बिजनेस स्टैंडर्ड - प्याज के आंसुओं की अंतहीन गाथा
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प्याज के आंसुओं की अंतहीन गाथा

रमेश चंद और राका सक्सेना /  October 23, 2019

भौगोलिक विविधीकरण, पूर्व चेतावनी व्यवस्था और सूखे प्याज के विकल्पों को बढ़ावा देने से अगली बार प्याज के संकट से निपटने में मदद मिलेगी। बता रहे हैं रमेश चंद और राका सक्सेना

 
देश में एक बार फिर प्याज की कीमतें आसमान छू रही हैं। पिछले दस साल में यह तीसरा मौका है जब प्याज की कीमतें बेकाबू हुई हैं। मई और जून में प्याज थोक बाजार में 10 रुपये प्रति किलो और खुदरा बाजार में 20 रुपये प्रति किलो के भाव बिक रहा था लेकिन अब देश के अधिकांश बाजारों में इसकी थोक कीमत 35 रुपये किलो और खुदरा कीमत 60 रुपये किलो के पार पहुंच गई है। किसी भी फसल की अंतर-वर्ष मूल्य अस्थिरता और अंतर -वर्ष असामान्य कीमत से उत्पादक और उपभोक्ता दोनों को नुकसान होता है और साथ ही अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है। इसे देखते हुए कीमतों में असामान्य उतार-चढ़ाव को जानने और इसके समाधान के लिए व्यावहारिक विकल्प ढूंढना जरूरी है। 
 
कीमतों में बार-बार असामान्य उछाल से भारतीय उपभोक्ताओं के व्यवहार में एक दिलचस्प बदलाव का खुलासा होता है। इस पर चर्चा करने से पहले प्याज उत्पादन के रुझानों और देश में इसकी उपलब्धता पर नजर डालनी जरूरी है। हाल में दिनों में प्याज सबसे तेजी से बढऩे वाली फसल रही है। 2004-05 से 2018-19 के दौरान इसकी सालाना वृद्घि दर 10 फीसदी रही जबकि घरेलू उत्पादन 64.3 लाख टन से बढ़कर 2.349 लाख टन पहुंच गया। 2004-05 में इसकी प्रति व्यक्ति उपलब्धता 5.15 किलो थी जो 2018-19 में तीन गुना बढ़कर 15.7 किलो पहुंच गई। खाद्य पदार्थों के मामले में प्रति व्यक्ति खपत के हिसाब से देश में प्याज के बाद खाद्य तेल का स्थान है। जाहिर है कि भारतीय तेजी से मसालेदार और तेलयुक्त खाद्य पदार्थों का रुख कर रहे हैं जबकि सरकार का लक्ष्य पोषाहार को बढ़ावा देना है।
 
यह वास्तव में आश्चर्य की बात है कि प्याज की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में भारी बढ़ोतरी के बावजूद, इसकी मात्रा में थोड़ी कमी से ही कीमत में भारी उछाल आती है। यह औसत भारतीय के खपत व्यवहार में बदलाव और इसे संभालने की व्यवस्था में कमी की ओर इशारा करता है। हालांकि प्याज देश के लोगों का मुख्य आहार नहीं है और इसका इस्तेमाल शोरबा बनाने और सलाद में किया जाता है। लेकिन इसकी भारी मांग से साबित होता है कि लोग इसकी खपत में कमी को लेकर कोई समझौता नहीं करना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि उपभोक्ता इसका इस्तेमाल छोडऩे के बजाय सामान्य कीमत से तीन-चार गुना दाम देने को तैयार हैं। सामाजिक दबाव के कारण भी लोग प्याज की खपत नहीं घटाना चाहते हैं। वे ऐसा नहीं दिखाना चाहते हैं कि बढ़ी कीमत के कारण वे प्याज नहीं खा रहे हैं। 
 
हाल के हफ्तों में प्याज की कीमतों में बढ़ोतरी का मुख्य कारण उत्पादन में कमी है। महाराष्ट्र देश में प्याज का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है और यहीं से इसकी कीमत तय होती है। राज्य के कुछ हिस्सों में सूखे जैसे हालात के कारण रबी के पिछले मौसम में प्याज का रकबा बहुत घट गया था। इस कारण राज्य में प्याज के सालाना उत्पादन में 9.11 फीसदी की कमी आई। यही वजह है कि नेफेड ने जून में रबी की फसल के तैयार होने के बाद प्याज की रिकॉर्ड खरीद की ताकि सितंबर से नवंबर में कम आपूर्ति के दौरान प्याज की कीमतों को संभाला जा सके। खरीफ के मौसम में उगाई जाने वाली प्याज की दूसरी फसल महाराष्ट्र के प्याज उत्पादक क्षेत्रों में भारी बारिश और बाढ़ के कारण बरबाद हो गई। प्याज के उत्पादन में कमी की आशंका के कारण कीमतों में बढ़ोतरी हुई है।
 
