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वैश्विक निवेशकों से बातचीत का हासिल

आकाश प्रकाश /  October 24, 2019

पिछले दिनों मुझे अमेरिका में एक सप्ताह बिताने का अवसर मिला। वहां मैंने सम्मेलनों में हिस्सा लिया और वैश्विक फंड आवंटकों से मुलाकात की। निवेशकों से मुलाकात के लिए यह समय दिलचस्प था। भारत ने हाल ही में कर दरों में कटौती की थी और न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा का सत्र आरंभ था। इस यात्रा का हासिल इस प्रकार रहा। 

1. भारत को लेकर गहरी रुचि देखने को मिली और लोग यहां के हालात को समझना चाहते थे। ज्यादातर लोग कर कटौती से चकित थे क्योंकि उन्हें सरकार से ऐसी उम्मीद नहीं थी। यह सवाल भी उठा कि कॉर्पोरेशन कर दर में कटौती क्यों की गई, मांग बढ़ाने के अन्य उपाय क्यों नहीं अपनाए गए। ज्यादातर लोगों की जिज्ञासा थी कि मध्य वर्ग के लिए कर कटौती या कुछ वस्तुओं और सेवाओं पर का कटौती क्यों नहीं की गई? भारत को बड़ी और उच्च मुनाफा कमाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अनुकूल नहीं माना जाता जबकि वही इस कटौती से लाभान्वित हुईं। कुछ लोगों ने पूछा कि कंपनियां कर कटौती का प्रयोग कर नकदी प्रवाह कैसे बढ़ाएंगी? अमेरिका में ज्यादा कंपनियां पुनर्खरीद या लाभांश के जरिये कर लाभ देती हैं। निवेशक यह जानने को उत्सुक थे कि भारतीय कंपनियां कैसे अलग हैं। भविष्य के सुधार को लेकर उम्मीद नजर आई। सरकारी परिसंपत्तियों की बिक्री को सकारात्मक माना गया। फिर भी अधिकांश लोग यही मान रहे हैं कि भारत एक जटिल स्थान है और इसे कारोबारी दृष्टिï से सहज बनाने के लिए काफी कुछ किया जा सकता है। 

2. अधिकांश आवंटकों ने माना कि भारत आर्थिक चक्र के निचले स्तर पर है और पांच फीसदी की जीडीपी वृद्घि दर खासी नीची रहेगी। अब जबकि राजकोषीय और मौद्रिक दोनों नीतियां काम पर हैं तो अर्थव्यवस्था में सुधार आना चाहिए। एनबीएफसी संकट शुरू हुए भी एक वर्ष हो चुका है और कम ही लोग मानेंगे कि 2020 में वृद्घि दर में सुधार नहीं होगा। राजकोषीय स्थिति को लेकर चिंता थी लेकिन हर निवेशक को लग रहा था कि आरबीआई का वृद्घि और मुद्रास्फीति को समान तवज्जो देने का मौजूदा रुख सही था। 

3. इस बात को लेकर चिंता थी कि भारत में कॉर्पोरेट मुनाफे में गिरावट में कमजोरी क्यों है? कई लोगों ने पूछा कि क्या देश में किसी बड़े बदलाव के कारण कारोबारी मुनाफे में कमी आई है? हर किसी को भारतीय फंड प्रबंधकों के डेटा या उनके आंकड़ों की जानकारी थी। 2008 में भारत और अमेरिका दोनों जगह कारोबारी मुनाफा जीडीपी के लगभग 7.5 फीसदी के बराबर था। आज अमेरिका में वह 10 फीसदी से अधिक है जबकि भारत में घटकर 3 फीसदी रह गया है। कर कटौती के कारण सात वर्ष में पहली बार आय में सुधार होगा। निवेशकों ने माना कि मुनाफे में हिस्सेदारी लगातार गिरती नहीं रह सकती। अधिकांश यह मानना चाहते थे कि अर्थव्यवस्था में सुधार के बाद कारोबारी मुनाफा सुधरेगा। 

