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वैश्विक रैंकिंग में नहीं दिखती मोदी सरकार की कड़ी मेहनत

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  October 23, 2019

भारत के मौजूदा सामाजिक एवं राजनीतिक परिदृश्य पर अपनी चिंता जाहिर करने वाले नागरिकों पर 'देश की छवि खराब करने' का आरोप बहुत जल्द लग जा रहा है। इसी से जुड़ा एक और आरोप यह होता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शानदार प्रदर्शन को कमतर दिखाने की कोशिश की जा रही है। हाल ही में वापस ली गई राजद्रोह याचिका हमें इस पर यकीन दिला देती। मोदी के प्रति आस्था का पुरजोर बचाव करने वालों को यह समस्या हो सकती है कि मौजूदा समय में अंतरराष्ट्रीय संस्थान ही इस छवि को कमतर और धूमिल करने में लगे हुए हैं।

 
मोदी और शी चिनफिंग की मामल्लपुरम में मुलाकात के ऐन पहले और बाद में तीन संस्थानों ने भारत का आर्थिक वृद्धि अनुमानों को अधिक प्रभावी नहीं रहने की बात कही है। हाल में मूडीज इन्वेस्टर सर्विस ने 2019-20 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का अनुमान 6.2 फीसदी से घटाकर 5.8 फीसदी कर दिया। रिपोर्ट में कहा गया कि इस सुस्ती के कई कारक हैं जो मुख्यत: घरेलू और आंशिक रूप से दीर्घकालिक हैं। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) की नई प्रबंध निदेशक क्रिस्टेलिना जॉजीवा ने भारत और ब्राजील का नाम लेते हुए कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में समकालिक सुस्ती सबसे ज्यादा इन्हीं देशों में नजर आ रही है। हाल ही में आईएमएफ ने इस वित्त वर्ष के लिए भारत के वृद्धि दर अनुमान को सात फीसदी से घटाकर 6.1 फीसदी कर दिया है। इसके बाद विश्व बैंक ने वृद्धि अनुमानों में तगड़ी कटौती करते हुए 7.5 फीसदी से भारी गिरावट के साथ महज छह फीसदी कर दिया है। इसके पहले एशियाई विकास बैंक और फिच ने भी वृद्धि अनुमानों को घटा दिया था। 
 
इस खबर के बाद संपादकीय पृष्ठों पर बांह मरोडऩे या शोरशराबे वाले टीवी शो में हंगामा खड़ा होने के मौके कम ही आए हैं क्योंकि बुनियादी तौर पर ये संस्थाएं ही इस विमर्श के पीछे हैं। आर्थिक गतिविधियों पर नजर रखने वालों को पहले से ही इन बुरी खबरों का अंदेशा था। आरबीआई ने वृद्धि अनुमान को 6.9 फीसदी से घटाकर 6.1 फीसदी कर और उच्च तीव्रता वाले संकेतकों में कटौती कर इसकी चेतावनी बहुत पहले दे दी थी। पहली तिमाही के पांच फीसदी वृद्धि दर के आंकड़े बेहद आशावादी बजट अनुमानों को गलत बताते हैं और दूसरी तिमाही में इसके बदतर होने की आशंका है। और अपने दैनिक जीवन में वृद्धि दर की सुस्ती का असर झेलने वाले भारतीयों को पहले से ही इसका अहसास होने लगा है।
 