पिछले वर्षों की तरह इस बार भी सरकार ने प्याज की कीमतें बढऩे पर व्यापारियों के लिए प्याज की भंडारण सीमा तय की और इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया पहले कदम का मकसद इसकी जमाखोरी रोकना है और दूसरे का लक्ष्य निर्यात के लिए जा रही फसल को घरेलू बाजार की तरफ मोडऩा है। कुछ लोगों ने सरकार के इस फैसले की आलोचना की है जो इसकी मूल्य की स्थिति को समग्रता के साथ नहीं देखते। खाद्य पदार्थों के व्यापार में मामले में भारत और अधिकांश अन्य देश मुक्त व्यापार के बजाय रणनीतिक उदारीकरण की नीति का पालन करते हैं। इस नीति में उत्पादन की कमी से निपटने के लिए आयात को उदार बनाया जाता है और निर्यात प्रतिबंधित किया जाता है। दूसरी ओर बंपर फसल होने पर इसका उलटा होता है यानी आयात पर प्रतिबंध लगाया जाता है।
 
इस नीति के मुताबिक किसानों को कम कीमत से बचाने के लिए अक्सर कृषि और खाद्य जिंसों के आयात पर प्रतिबंध लगाया जाता है। हालांकि उपभोक्ताओं को इसका खमियाजा भुगतना पड़ता है। मौजूदा स्थिति उपभोक्ता के हित में है क्योंकि तीन महीने की कम अवधि में प्याज की कीमतें तीन गुना बढ़ गई हैं। कीमतों में बढ़ोतरी से उन किसानों को मोटा मुनाफा हुआ है जिन्होंने अपनी रबी की फसल बेचने का इंतजार किया। नवंबर में बाजार में खरीफ की फसल आनी शुरू होगी या कीमतें सामान्य होंगी, तो निर्यात पर से प्रतिबंध हटने से किसान प्रभावित नहीं होंगे।
 
कीमतों में बार-बार उतार-चढ़ाव और मांग एवं आपूर्ति की मौजूदा स्थिति से भविष्य में मूल्यों को स्थिर रखने के लिए कई सबक मिलते हैं। पहला सबक यह कि प्याज की कीमतों में कमी के लिए पूरे साल इसकी निरंतर आपूर्ति की जरूरत है। हालांकि उत्पादन में उतार-चढ़ाव आ सकता है। कीमतों को स्थिर रखने के लिए सार्वजनिक भंडारण पर निर्भरता जरूरी है। हम निजी क्षेत्र से भूमिका निभाने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं क्योंकि कीमतों में किसी भी तरह के उतार-चढ़ाव से निजी क्षेत्र को फायदा होता है। अगर नेफेड ने कीमत स्थिरीकरण कोष के रूप में 53,000 टन प्याज की खरीद नहीं की होती तो इसकी कीमतें आसमान पर पहुंच गई होतीं। इसमें से महाराष्ट्र से 45.53 हजार टन प्याज खरीदा गया था जिसे बाजार में उतारा गया। देश को मौसमवार उत्पादन और मांग के मुताबिक रबी और खरीफ के मौसम के अंत में प्याज का उचित भंडार रखना चाहिए। यह न केवल उपभोक्ताओं बल्कि किसानों के लिए भी फायदेमंद होगा। 
 
साथ ही कच्चे प्याज के विकल्प के रूप में प्रसंस्कृत उत्पादों जैसे निर्जलित प्याज और प्याज पेस्ट को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। एक उपाय यह है कि देश के प्याज उत्पादन का आधार बहुत कम है और इसमें महाराष्ट्र का एक-तिहाई योगदान है। मौसम में अनियमितताएं बढ़ रही है जिससे भविष्य में उत्पादन में उतार-चढ़ाव बढऩे की आशंका है। भौगोलिक विविधीकरण और कुछ नए इलाकों में प्याज की खेती, खासकर उत्तरी राज्यों में खरीफ के मौसम में प्याज उगाने से उत्पादन में उतार-चढ़ाव और कीमतों में अस्थिरता पर लगाम लगाने में मदद मिलेगी। साथ ही अलग-अलग इलाकों के अनुकूल प्याज की किस्में विकसित करने की जरूरत है ताकि बाजार में हर मौसम में प्याज की आपूर्ति बनी रहे। इसके अलावा प्याज के बारे में बाजार के खुफिया तंत्र को मजबूत करने की जरूरत है और एफएओ की चेतावनी व्यवस्था की तर्ज पर पूर्व समायोजन व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए। इस व्यवस्था के तहत अगले सत्र में अनुमानित कीमतों के बारे में किसानों को परामर्श जारी किया जाना चाहिए ताकि वे उसके हिसाब से रकबा घटा-बढ़ा सकें। इन उपायों से देश में प्याज के आंसुओं के चक्र को रोका जा सकता है। 
 
(चंद नीति आयोग के सदस्य हैं। सक्सेना राष्ट्रीय कृषि आर्थिकी एवं नीति अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली में प्रधान अर्थशास्त्री हैं। ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं।) 
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