स्टोर पर आते हैं, लेकिन सीमित माल देखकर निराश होकर लौट जाते हैं। वह बताते हैं, 'अगर 10 ग्राहक आ रहे हैं तो एक या दो ही ग्रीन पटाखे खरीद रहे हैं, क्योंकि हमने इन्हें पिछले सप्ताह से ही बेचना शुरू किया है।'

 
वह कहते हैं कि खरीदार ऊंची कीमतों की वजह से भी ग्रीन पटाखों में कम दिलचस्पी दिखा रहे हैं। जहां पांच अनार के डिब्बे की कीमत पहले 150 रुपये हुआ करती थी, वहीं अब यह बढ़कर दोगुनी हो गई है। वहीं 10 फुलझड़ी का पैकेट अब 300 रुपये के बजाय 450 रुपये का हो गया है। अंकुर ग्रीन पटाखों का स्टॉक हरियाणा के झज्जर स्थित एक निर्माता से खरीद कर लाए हैं। एक समय तमिलनाडु के शिवकाशी से लोकप्रिय आतिशबाजी ब्रांड का स्टॉकिस्ट रहे नजदीक के स्टोर के मालिक इसे लेकर झुंझलाहट महसूस करते हैं कि बड़ी तादाद में लोग अधिक लोकप्रिय और ज्यादा शोर करने वाले पटाखों की तलाश कर रहे हैं। इस विक्रेता ने बताया, 'हमारे पास बम नहीं हैं। यह स्टोर पूरा खाली है।' जब एक ग्राहक टॉय गन चलाकर देखता है तो वह तुरंत उसे ऐसा नहीं करने को कहते हैं।
 
दुकान के तीसरी पीढ़ी के मालिक अमित जैन का कहना है, 'पिछले तीन साल से हम अपनी घरेलू बचत पर काम चला रहे हैं। मैं 200 तरह के पटाखे बेचता था। अब यह संख्या महज दो रह गई है।' वह कहते हैं कि उनका व्यवसाय जहां 2015 में लगभग 3 करोड़ रुपये का कारोबार कर रहा था, वहीं अब यह 50 लाख रुपये से कम रह गया है। 2016 में प्रतिबंध के बाद से उनकी दुकान पर टॉय गन जैसे उत्पाद ही बेचे जा रहे हैं। जैन दिल्ली में उन 100 आतिशबाजी थोक विक्रेताओं में शामिल हैं जिनके पास स्थायी लाइसेंस है। पेट्रोलियम ऐंड एक्सप्लोसिव्स सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन (पेसो) ये लाइसेंस जारी करता है। पिछली बार दिल्ली पुलिस की लाइसेंसिंग इकाई ने दीवाली के सप्ताह के दौरान पटाखे बेचने के लिए लगभग 1,100 विक्रेताओं को अस्थायी लाइसेंस दिए थे। जैन ने कहा कि इस बार पिछले सप्ताह तक ऐसे सिर्फ 11 लाइसेंस ही जारी किए गए। दुनिया के बेहद प्रदूषित शहरों में से एक के तौर पर बदनाम दिल्ली ने कुछ वर्षों से पटाखों पर प्रतिबंध की संभावना तलाशने के लिए लगातार अभियान चलाया। हालांकि केंद्र ने इस महीने के शुरू में सुरक्षित और सस्ते विकल्प के तौर पर नए पर्यावरण-अनुकूल पटाखों को मंजूरी दी है, लेकिन बाजार में उपभोक्ता धारणा सुस्त बनी हुई है।
 
दिल्ली के सबसे बड़े थोक बाजार सदर बाजार में भी पटाखा विक्रेता नहीं देखे गए, जबकि पहले यहां इस मौसम में बड़ी तादाद में पटाखा विक्रेता अच्छी खासी बिक्री करते थे। कुछ लोगों का मानना है कि पारंपरिक पटाखों के कुछ विक्रेता अभी भी छिपकर बिक्री करते देखे जा सकते हैं। किचन के उपकरण एवं कलपुर्जे बेचने वाले हरजित सिंह छाबड़ा वर्ष 2015 तक दीवाली के दौरान पटाखे की बिक्री करते थे। इस बार उन्होंने आधिकारिक तौर पर ग्रीन पटाखे बेचने की योजना बनाई है। छाबड़ा कहते हैं, 'मैंने वर्ष 2017 में 5,00,000 रुपये के पटाखों के लिए जीएसटी के तौर पर 90,000 रुपये का भुगतान किया था। मैंने अपनी दुकान शुरू की है और चौथे दिन ही उन्हें पटाखों की बिक्री बंद करने को कहा गया। इसी तरह शराब पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया है?' 
 
