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आपसी समन्वय से होगा जल संकट का निदान

मिहिर शाह /  October 25, 2019

जल जीवन अभियान की सफलता के लिए पूरे देश की सरकारों को नागरिक समाज के संगठनों के साथ करीबी रिश्ता बनाना होगा। विश्वविद्यालयों और अकादमिक जगत की बेहतरीन प्रतिभाओं को भी अपने साथ जोडऩा होगा। बता रहे हैं मिहिर शाह

 
पानी को ढांचागत क्षेत्र में भारत के सबसे अहम संसाधन के तौर पर समुचित मान्यता नहीं मिली है। इससे भी कम महत्त्व इस बात को दिया जाता है कि पानी के प्रबंधन से जुड़े सुधार सबसे कम हुए हैं। सुधारों का अभाव न केवल करोड़ों लोगों की जिंदगी एवं आजीविका को खतरे में डाल सकता है बल्कि भारत की आर्थिक वृद्धि को भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। आजादी के बाद से ही जल प्रबंधन ऐसी स्थिति का शिकार रहा है कि पानी पीने वाले बाएं हाथ को पता नहीं होता कि सिंचाई वाला दूसरा हाथ क्या कर रहा है और सतही जल के दाएं पैर को नहीं पता होता कि भूमिगत जल का बायां पैर कहां पर है?
 
ऐसे अनगिनत मौके हैं जहां पेयजल स्रोत इसलिए सूख गया है कि किसानों ने उसका इस्तेमाल अपनी फसलों की सिंचाई के लिए भी शुरू कर दिया। भूमिगत जल का हद से ज्यादा दोहन होने से नदियों के सूखने की रफ्तार बढ़ गई है क्योंकि भूमिगत जल ही मॉनसून खत्म होने के बाद नदियों में प्रवाह बनाए रखता है। नदी प्रवाह और उसकी गुणवत्ता भी जलग्रहण क्षेत्रों के नष्ट होने से प्रभावित हुई है। बाढ़ आने की आवृत्ति भी बढ़ गई है क्योंकि अतिरिक्त जल की निकासी के प्राकृतिक इंतजाम या तो अवरुद्ध कर दिए गए हैं या अतिक्रमण का शिकार हो गए हैं।
 
पानी से संबंधित हरेक चुनौती की जड़ें उस तरीके से जुड़ी हैं जिसके आधार पर देश में मौजूद जलभंडारों का विभाजन किया गया है। तमाम क्षेत्रों के बीच कोई सार्थक संवाद नहीं होने का भी इस पर असर पड़ा है। ये हालात पैदा होने की वजह यह है कि हमने पानी के बहुआयामी चरित्र को ठीक से नहीं समझा है। सतही जल के प्रबंधन का दायित्व केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के पास है जबकि केंद्रीय भू-जल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) भूमिगत जल की निगरानी करता है। हरेक राज्य में भी इनके समकक्ष संगठन मौजूद हैं। इन संगठनों के गठन के बाद से ही अब तक इनमें कोई सुधार नहीं हुआ है। वे काफी हद तक स्वतंत्र तरीके से काम करते रहे हैं और अक्सर एक-दूसरे के खिलाफ भी खड़े हो जाते हैं।
 
त्रासद स्थिति है कि भारत में पानी का दो-तिहाई से भी अधिक पानी भूजल होने के बावजूद इसकी बढ़ती अहमियत के उलट केंद्र एवं राज्यों के स्तर पर भूजल विभाग कमजोर होते गए हैं। इससे भी बुरा यह है कि सतही जल मुख्य रूप से सिविल इंजीनियरों के भरोसे है जबकि भूजल की देखरेख करने वाले जल-भूविज्ञानी इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज करते हैं कि पानी की बेहतर साज-संभाल के लिए विभिन्न विषयों के पेशेवरों की जरूरत है। अपनी नदियों में नई जान फूंकने की भारत की प्रतिबद्धता और जन समर्थन के बावजूद हमारे पास देश में कहीं भी जल प्रबंधन से जुड़े किसी भी संगठन में कोई नदी पारिस्थितिकी-विशेषज्ञ या पारिस्थितिकी अर्थशास्त्री नहीं रहा है। पानी की अधिक जरूरत वाली फसलों चावल, गेहूं और गन्ना के प्रभुत्व वाले कृषि क्षेत्र में पानी का सबसे ज्यादा उपभोग होता है लेकिन जल प्रबंधन कर रही अफसरशाही में एक भी कृषि-विज्ञानी नहीं है। पानी की बेहतर देखभाल वहीं हो पाई है जहां स्थानीय समुदाय ने भी खुलकर साथ दिया है, चाहे वह भूमिगत जल का प्रबंधन हो या कमान एरिया विकास का मामला हो, लेकिन जल विभागों ने कभी भी किसी सामाजिक संगठनकर्ता को जगह नहीं दी है। सरकारों ने बाहरी सरकारों के साथ संस्थागत साझेदारी भी नहीं बनाई है जिससे उसे जरूरी बौद्धिक एवं सामाजिक पूंजी- नागरिक समाज, बुद्धिजीवी या कंपनी जगत का साथ मिल सकता था।
 
