बिजनेस स्टैंडर्ड - इस बार वृद्धि दर रह सकती है 6 प्रतिशत से ज्यादा
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इस बार वृद्धि दर रह सकती है 6 प्रतिशत से ज्यादा

अरूप रायचौधरी /  October 23, 2019

भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन ने कहा है कि 2019-20 में अर्थव्यवस्था 6 से 6.5 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है, जिन्होंने आर्थिक समीक्षा में 7 प्रतिशत वृद्धि दर का अनुमान लगाया था। अरूप रायचौधरी के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि कॉर्पोरेशन कर में कटौती सहित आपूर्ति की दिशा में उठाए गए कदमों से खपत और मांग बढ़ेगी और गैर कर राजस्व से कर राजस्व में गिरावट की भरपाई हो सकती है। संपादित अंश...

 
मंदी के बीच भी केंद्र को लगता है कि दूसरी छमाही में वृद्धि रफ्तार पकड़ेगी। आपने आर्थिक समीक्षा में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था। क्या इसमें बदलाव हुआ है?
 
अगर आप अर्थव्यवस्था की दीर्घावधि धारणा को देखें, जिसका मूल रूप से आर्थिक वृद्धि की क्षमता के आकलन में होता है और यह प्राथमिक  रूप से वस्तुओं और सेवाओं की मांग से संचालित होता है, यह मांग पूरी करने में सक्षम है। जब आप पिछली दो तिमाहियोंं को देखते हैं, तो मुझे यह नहीं लगता कि कोई भौगोलिक बदलाव हुआ है, जिससे कि इन पहलुओं में बदलाव हो। निवेश में कमी आई है, जिसका असर उत्पादकता और मजदूरी पर पड़ा है। इसकी वजह से परिवारों की खपत भी प्रभावित हुई है। गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को भी कुछ समस्या से जूझना पड़ रहा है। यह कुल मिलाकर आकलन है। सरकार ने व्यवस्था में नकदी बढ़ाने के कदम उठाए हैं। बहरहाल मध्यावधि के हिसाब से देखें तो मंदी नजर आती है। यह विभिन्न एजेंसियों के अनुमान में नजर भी आ रहा है। हमने जो पहले अनुमान लगाया था, उसकी तुलना में सुस्ती रहेगी। मैं यह कह सकता हूं कि वृद्धि दर 6 प्रतिशत से ऊपर रहेगी। 
 
तो 6 से 6.5 प्रतिशत वृद्धि दर ठीक सीमा है? 
 
हां। यह इस पर निर्भर करता है कि सरकार ने पिछले कुछ महीनों में जो कदम उठाए हैं, उस पर अमल होता है। 
 
वित्त मंत्री ने कॉर्पोरेशन कर सहित सभी कदम आपूर्ति के पक्ष में उठाए हैं। क्या मांग पक्ष में भी किसी कदम की उम्मीद है? नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजित बनर्जी ने कहा है कि कॉर्पोरेशन कर में कटौती का लाभ अर्थव्यवस्था को नहीं मिलेगा और कर घटाने से वृद्धि में तेजी आती है, यह मिथक है। क्या आप सहमत हैं?
 
मैं यहां आर्थिक पक्षों पर ध्यान केंद्रित करूंगा। वृहद आर्थिक स्तर पर, हर वैरिएबल का कारण व प्रभाव है। भारत जैसे देश में अर्थव्यवस्था जिस चक्र में है, प्रमुख चालक निवेश है। इससे खपत प्रभावित होती है। अगर हम भारतीय अर्थव्यवस्था की टिकाऊ वृद्धि चाहते हैं तो निवेश अहम है। इस सिलसिले में कॉर्पोरेट कर में कटौती को देखा जाना चाहिए। खपत अगर बढ़ती है तो आगे निवेश और बढ़ेगा। कम अवधि े हिसाब से अभी हमने यह चिह्नित किया है कि अनुमानित खपत निवेश बढ़ाने के लिए अहम है। 
 
सरकार गरीबों और ग्रामीण भारत के हाथों में ज्यादा नकदी देने के लिए क्या कर रही है? क्या पीएम किसान, मनरेगा आदि में राशि बढ़ाने की योजना है? 
 
हमने पाया है कि खपत बढ़ाना अहम है, जिसके तरीके के बारे में मैंने बताया। खपत बहाल रकने के लिए सरकार जरूरी कदम उठाने को प्रतिबद्ध है। खपत बढऩे पर चक्र आगे बढऩा शुरू हो जाएगा। 
 
पिछले साल 6.8 प्रतिशत वृद्धि दर होने पर सकल कर राजस्व 1.9 लाख करोड़ कम रहा था। इस साल क्या कमी और बढ़ेगी? यह राजकोषीय हिसाब से कितना खतरनाक है? 
 
इस समय गैर कर राजस्व पर जोर है, जो कर राजस्व में कमी की भरपाई करेगा। यह सामान्यतया उम्मीद की जाती है कि जब वृद्धि सुस्त होती है तो कर राजस्व प्रभावित होता है। सरकार वृद्धि को पटरी पर लाने के लिए प्रतिबद्धता से काम कर रही है और राजकोषीय गणित पर बहुत सावधानी से नजर रखी जा रही है। 
 
आप कह रहे हैं कि संपत्तियों की बिक्री और गैर कर राजस्व से राजस्व में कमी की भरपाई हो जाएगी। विनिवेश लक्ष्य 1.05 लाख करोड़ रुपये है। क्या यह बढ़ सकता है? 
 
अगर आप आईआरसीटीसी आईपीओ की मांग देखें तो पाएंगे तो बेहतर प्रदर्शन वाली सरकारी इकाइयों की मांग अच्छी है। एक या दो बड़े विनिवेश सौदों से लक्ष्य हासिल हो जाएगा। यह अनुमान लगाना खतरनाक है कि लक्ष्य बढ़ेगा या नहीं, क्योंकि यह बाजार से जुड़ा है। लक्ष्य हासिल करना कठिन नहींं होना चाहिए। 
 
क्या व्यय में कटौती हो सकती है? 
 
हमारा रुख साफ है कि पूंजीगत व्यय से समझौता नहीं किया जाएगा। पूंजीगत व्यय में कोई कटौती नहीं होगी। 
Keyword: economy, growth, krishnamurthy,,
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