त्योहारी जश्न को पर्यावरण-अनुकूल बनाने की कोशिश दशहरे के साथ ही तेज हो गई है। लाल किले में रामलीला का मंचन करने वाली लवकुश रामलीला कमेटी के अध्यक्ष अशोक अग्रवाल कहते हैं कि इस साल दशहरा के दौरान उन्होंने शिवकाशी से ग्रीन पटाखे मंगाए हैं। इनकी कीमत पुराने पटाखों की तुलना में चार गुना ज्यादा है, लेकिन ये कम डेसिबल वाले हैं। अन्य इलाकों की तरह दिल्ली में भी केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ पार्टियां पर्यावरण चिंताओं को लेकर भी राजनीतिक बढ़त बनाने में कसर नहीं छोड़ रही हैं। जहां भाजपा-नीत केंद्र सरकार ने ग्रीन पटाखे शुरू किए हैं, वहीं आम आदमी पार्टी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने दुर्गा पूजा के दौरान मूर्तियों के विसर्जन के लिए कृत्रिम तालाब का निर्माण कराया है, जिससे कि यमुना में प्रदूषण न फैले। 
 
वहां पूजा समिति के अध्यक्ष संजीव सेन ने कहा, 'तालाबों में मूर्ति विसर्जन इस साल एक प्रमुख पर्यावरण-अनुकूल पहल थी। दूसरी बात, चितरंजन पार्क मेला ग्राउंड दुर्गा पूजा में प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं किया गया।' सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता सेन का कहना है कि ये उपाय दिल्ली के लिए बेहद खास हैं। उन्होंने कहा, 'दिल्ली में प्रदूषण चिंताजनक स्तर पर है। मुंबई और कोलकाता जैसे शहर बेहद प्रदूषित हैं, लेकिन दिल्ली को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती से प्रदूषण के खिलाफ सक्रियता बढ़ी है।'
 
दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध के बाद पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय ने दीवाली के दौरान सिर्फ ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल की ही अनुमति दी है। केंद्र ने सीएसआईआर समुदाय से आतिशबाजी से निकलने वाले उत्सर्जन (पार्टिकुलेट मैटर, सल्फर डाई ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड शामिल) की वजह से पैदा होने वाली पर्यावरण चिंताओं को दूर करने के लिए शोध करने को कहा। जनवरी 2018 में नागपुर स्थित राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी शोध संस्थान (नीरी) के नेतृत्व में आठ सीआईएसआर संस्थानों ने ग्रीन पटाखे तैयार करने के लिए एक परियोजना शुरू की।
 
संस्थान ने प्रकाश और ध्वनि प्रदूषण में कमी लाने और पार्टिकुलेट मैटर में 30 प्रतिशत तक की कमी लाने के लिए नए नियम तैयार किए हैं। नीरी की वेबसाइट में कहा गया है कि इन नियमों में बेरियम नाइट्रेट को कवर नहीं किया गया है। बेरियम नाइट्रेट से जी मिचलाने, उल्टी आने, दिल की अनियमित धड़कन, मांसपेशियों में कमजोरी जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। एटम बम, फ्लावर पॉट्स, पेंसिल और स्पार्कल जैसे कुछ पटाखों में बेरियम नाइट्रेट होता है।  तमिलनाडु फायरवक्र्स ऐंड अमोर्सेस मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष पी गणेशन का कहना है कि शिवकाशी में, 60 प्रतिशत निर्माता इस साल ग्रीन पटाखे बना रहे हैं। उद्योग दीवाली सीजन के दौरान लगभग 2,000 करोड़ रुपये कमाता है, लेकिन इस साल 40 प्रतिशत कम व्यवसाय होने की आशंका जताई जा रही है। इस बार दिल्ली-एनसीआर के लिए कम खेपें भेजी जा रही हैं, जबकि यह इसके लिए पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु के साथ साथ एक प्रमुख बाजार है। 
 
