बिजनेस स्टैंडर्ड - निजीकरण ही उपाय
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निजीकरण ही उपाय

संपादकीय /  October 23, 2019

केंद्रीय संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मंगलवार को संवाददाताओं को यह जानकारी दी कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सरकारी दूरसंचार कंपनियों भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) और महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (एमटीएनएल) को लेकर निर्णय ले लिया है। उन्होंने कहा कि दोनों कंपनियों का विलय किया जाएगा और दिल्ली तथा मुंबई में संचालित एमटीएनएल, तब तक बीएसएनएल की अनुषंगी होगी। वर्ष 2019-20 के बजट के मुताबिक दोनों कंपनियों को आंतरिक तथा बाहरी बजट संसाधनों से 15,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जुटानी थी। इस पैसे को बॉन्ड जारी करके जुटाया जाएगा जिसकी भरपाई सरकारी कंपनियां करेंगी लेकिन इनकी गारंटी केंद्र सरकार देगी। जाहिर है यह राशि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है क्योंकि बीएसएनएल खुद भारी घाटे में है। अकेले 2018-19 में इस सरकारी कंपनी को 14,000 करोड़ रुपये का घाटा हुआ। इसके साथ ही उसका समेकित घाटा 90,000 करोड़ रुपये का स्तर पार कर गया। एमटीएनएल की बैलेंस शीट में 20,000 करोड़ रुपये का घाटा है। 

 
प्रश्न यह है कि क्या सरकार वाकई यह मानती है कि इन कंपनियों को दूरसंचार क्षेत्र में उपयोगी योगदान करने वाली कंपनियों में शामिल किया जा सकता है। सकारात्मक पहलू देखें तो इन सरकारी कंपनियों के पास करीब 70,000 करोड़ रुपये या उससे अधिक मूल्य की जमीन है। परंतु इन कंपनियों को लेकर नकारात्मक बातों की भी कमी नहीं है। मिसाल के तौर पर भारी भरकम वेतन बिल। बीएसएनएल और एमटीएनएल के 200,000 कर्मचारियों के वेतन भत्ते में बहुत धनराशि व्यय होती है। बीएसएनएल की बात करें तो उसके खर्च का 77 फीसदी हिस्सा वेतन में जाता है। मंत्रिमंडल ने जिस पुनरुत्थान योजना को मंजूरी दी है उसमें अपेक्षा की गई है कि आकर्षक स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति पैकेज के चलते अगले पांच से सात वर्ष में बड़ी तादाद में कर्मचारी स्वेच्छा से सेवानिवृत्ति लेंगे। बीएसएनएल ने सरकार से 4जी स्पेक्ट्रम की प्रशासित कीमत के बराबर की इक्विटी डालने को भी कहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि उसका मानना है कि 4जी स्पेक्ट्रम की कमी ने उसे निजी 4जी कारोबारियों के समक्ष गैर प्रतिस्पर्धी बना दिया है। 
 
दूरसंचार क्षेत्र में बहुत तेज गति से बदलाव होते हैं। यहां तक कि पहले से कारोबार कर रहे निजी कारोबारियों को भी हालिया प्रवेश करने वाली रिलायंस जियो से निपटने में कड़ा संघर्ष करना पड़ा। यह क्षेत्र व्यापक बुनियादी ढांचे वाला कारोबार कम और सेवा प्रदाता कारोबार अधिक है। इस प्रतिस्पर्धा में निजी क्षेत्र हमेशा बाजी मार लेता है क्योंकि वह सरकारी उपक्रमों की तुलना में ग्राहकों के अधिक अनुुकूल होते हैं। यह उन कारेाबारियों के साथ भी बड़ा अन्याय है जिन्होंने भारी कर्ज लेकर स्पेक्ट्रम खरीदा और इस क्षेत्र में उन सरकारी उपक्रमों के साथ प्रतिस्पर्धा बरकरार रखी जिन्हें स्पेक्ट्रम नियंत्रित मूल्य पर मिलता है और जिनके सामने बजट की भी ज्यादा चुनौती नहीं होती। एयर इंडिया को लगातार सरकारी सहयोग से हवाई उड़ानों के बाजार में विसंगति उत्पन्न हुई और इसके चलते अब एक नहीं बल्कि दो पूर्णकालिक विमान सेवाएं ध्वस्त हो चुकी हैं। क्या सरकार दूरसंचार क्षेत्र में कभी यही करना चाहती है? उसे तथ्यों के अनुसार काम करना चाहिए। बीएसएनएल और एमटीएनएल को करदाताओं के पैसे से मुनाफे में नहीं लाया जा सकता। अगर ऐसा हुआ भी तो इससे बाजार में बुरी विसंगति उत्पन्न होगी और निजी कारोबारी कारोबार से बाहर हो जाएंगे। इससे कमोबेश सबका नुकसान होगा। इन कंपनियों का पुनरुत्थान करने के बजाय इनका निजीकरण करना  आवश्यक है। 
Keyword: BSNL, MTNL, PSU, telecom, merge, ravishankar prasad,,
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