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दो दशक में भारतीय समाज और राजनीति हो गई ज्यादा संकीर्ण

ए के भट्टाचार्य /  October 24, 2019

बीस वर्ष पहले सन 1998 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार एक भारतीय अमर्त्य सेन को मिला था। इस वर्ष एक अन्य भारतवंशी अभिजित बनर्जी को यह सम्मान मिला है। दोनों घटनाओं में दो दशक का अंतराल है लेकिन ऐसा लगता है कि आज का भारत उस वक्त से एकदम अलग है। इस अंतर को दोनों विजेताओं को सम्मानित किए जाने पर सत्ता प्रतिष्ठान की प्रतिक्रिया से भी समझा जा सकता है। खासतौर पर सत्ताधारी दल के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने बनर्जी को पुरस्कार मिलने पर जो प्रतिक्रिया दी है उससे यह स्पष्टï होता है।

सन 1998 में सेन को सम्मानित करने के नोबेल समिति के निर्णय के बाद चौतरफा सराहना का भाव था। तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने सेन को दिए संदेश में कहा था कि यह बेहद नेकनीयत से दिया गया है और उन्होंने कहा कि वह कामना करते हैं कि सेन आगे लंबे समय तक बेहतर अकादमिक और शोध कार्य करें। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी अपने संदेश में कहा कि उन्हें यह सम्मान मिलना राष्ट्रीय गौरव का विषय है। वाजपेयी सरकार के वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने भी सेन की तारीफ की।

यकीनन बनर्जी को इस वर्ष नोबेल मिलने के बाद भी राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने तत्काल प्रतिक्रिया दी। राष्ट्रपति ने कहा कि बनर्जी के काम ने तमाम अर्थशास्त्रियों को भारत तथा विश्व में गरीबी से लडऩे की बेहतर समझ दी है। मोदी ने गरीबी उन्मूलन में उनके अहम योगदान के लिए उन्हें बधाई दी। सीतारमण ने भी बनर्जी को गरीबी कम करने में योगदान के लिए बधाई दी।

परंतु सत्ताधारी दल के कुछ अन्य नेताओं के सुर इससे अलग थे। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने बनर्जी को नोबेल पुरस्कार मिलने पर बधाई दी लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उनकी सोच वाम रुझान वाली है और भारत के लोगों ने उनकी सोच को नकार दिया है। मंत्री का इशारा कांग्रेस द्वारा 2019 के आम चुनाव घोषणा पत्र में पेश न्याय योजना की ओर था जिसे बनर्जी का समर्थन मिला था। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय सचिव राकेश सिन्हा ने भी बनर्जी के बारे में बहुत आपत्तिजनक टिप्पणी की।

इसकी तुलना सेन से करते हैं। सेन को पुरस्कार मिलने के कुछ ही दिन के भीतर सरकारी विमानन सेवा एयर इंडिया ने जीवन भर की यात्राओं के लिए नि:शुल्क पास की पेशकश कर दी थी। वित्त मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों वित्त सचिव विजय केलकर और मुख्य आर्थिक सलाहकार शंकर एन आचार्य ने उनकी जमकर सराहना की और बधाई दी। तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने भी सेन को बधाई दी थी। संक्षेप में कहें तो सन 1998 में 2019 की तरह कोई आलोचना सुनने को नहीं मिली थी।

बीते दो दशक में क्या बदला? सन 1998 में भी भाजपा की सरकार थी और 2019 में भी वही सत्ता में है। सन 1998 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार को मोदी की तरह बहुमत हासिल नहीं था। संभव है कि वाजपेयी की सरकार गठबंधन साझेदारों पर बहुत हद तक निर्भर थी। मोदी को ऐसी कोई आवश्यकता नहीं थी। दिलचस्प यह है कि वाजपेयी सरकार का दर्शन भी आज की मोदी सरकार के दर्शन से अलग था। वाजपेयी वैश्विक दृष्टिï को लेकर चलते थे। उनकी सरकार आज की तुलना में अधिक समावेशी और सहिष्णु थी। यहां तक कि वाजपेयी सरकार के प्रमुख सदस्यों में से एक मुरली मनोहर जोशी ने भी बिना किसी पूर्वग्रह के सेन को बधाई दी थी। ऐसा तब था जबकि सेन उस राजनीतिक फलक से आते थे जिससे उन्हें या उनकी पार्टी को कोई सहानुभूति नहीं थी। 

इसके विपरीत मोदी सरकार अपनी राजनीतिक मान्यताओं को लेकर काफी आक्रामक है। वाजपेयी सरकार के उलट मोदी सरकार और उसके वरिष्ठï सदस्यों का रुख बहुसंख्यकवादी है। वे अपने प्रतिकूल विचारों को ज्यादा तवज्जो नहीं देते। ऐसे में मोदी ने तो नोबेल विजेता को बधाई दी लेकिन उनकी पार्टी या सरकार के सदस्यों ने आपत्तिजनक टिप्पणी करना या विपक्षी दल को मशविरा देने के लिए उनकी आलोचना करना बंद नहीं किया। 

बहरहाल बनर्जी ने बाद में कहा कि वह सिर्फ एक पेशेवर अर्थशास्त्री हैं और संपर्क करने वाले किसी भी राजनीतिक दल को मशविरा देते हैं। वह कई ऐसी राज्य सरकारों के साथ भी काम कर रहे हैं जो भाजपा शासित हैं। ऐसा नहीं है कि इन सरकारों की वजह से उन्होंने पेशेवर सेवाएं देने से मना किया हो। 

बीते दो दशकों में न केवल भारतीय समाज और राजनीति में बदलाव आया है बल्कि ये अधिक संकीर्ण भी हुए हैं। इस दौरान अर्थशास्त्रियों में भी काफी बदलाव आया है। सन 1998 में जब अमत्र्य सेन को नोबेल पुरस्कार मिला था तब देश की अर्थव्यवस्था को लेकर उनकी टिप्पणी थोड़ी बंधी हुई थी। ऐसी टिप्पणी के बारे में माना जा सकता है कि वह सत्ताधारी दल की प्राथमिकताओं या चिंताओं को लेकर अनावश्यक शर्मिंदगी न उत्पन्न करे। बीते दो दशक में यह बदला है। आज के अर्थशास्त्री पहले वालों से कहीं अधिक निश्चिंत हैं और वे ऐसी टिप्पणियां करने से घबराते नहीं हैं जो उनके देश की सरकारों को नाखुश कर दें। 

यही कारण है कि रघुराम राजन हों, अरविंद सुब्रमण्यन हों या अभिजित बनर्जी, इन सभी ने खुलकर अपनी बात कही। इनके मन में ऐसी कोई चिंता नहीं थी कि उनके नजरिये से सरकार शर्मिंदा हो सकती है। परंतु सरकार द्वारा ऐसी प्रतिकूल टिप्पणियों को हजम न कर पाना हालात को अधिक जटिल और चुनौतीपूर्ण बनाता है। जबकि उसे विचार यह करना चाहिए कि क्या इससे नीति निर्माण में कोई लाभ हो सकता है। यह दुखद है कि सरकार अब तक इस कमजोरी को समझ नहीं पाई है न ही वह आवश्यक संशोधन कर रही है।

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