भारत सरकार की तरफ से सीडब्ल्यूसी एवं सीजीडब्ल्यूबी के पुनर्गठन के लिए बनी समिति ने 2015-16 में जल प्रबंधन के लिए एकदम नया ढांचा बनाने का सुझाव दिया था। इसकी अध्यक्षता करते हुए मैंने सीडब्ल्यूसी एवं सीजीडब्ल्यूबी के विलय का प्रस्ताव रखते हुए एकदम नया राष्ट्रीय जल आयोग (एनडब्ल्यूसी) बनाने की बात कही थी। उस रिपोर्ट को सरकार के भीतर एवं बाहर खूब सराहा गया। जल संसाधन मंत्रालय, नीति आयोग एवं प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी इसकी वकालत की थी। भारत में सामाजिक विज्ञान के अग्रणी जर्नल इकनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली ने इस रिपोर्ट के तमाम पहलुओं को समर्पित एक समूचा अंक ही निकाला था। हालांकि इस रिपोर्ट पर सरकार की तरफ से ठोस कार्रवाई का अब भी इंतजार है।
 
जलशक्ति मंत्रालय का गठन पहला अहम कदम है। सिंचाई एवं पेयजल विभागों को एक मंत्रालय में ला दिया गया है। अब दोनों विभागों को एक दूसरे से करीबी तालमेल बिठाते हुए काम करना होगा। असली परीक्षा उस समय होगी जब महत्त्वाकांक्षी जल जीवन अभियान लागू होना शुरू होगा। देशवासियों को साफ एवं सुरक्षित पेयजल मुहैया कराने का अकेला तरीका यही है कि हम जलस्रोत को मात्रात्मक एवं गुणात्मक दोनों स्तरों पर टिकाऊ बनाए रखें। इसके लिए जरूरी पानी का बड़ा हिस्सा जलभंडारों से पहुंचाया जाएगा जिनका इस्तेमाल सिंचाई के लिए भी होता है। सिंचाई एवं पेयजल विभागों के साथ मिलकर काम किए बगैर जलभंडार को टिकाऊ नहीं बनाए रखा जा सकता है। इसके अलावा भागीदारी-आधारित प्रबंधन के बगैर इन जलभंडारों में भूमिगत जल खत्म होने लगेगा जिससे हालात बिगड़ते जाएंगे। इसके लिए देश भर में तेजी से गायब हो रहे भूजल विभागों को सशक्त करने के साथ भूजल के प्रबंधन में प्राथमिक हितधारकों को करीब लाना होगा।
 
अगर जल जीवन अभियान को सफल होना है तो पूरे देश की सरकारों को नागरिक समाज के संगठनों के साथ करीबी रिश्ता बनाना होगा। इसके अलावा विश्वविद्यालयों एवं अकादमिक जगत की बेहतरीन प्रतिभाओं को भी अपने साथ जोडऩा होगा। जल भंडारों का मानचित्रण एवं प्रबंधन का विशद कार्य इस अभियान की कामयाबी के लिए एक पूर्व-शर्त है और इसे अकेले सरकार ही अंजाम नहीं दे सकती है। सबसे बड़ी बात, किसानों को इस अभियान में केंद्रीय भूमिका देनी होगी। एक बार वे अपने खेतों के नीचे मौजूद पानी के स्वभाव को समझ लेंगें तो वे अपनी फसलों के चयन एवं पानी के इस्तेमाल में कहीं बेहतर फैसला कर पाएंगे। लेकिन जल प्रबंधन में सबसे अहम बदलाव भारत सरकार की फसल खरीद नीतियों में करने की होगी। किसानों को निम्न जल उपयोग वाली फसलों का एक स्थिर बाजार नहीं मुहैया कराने तक जल जीवन अभियान के तहत चिह्नित जलभंडारों का अत्यधिक दोहन होता रहेगा और भारत के लोगों के लिए जल सुरक्षा एक सपना ही बना रहेगा। इसका मतलब है कि कृषि, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण और महिला एवं बाल विकास मंत्रालयों को भी जल शक्ति मंत्रालय के साथ करीबी तालमेल बिठाने की जरूरत होगी। केंद्र एवं राज्य दोनों स्तरों पर यह काम करना होगा।
 
(लेखक शिव नाडर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एवं योजना आयोग के पूर्व सदस्य हैं)
Keyword: water, crisis, river,,
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