दिल्ली के नजदीक, रोहतक (हरियाणा) में बर्ड फायरवक्र्स की एक फैक्टरी में ग्रीन पटाखों की तुलना में हरियाली ज्यादा देखने को मिली है। केशव कालरा के दादा ने 1960 के दशक में अपना पारिवारिक व्यवसाय शुरू किया था। केशव कहते हैं, 'हम कीटनाशकों के बगैर अपनी स्वयं की सब्जियां उगाते हैं। हम अपने बच्चों को पटाखे जलाने से रोकना चाहते हैं। उद्योग ग्रीन पटाखों का स्वागत करता है। यह एक अच्छी पहल है और इसमें हर किसी के हित को ध्यान में रखा जाना चाहिए।' तीन एकड़ के इस संयंत्र में काफी संख्या में पेड़ हैं जिनमें अमरूद, आम, नींबू और किन्नू मुख्य रूप से शामिल हैं। यहां एक पेड़ की छाया के नीचे बैठी बुजुर्ग महिला उन केमिकल को अलग करने के काम में लगी है जिसका नए उत्पादन के दौरान पुन: इस्तेमाल किया जाएगा। इस ग्राउंड का एक हिस्सा दूर से सुइयों का बिस्तर जैसा लगता है। यहां ग्रीन फुलझडिय़ां सुखाने के लिए बिछाई गई हैं।
 
फैक्टरी में उत्पादन के विभिन्न चरणों के लिए कई कमरे हैं और स्टोर की अंदरूनी दीवार लाल रंग की है और इस पर अग्नि सुरक्षा उपकरण लगा हुआ है। यहां का पूरा डिजाइन पेसो के मानकों के अनुरूप है। कमरों के अंदर, दो महिलाएं उत्पादों की पैकिंग कर रही हैं जिसे ग्रीन पटाखों के लिए जरूरी लोगो और क्विक रिस्सपोंस (क्यूआर) कोड के साथ बॉक्स में भरा जाएगा। बर्ड फायरवक्र्स की फैक्टरी के बुजुर्ग श्रम सुपरवाइजर शिकायत के लहजे में कहते हैं, 'प्रदूषण पराली जलाने की वजह से हो रहा है और इसके लिए हमें जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। पिछले तीन वर्षों में हमारी आजीविका बुरी तरह से प्रभावित हुई है। हम कई महीनों तक बेरोजगार रहे और जहां-तहां दैनिक मजदूर के तौर पर काम करना पड़ा।'
 
फैक्टरी के गोदाम में 35,000 किलोग्राम तक पटाखे रखने की जगह है। पिछले महीने उत्पादन पुन: शुरू होने के बाद ग्रीन पटाखों की कुछ ही पेटियां रखी हुई हैं। वर्ष 2016 से पहले बर्ड फायरवक्र्स का सालाना कारोबार 4-4.5 करोड़ रुपये था। यह रोहतक में इस कंपनी की दूसरी फैक्टरी है। कालरा का कहना है कि इस साल उन्हें 30-40 लाख रुपये से ज्यादा का कारोबार होने की संभावना नहीं है। श्रम और उत्पादन दोनों में कमी से उनका परिवार इस्पात निर्माण और रेस्तरां व्यवसाय में शामिल हो गया है। कालरा का सवाल यह है कि जहां वाहन उद्योग को बीएस-4 अनुकूल कारों के निर्माण पर अमल के संदर्भ में समय दिया गया था, तो पटाखा डीलरों को अपना पुराना स्टॉक बेचने से तुरंत क्यों रोका जा रहा है, जबकि इसकी एक्सपायरी तारीख तीन-चार साल बढ़ाई जा सकती है। वह कहते हैं, 'आप तब तक किसी उत्पाद पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते जब तक कि उसका विकल्प मौजूद न हो।'
 