गिरते आंकड़ों को लेकर चिंतित ये संस्थान 'देश की छवि खराब करने' में अकेले नहीं हैं। विभिन्न संस्थानों की तरफ से जारी होने वाली वैश्विक रैंकिंग से भी यही लगता है कि 'मोदी का प्रभावी प्रदर्शन' देख पाना मुश्किल है। हाल ही में जारी वैश्विक भूख सूचकांक पर नजर डालें तो भोजन के अधिकार का व्यापक एवं खर्चीला कानून होने के बावजूद भारत को इस सूची में असरदार स्थान नहीं मिला है। वर्ष 2010 में 95वें स्थान पर रहा भारत इस सूचकांक में 2019 में 102वें स्थान पर है। वर्ष 2000 में भूख सूचकांक में 83वें स्थान पर रहे भारत का प्रदर्शन लगातार गिरा है। इन दिनों सार्वजनिक विमर्श को निर्धारित करने वाले व्हाट्सऐप संदेशों की भावना को देखें तो यह कहना सही है कि गरीब-समर्थक कही जाने वाली संप्रग सरकार का प्रदर्शन भी खास अच्छा नहीं था। लेकिन इस बात का जिक्र किया जा सकता है कि उसके बाद सत्ता में आने के लिए मोदी ने विकास के काम अभूतपूर्व तेजी से संपन्न कराने का वादा किया था। कद के अनुपात में कम वजन वाली आबादी 2008-12 के दौरान 16.5 फीसदी थी लेकिन 2014-18 की अवधि में यह 20.8 फीसदी पर जा पहुंची। इस पैमाने में भारत ने यमन और जिबूती को भी पीछे छोड़ दिया है। ऐसे में विकास के चुनावी वादों की सच्चाई पर सवाल उठने लाजिमी हैं।
 
मानव विकास के महत्त्वपूर्ण पैमाने उच्च शिक्षा पर मोदी सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की खास नजर कई तरह से बनी रही है। हालांकि इस साल 2012 के बाद पहली बार कोई भी भारतीय विश्वविद्यालय शीर्ष 300 संस्थानों की टाइम्स हायर एजुकेशन यूनिवर्सिटी रैंकिंग में जगह नहीं बना पाया है। समग्र मानव विकास के मोर्चे पर हालात शायद ही बेहतर हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की 2014 रिपोर्ट में 188 देशों में से 135वें स्थान पर रहने वाला भारत 2018 में 189 देशों में से 130वें स्थान पर रहा।
 
मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, और तमाम घोषित सरकारी कार्यक्रम भारत को औद्योगिक रफ्तार देने के लिए बनाए गए हैं। ऐसे में वैश्विक धारणा के मामले में भारत की रैंकिंग में उछाल आनी चाहिए थी। लेकिन विश्व आर्थिक मंच की तरफ से जारी वैश्विक प्रतिस्पद्र्धात्मकता सूचकांक में भारत 10 पायदान गिरते हुए 141 देशों में 68वें स्थान पर आ गया है। इस गिरावट का कारण यह नहीं है कि भारत ने निर्धारित मानकों पर खराब प्रदर्शन किया है, बल्कि दूसरे देशों का प्रदर्शन कहीं बेहतर रहा।
 
हालांकि भारत ने उन तीन सूचकांकों में सुधार दर्ज किया है जो मोदी की प्राथमिकता में ऊपर रहे हैं। कारोबारी सुगमता सूचकांक में दो साल के भीतर 53 स्थानों की छलांग लगाते हुए भारत 2018 में 190 देशों में से 77वें स्थान पर रहा। वैश्विक भ्रष्टाचार सूचकांक में भी 2018 में भारत तीन स्थान के सुधार के साथ 180 देशों में से 78वें स्थान पर रहा। वैश्विक नवोन्मेष सूचकांक में भारत पांच साल के भीतर 29 स्थान की छलांग लगाते हुए 129 देशों में से 52वें स्थान पर आ गया। कारोबारी सुगमता सूचकांक के तीन पैमानों पर उल्लेखनीय प्रगति के साथ शीर्ष 25 देशों में आ चुका है। लेकिन भारत को 'औसत मध्यम' दर्जे में डालने वाले इन सुधारों को शानदार कहना अतिशयोक्ति ही होगी। यह बात हमें दुनिया बता रही है, 'राष्ट्रद्रोही' भारतीय नहीं। 
Keyword: narendra modi, BJP, ranking,,
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