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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शरद पवार ने जीती हारी हुई बाजी

आदिति फडणीस /  October 24, 2019

इस साल आम चुनावों से पहले महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के माढ़ा लोक सभा क्षेत्र के सांसद विजयसिंह मोहिते पाटिल ने घोषणा की थी कि क्या उनके नेता- शरद पवार को लोक सभा चुनाव लडऩे का फैसला लेना चाहिए। अगर पवार ऐसा करते हैं तो वह दौड़ से हट जाएंगे और अपनी सीट उनके लिए छोड़ देंगे। 

पवार ने इस विचार पर सार्वजनिक रूप से विचार किया। लेकिन जब नामों की घोषणा की गई तो राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) ने सोलापुर जिला परिषद के अध्यक्ष संजय शिंदे को उम्मीदवार के रूप में उतारा। कांग्रेस के एक शीर्ष नेता ने खुलासा किया, 'पवार ने हमारे साथ चर्चा की थी' और वह संभवतया यह सीट जीतने को लेकर आश्वस्त नहीं थे, इसलिए उन्होंने चुनाव नहीं लडऩे का फैसला किया। उन्होंने बताया कि कल्पना कीजिए कि एक जानी-मानी हस्ती और महाराष्ट्र में एक पुराने राजनेता के लोक सभा चुनाव हार जाने पर क्या होता। 

संभव है कि पवार के लिए यही चेतने का वक्त था। उसके बाद पवार ने महाराष्ट्र में अपनी पार्टी के उम्मीदवार चुनने और उन्हें एकजुट करने में अथक मेहनत की। यह सब करना आसान नहीं रहा। चुनाव प्रचार के दौरान जब एक संवाददाता ने पवार से पूछा कि उनके 'जाति भाई' उन्हें छोड़ रहे हैं और राकांपा से निकलकर भारतीय जनता पार्टी में जा रहे हैं। इस पर पवार आपा खो बैठे थे। पवार ने कहा, 'आप मेरे से केवल राजनीति के बारे में पूछ सकते हैं।' उन्हें संवाददाता से कहा, 'इसमें परिवार को क्यों घसीट रहे हैं? आपमें संवाददाता के गुण नहीं हैं।' 

लेकिन असल तथ्य यह है कि इस सवाल ने पवार को बहुत असहज कर दिया था। उस समय चुनावी अभियान चल रहा था और राकांपा के करीब एक दर्जन शीर्ष नेता भाजपा में जा चुके थे। इस घटनाक्रम ने पवार को  मुकाबले के लिए और मजबूत किया। उन्होंने अपना हर क्षण चुनाव प्रचार या अपने सिपहसलारों के साथ रणनीति की चर्चा में इस्तेमाल किया। उनका एकमात्र ध्येय भाजपा-शिवसेना को हराना था। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने चुटकी लेते हुए कहा था कि पवार और पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को छोड़कर विपक्ष का हर नेता भाजपा में शामिल होने की कतार में है। 

पवार का भाजपा का विरोध हमेशा भावनात्मक नहीं रहा है। हालांकि कांग्रेस और राकांपा ने 2014 का लोक सभा चुनाव मिलकर लड़ा था। लेकिन जब 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा के चुनावों के बाद ऐसा लग रहा था कि शिव सेना भाजपा को समर्थन देने में अड़ंगा डाल रही है तो पवार ने बिना शर्त के समर्थन देने की घोषणा की थी। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया है कि वह पवार का सम्मान करते हैं। मोदी ने कुछ साल पहले एक जन सभा में कहा था, 'मैं शरदराव का व्यक्तिगत रूप से सम्मान करता हूं। मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था...तब उन्होंने मुझे राजनीति के गुर सिखाए थे। मुझे सार्वजनिक रूप से यह कहते हुए गर्व का अनुभव हो रहा है।' लेकिन राजनीति उस समय व्यक्तिगत हो गई, जब महाराष्ट्र चुनावों से पहले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने दिवालिया पंजाब ऐंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक से पवार का नाम जोड़ा था। इससे पवार का व्यक्तिगत मामले को राजनीतिक रूप से लडऩे का संकल्प और मजबूत हो गया। 

हालांकि पवार के प्रभाव का आकलन करना मुश्किल है, लेकिन उनके सभी राजनीतिक दलों में प्रशंसक और समर्थक हैं। उनका सबसे बड़ी खूबी यह है कि उनके संबोधनों में भाषणों में नारेबाजी, भाषणबाजी नहीं होती है। वह ज्यादातर तथ्यों पर बात करते हैं और अपने काम पर बात करते हैं। इसके अलावा शरद पवार के बिना राकांपा की कल्पना नहीं की जा सकती है। 

अगर मोदी ने भाजपा के लिए चुनाव जीता है तो पवार ने राकांपा के लिए चुनाव जीता है। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि सातारा की रैली से स्थितियां बदल गईं। जब 79 वर्षीय अस्वस्थ पवार जन सभा को संबोधित कर रहे तो भारी बारिश हो रही थी, लेकिन उन्होंने बारिश में भीगते हुए ही जनता को संबोधित किया। उन्होंने छाता लेने से भी इनकार कर दिया। यह देखकर पार्टी के हजारों कार्यकर्ताओं की आंखों में आंसू आ गए थे। उन्होंने कहा, 'जब आप सभी बारिश से लड़ रहे हैं तो मैं कैसे छाते की आड़ ले सकता हूं।' इसका नतीजा था कि जो लोग पवार को छोड़कर गए, उन्हें हार का सामना करना पड़ा है क्योंकि पवार ने महाराष्ट्र के लोगों में दिलों में राकांपा के लिए फिर जगह बनाई है।

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