4. निवेशक यह मानना चाहते हैं कि देश में आर्थिक और मुनाफे का चक्र दोनों न्यूनतम स्तर पर हैं और अब उनमें केवल सुधार ही हो सकता है लेकिन मूल्यांकन से जुड़ी आशंका के चलते वे देश में निवेश नहीं करना चाहते। एमएससीआई सूचकांक को देखें तो बाजार का मूल्यांकन कमजोर नहीं दिख रहा। कुछ ही लोग सतह के नीचे शेयरों को पहुंचे नुकसान से अवगत थे। मिड कैप सूचकांक जनवरी 2018 के उच्चतम स्तर से 30 फीसदी नीचे हैं जबकि स्मॉल कैप 40 फीसदी। बाजार के बड़े हिस्से को फिलहाल निवेश योग्य नहीं माना जा रहा। चुनिंदा शेयरों के मूल्य को क्षति पहुंची है। कई शेयर खरीद न होने के कारण नुकसान में हैं। यदि वैश्विक आवंटकों को यह यकीन दिलाया जा सका कि वे शीर्ष 50 कंपनियों से परे निवेश करें तो भारतीय बाजार का मूल्य ठीकठाक है। उस स्थिति में काफी धन आ सकता है। 

5. देश के कारोबारी प्रशासन को लेकर निराशा का माहौल था। कई लोग प्रवर्तकों की धोखाधड़ी और बैलेंस शीट की अनियमितताओं को लेकर स्तब्ध थे। वित्तीय सेवा क्षेत्र के कई खुलासे चिंतित करने वाले हैं। आखिर अंकेक्षक, रेटिंग एजेंसियां और नियामक क्या कर रहे थे? ऐसे खुलासे सामने आते रहे तो दिक्कत बढ़ेगी। शेयरों को गिरवी रखने का पैमाना देखकर निवेश चकित थे। कई लोगों ने कहा कि इस संचालन स्तर के साथ भारत महंगे उभरते बाजारों में शामिल नहीं हो सकता। 

6. कई आवंटक इस बात से परिचित थे कि भारत एक किस्म की सफाई प्रक्रिया से गुजर रहा है। कई कमजोर कंपनियां और प्रवर्तक समूहों को ढहने दिया जा रहा है। अधिकांश ने माना कि ऐसी सफाई शुरुआत में वृद्घि को धीमा करती है। बहरहाल, आगे चलकर वृद्घि में सुधार होता है और अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। अधिकांश ने माना कि बीते चार वर्ष में भारत कई आर्थिक झटके झेल चुका है। पहले नोटबंदी, फिर वस्तु एवं सेवा कर और आखिरकार एनबीएफसी संकट। अर्थव्यवस्था के पास सुधरने का अवसर ही नहीं था। आने वाले वर्षों में जरूर हालात सामान्य हो सकते हैं। 

7. अधिकांश निवेशक एनबीएफसी संकट की तीव्रता से चकित थे। यह भारत के लिए लीमन ब्रदर्स का ही एक छोटा रूप था। इस संकट ने इस क्षेत्र के अधिकांश थोक कारोबारियों के कारोबारी मॉडल को ध्वस्त कर दिया। अर्थव्यवस्था को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। भरोसे की कमी को देखते हुए आवंटकों को लगा कि आरबीआई को निवेशकों को एनबीएफसी के बहीखातों को लेकर आश्वस्त करना चाहिए था। इससे निवेशकों को काफी मदद मिलती। निजी पूंजी जुटने से ही माहौल में सुधार होगा। निजी पूंजी को रेटिंग एजेंसियां या अंकेक्षकों पर भरोसा नहीं। केवल आरबीआई ही इस गतिरोध को दूर कर सकता है। 

8. अधिकांश आवंटकों को यकीन था कि चीन और अमेरिका का तनाव आगे भी बरकरार रहेगा। परिणामस्वरूप चीन में धीमापन आएगा और उसकी अर्थव्यवस्था उच्चतम स्तर देख चुकी है। अधिकांश आवंटक चीन से इतर एशिया के अन्य हिस्सों में अपना निवेश बढ़ाना चाहते थे। 

भारत के पास अवसर है कि वह आने वाले वर्ष में निवेश आकर्षित कर सके। निवेशक समझ रहे हैं कि वृद्घि और आय दोनों एकदम निचले स्तर पर हैं। आवंटक धीमी विश्व व्यवस्था में वृद्घि की बाट जोह रहे हैं। अधिकांश लोग अभी भी मानते हैं कि लंबी अवधि में देश के पास काफी संभावनाएं हैं। अगर हम स्थिर रहे तो हम लाभ उठाने की स्थिति में हैं।

Keyword: Investment, Fund, Liquidity, Economy, Middle Class, Corporation Tax,
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