जहां नीरी ने प्रदूषण घटाने के लिए निर्माताओं को उनके पारंपरिक पटाखों में बदलाव लाने में मदद की है, वहीं दोनों पक्षों को इसके लिए गैर-बाध्यकारी समझौता करने की जरूरत थी। इस समझौते के तहत ब्रांड अपने उत्पाद के डिब्बों पर इनके फॉर्मूलेशंस का जिक्र नहीं कर सकते थे। लेकिन कालरा का कहना है कि उन्हें पेसो  के दिशा-निर्देशों के तहत अपने फॉर्मूलेशनों का खुलासा करने की जरूरत है। उन्हें आशंका है कि नियामकीय टकराव से लाइसेंस रद्द किए जाने का खबरा बढ़ सकता है, क्योंकि निर्माता या तो आरऐंडडी इकाई या सरकारी विभाग के मानकों के उल्लंघन का जोखिम उठा रहे हैं। अन्य चिंता ग्रीन पटाखों के टिकाऊ होने की गारंटी नहीं होना है, क्योंकि लंबी अवधि को लेकर इनका परीक्षण नहीं किया गया है। सीमित परीक्षण इकाइयों की वजह से ग्रीन पटाखों को बड़ी मात्रा में तैयार करने में विलंब की आशंका बढ़ गई है। 
 
चार साल पहले तीन बच्चे उस वक्त सुर्खियों में आ गए थे जब उनके माता-पिता ने पटाखों के खिलाफ याचिका में उन्हें वादी बनाया। इनमें से एक बच्चे के पिता गोपाल शंकरनारायणन गैर-लाभकारी एडवोकेसी गु्रप 'केयर फॉर एयर' के सह-संस्थापक हैं। समूह की अध्यक्ष ज्योति पांडे लवकरे का मानना है कि इस याचिका में न सिर्फ पटाखों बल्कि फसल जलाने जैसी वायु प्रदूषण से संबंधित अन्य समस्याओं पर भी चिंता जताई गई थी। लवकरे ने जोर देकर कहा कि आतिशबाजी उद्योग काफी हद तक असंगठित है और श्रमिकों को जोखिम में डालने तथा बच्चों को रोजगार में लगाने के लिए इसकी आलोचना होती रही है। इसलिए, कार्य स्थल पर पुन:कौशल एक स्वच्छ उद्योग की दिशा में बेहतर विकल्प है। वह कहती हैं कि सहभागिता से इस दिशा में काफी मदद मिल सकती है। भारतीय आतिशबाजी उद्योग का सालाना कारोबार 6,000 करोड़ रुपये से अधिक का है और इसकी वृद्घि दर लगभग 10 प्रतिशत पर है। नीरी के अनुसार इस उद्योग में परोक्ष या अपरोक्ष तौर पर लगभग पांच लाख परिवार अपनी रोजी रोटी कमा रहे हैं।
 
लवकरे कहती हैं कि ग्रीन पटाखे 30 प्रतिशत कम उत्सर्जन करते हैं,  जो पूरी तरह पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा, 'हम एक ऐसा विकासशील देश हैं जहां स्वस्थ लोगों की जरूरत है। हमें स्वयं को पटाखे जलाने से रोकना चाहिए। यदि हमें ऐसा करना चाहिए तो यह सामुदायिक तौर पर होना चाहिए, जैसा कि हम विदेशों में देखते हैं।' क्या लोग इस बदलाव के लिए तैयार हैं? जामा मस्जिद के पास दुकानों में खरीदार कम पटाखे खरीद रहे हैं। एक ग्राहक ने कहा, 'इसके स्वास्थ्य फायदे हैं, खासकर बुजुर्ग और बच्चों के लिए पटाखे ज्यादा नुकसानदायक हैं। हम अब पारंपरिक पटाखे नहीं चाहते। इसके अलावा, यदि वे अवैध रूप से उपलब्ध हों भी तो मध्यम आय वर्ग के लोगों के पास इन पर खर्च करने और जोखिम उठाने के लिए अतिरिक्त पैसे नहीं हैं।'
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