बिजनेस स्टैंडर्ड - आरसेप से परे
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आरसेप से परे

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  October 25, 2019

ओस्लो संधि पर हस्ताक्षर करने वाले इजरायल के राजनेता शिमॉन पेरेज (वह इजरायल के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति रहे) ने कहा था कि एक बार अगर आप शत्रु के साथ बातचीत करने लगते हैं तो आपको पता चलता है कि आपको इससे पहले अपने लोगों के साथ बातचीत करनी होगी। व्यापार वार्ताएं किसी शत्रु के साथ नहीं की जातीं क्योंकि व्यापार में तो सबका फायदा होना होता है। इसके बावजूद क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसेप) को लेकर चल रही लंबी तनावपूर्ण चर्चा जिस तरह खिंची है उससे यह स्पष्ट होता है सरकार को असली चर्चा भारतीय कारोबारों के बीच करनी होगी। देश का कारोबारी जगत एक और मुक्त व्यापार समझौते को लेकर चौकन्ना है। आरसेप पर हस्ताक्षर करना या इससे इनकार करना आने वाले महीनों में मौजूदा सरकार द्वारा लिया जाने वाला सबसे अहम निर्णय होगा। पूर्वी एशिया की सभी अर्थव्यवस्थाओं और ऑस्ट्रेलिया तथा आसपास के सभी देशों को शामिल करने वाले इस समूह से बाहर रहने की भी कीमत चुकानी होगी। यह क्षेत्र दुनिया की शीर्ष आर्थिक महाशक्ति बन चुका है। 

 
वैश्विक जीडीपी की 40 फीसदी हिस्सेदारी इस क्षेत्र से आती है और कारोबार में सबसे अधिक हिस्सेदारी के साथ-साथ आर्थिक वृद्घि दर के मामले में भी यह शीर्ष पर है। इससे बाहर रहने का अर्थ होगा भारतीय निर्यातकों को अहम बाजार में शुल्क संबंधी तथा गैर शुल्क बाधाओं का सामना करना होगा। इस संधि में बाद में शामिल होना जोखिम भरा हो सकता है क्योंकि तब चीन भारत के प्रवेश को बाधित करने का प्रयास करेगा। देश के बाजारों को चीन तथा अन्य क्षेत्रीय देशों से होने वाले अबाध आयात से पाट दिए जाने की तुलना में क्या इससे बाहर रहने की कीमत छोटी नहीं मानी जाएगी? इस घुमाऊ सवाल को लेकर सरकार की प्रतिक्रिया की बात करें तो सरकार हस्ताक्षर करना चाहती है लेकिन वह यह भी चाहती है कि इन देशों से सस्ते आयात की बाढ़ घरेलू उत्पादकों को कारोबार से बाहर ही न कर दे। सरकार ऐसे सुरक्षा उपाय कर पाएगी या नहीं यह देखना होगा। असली परीक्षा तब हो सकती है जब उसे बिना इन सुरक्षा उपायों के हस्ताक्षर करने को कहा जाए। सच तो यह है कि वास्तविक मुद्दे, हस्ताक्षर करने या न करने जैसे दो पहलुओं से एकदम अलग हैं। 
 
असल बात यह है कि आरसेप सदस्यता पर हस्ताक्षर करने के बावजूद देश को लाभ मिलना कैसे सुनिश्चित किया जाए। दूसरे शब्दों में घरेलू अर्थव्यवस्था को बढ़ी हुई आयात प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार रहना चाहिए। इसके लिए उसे किफायत बढ़ाने, बिजली की तार्किक कीमत तय करने (किसानों को सब्सिडी देने के लिए औद्योगिक उपभोक्ताओं पर कर लगाना), उत्पादकता बढ़ाने (मसलन यदि डेरी क्षेत्र में न्यूजीलैंड से प्रतिस्पर्धा मिलती है तो), मानकों और प्रमाणन में सुधार करने जैसे कदम उठाने होंगे ताकि गैर शुल्क व्यापार बाधाओं से पार पाया जा सके और वित्तीय लागत कम की जा सके  जो अभी बहुत अधिक है। आखिर में उस मौद्रिक नीति से निजात पानी होगी जिसमें अधिमूल्यित रुपया तमाम निर्यातों पर कर बढ़ाता है और आयात सस्ता होता है। स्वाभाविक बात है कि इसमें व्यवस्थागत बदलाव शामिल है और यह रातोरात नहीं हो सकता। इस दिशा में काम सात साल पहले शुरू हो जाना चाहिए था जब आरसेप को लेकर वार्ता आरंभ हुई। 
 
आखिरकार, यदि इस क्षेत्र की हर दूसरी अर्थव्यवस्था चाहे वह वियतनाम हो या कंबोडिया, फिलीपींस या म्यांमार, खुले क्षेत्रीय व्यापार के माहौल में काम कर सकती है तो समस्या आरसेप या अन्य कोई मुक्त व्यापार समझौता नहीं बल्कि वह देश है जिसने हस्ताक्षर तो कर दिए लेकिन घरेलू अर्थव्यवस्था की नि:शक्तता से नहीं निपट सका। भारत को बदलाव लाना होगा और सबसे अहम बचाव यही होगा कि वह जरूरी घरेलू बदलावों को अंजाम देने के लिए समय हासिल कर सके। चीन ने विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने के पहले यही किया था। बाद के वर्षों में उसने जबरदस्त सफलता हासिल की। भारत को उससे सबक लेना चाहिए। ऐसे में इस बातचीत का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अर्थव्यवस्था को मुक्त व्यापार के माहौल के लिए तैयार करने को लेकर कुछ नहीं किया जा रहा है। बिजली कीमतों को लेकर कोई सुधार नहीं किया गया है। गो संरक्षण के इस दौर में कोई डेरी को किफायती बनाने की बात नहीं कर रहा। सरकार के तमाम प्रभावशाली लोग अधिमूल्यित रुपये की लागत से अनभिज्ञ नजर आ रहे हैं। ऐसे में रिजर्व बैंक की ब्याज दर कटौती भी निष्प्रभावी साबित हो रही है। अगर यह सब नहीं बदलता है तो भारत आरसेप पर हस्ताक्षर करे या नहीं, कोई खास फर्क नहीं पड़ता। अर्थव्यवस्था का कमजोर प्रदर्शन जारी रहेगा। 
Keyword: RSEP, asian, FTA, GDP,,
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