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चुनावी नतीजों ने दिखाए मंदी के मायने

संजीव मुखर्जी और अरूप रायचौधरी /  October 24, 2019

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में प्रदर्शन संतोषजनक स्तर से कमजोर रहा है। इससे फिर यह सवाल उठा है कि वह अर्थव्यवस्था को ठीक से नहीं संभाल पा रही है। ऐसे में अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान देने की आवाज उठने लगी हैं। ऐसा लग रहा है कि दोनों राज्यों में बहुत सी सीटों पर ग्रामीण क्षेत्र की निर्णायक भूमिका रही है। 

इन चुनावी नतीजों ने यह भी संकेत दिया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मांग, मजदूरी और खपत में लगातार मंदी ने राजनीतिक जमीं पर भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। हरियाणा में सत्तारूढ़ भाजपा बहुत से थोड़े पीछे रह गई है, जबकि इसने 2019 के आम चुनावों में मोदी लहर की बदौलत राज्य की सभी 10 लोक सभा सीटों पर जीत हासिल की थी। वहीं महाराष्ट्र में भाजपा-शिव सेना की सीटों की संख्या 2014 के विधानसभा चुनावों के मुकाबले 27 कम हो गई हैं। 

सत्तारूढ़ पार्टी के सूत्रों ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े अन्य संगठनों ने स्वीकार किया है कि मतदाताओं ने आर्थिक मुद्दों विशेष रूप से नौकरियों और ग्रामीण संकट से निपटने के सरकार के तरीकों पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। ऐसा लगता है कि भाजपा के संतोषजनक स्तर से कमजोर प्रदर्शन में स्थानीय मुद्दों, राज्य नेतृत्व से असंतोष, जाति और सांप्रदायिक कारकों की भूमिका रही है। लेकिन पार्टी के सूत्रों ने यह भी कहा कि आर्थिक मुद्दे भी जनता के जेहन में थे। पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, 'हम निश्चित रूप से इन मुद्दों को लेकर पार्टी के उच्च पदाधिकारियों और सरकार के साथ चर्चा करेंगे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जमीनी स्थितियों से निपटने के तरीकों में कुछ बदलावों की अत्यधिक जरूरत है।' 

भारत के पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद प्रणव सेन ने कहा, 'हम इसी बात से हैरान थे कि ग्रामीण खस्ताहाली का राजनीति पर असर क्यों नहीं दिख रहा है। संभवतया इसने असर दिखाना शुरू कर दिया है क्योंकि अगर आप उन क्षेत्रों को देखेंगे, जहां भाजपा ने जमीन गंवाई है तो वे ग्रामीण इलाके हैं।' सेन ने कहा कि जब भाजपा राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में हारी थी तो उनकी नीति की दिशा में कोई बदलाव नहीं आया। उन्होंने कहा कि हालांकि अब मंदी की चर्चा जोर पकड़ गई है। 

उन्होंने कहा, 'उम्मीद है कि अब केंद्र ग्रामीण क्षेत्र पर ज्यादा जोर देगा। आखिरकार लोग अपने जीवन के अनुभव के आधार पर मत देते हैं। अब सरकार को उन योजनाओं को ठीक से लागू करने की जरूरत है, जिनकी वह पहले ही घोषणा कर चुकी है।' आधार से जोडऩे की अनिवार्यता जैसे प्रक्रिया से जुड़े कई मुद्दों के कारण कई राज्यों में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की तीसरी किस्त अटकी हुई है। 

भारत सरकार के पूर्व कृषि सचिव शिराज हुसैन ने कहा, 'मेरा मानना है कि इन दो विधानसभा चुनावों के नतीजों का स्पष्ट संदेश यह है कि महज भावनात्मक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने से लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा है, इसलिए आर्थिक मुद्दों विशेष रूप से ग्रामीण आबादी से जुड़े मुद्दों का तत्काल समाधान निकालने की जरूरत है।'

हरियाणा मुख्य रूप से ग्रामीण राज्य है। यहां पिछले दो वर्ष से लगातार फसलों की कीमतें गिर रही हैं। कुछ अनुमानों के मुताबिक यह राज्य उन राज्यों में से एक है, जहां सबसे अधिक बेरोजगारी है। महाराष्ट्र भी औद्योगिक राज्य है। सूत्रों का कहना है कि इस बात के आसार हैं कि राज्य में कुछ सीटों पर मंदी ने अहम भूमिका अदा की हो। अप्रैल-जून तिमाही में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद 5 फीसदी था, जो 2013 के बाद सबसे कम है। नॉमिनल जीडीपी की दर घटकर 8 फीसदी पर आ गई, जो वर्ष 2002-03 की तीसरी तिमाही के बाद सबसे कम है। 

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सभी क्षेत्रों में मंदी के कारण कई उपायों की घोषणा की थी। इसमें से एक कॉरपोरेट कर की दर में कमी करना था। यह कदम पूंजी उपलब्धता और निवेश बढ़ाने की उम्मीद में उठाया गया था ताकि मजदूरी की दरों में भी इजाफा हो। हालांकि ये सब आपूर्ति पक्ष से संबंधित उपाय थे और मांग पक्ष से संबंधित कोई उपाय नहीं किया गया। ग्रामीण क्षेत्रों में मांग अब भी कमजोर बनी हुई है।
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