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दादागीरी के सबक : गांगुली से क्या सीख सकते हैं प्रबंधक

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  October 22, 2019

सौरभ गांगुली अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से विदा लेने के 11 साल बाद अपने शानदार करियर में एक और अहम पारी खेलने के लिए तैयार हैं। हालांकि उन्होंने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष के रूप में अपनी भूमिका को ज्यादा अहमियत नहीं देते हुए कहा है कि भारतीय क्रिकेट में कप्तान से मुश्किल कोई काम नहीं है। इसमें सच्चाई हो सकती है लेकिन भारत के बेहतरीन कप्तानों में शुमार गांगुली यहां जो करने की कोशिश कर रहे हैं उसे कॉरपोरेट जगत की भाषा में अपेक्षा प्रबंधन कहा जाता है। 

 
बीसीसीआई की कमान संभालना एक दुष्कर कार्य है और गांगुली स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि किसी को भी उनसे चमत्कार की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। खासकर तब जब उनके पास अपना प्रशासनिक कौशल दिखाने के लिए केवल 10 महीने का समय है। बीसीसीआई के संविधान के मुताबिक इसके बाद वह तीन साल के कूलिंग ऑफ पीरियड में चले जाएंगे। अगुआई करने वाले सभी चतुर लोगों की तरह, वह अपने और बीसीसीआई के पदाधिकारियों की नई टीम के लिए उम्मीदों की एक रेखा खींच रहे हैं। बीसीसीआई के सामने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कौंसिल (आईसीसी) के साथ सौदेबाजी की ताकत फिर से हासिल करने का दुष्कर काम है। हालांकि इस बात की कम ही संभावना है कि गांगुली के अध्यक्ष रहते बीसीसीआई आसानी से हथियार डाल देगा। ऐसा इसलिए है कि क्योंकि भारतीय टीम का कप्तान रहते हुए गांगुली पहले ही टीम बनाने की अपनी क्षमताओं और बड़ी सोच रखने का पर्याप्त प्रमाण दे चुके हैं जिससे टीम इंडिया को एक जुझारू टीम बनाने में मदद मिली। अपने 12 साल के अंतरराष्ट्रीय करियर में उन्हें लगातार आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा लेकिन पहले एक खिलाड़ी और फिर कप्तान के तौर पर उन्होंने इनका डटकर मुकाबला किया। गांगुली ने देश के कुछ प्रमुख प्रबंधन स्कूलों में व्याख्यान दिए हैं और 'ए सेंचुरी इन नॉट इनफ' नाम से एक किताब भी लिखी है। इससे उनकी नेतृत्व क्षमता की थाह मिलती है जो कॉरपोरेट जगत में भी प्रासंगिक है।
 
प्रतिभा को आगे बढ़ाना
 
प्रतिभा को पहचानना जरूरी है लेकिन टीम लीडर का काम यहां से शुरू होता है। गांगुली ने न केवल युवा प्रतिभाओं को पहचाना बल्कि उनका पूरा साथ भी दिया। आईआईएम कलकत्ता में एक व्याख्यान में गांगुली ने कहा कि अगर कोई लीडर एक बार किसी की प्रतिभा का कायल हो गया तो उसे उसके मन से नाकामी का डर हटाकर उसे अपनी प्रतिभा दिखाने का पूरा मौका देना चाहिए। गांगुली ने खुलासा किया कि कैसे उन्होंने 2001 में हरभजन सिंह का साथ दिया था जब चयनकर्ता उन्हें टीम से बाहर करना चाहते थे। उन्होंने कहा, 'मैं युवा खिलाडिय़ों को गहरे में उतारने में यकीन रखता था। जो बेहतर थे उन्होंने खुद को संभाला, अपना मुकाम बनाया और चुनौतियों का सामना किया। मैंने हरभजन का साथ दिया क्योंकि मुझे उसमें जुनून दिखा था।' ऑफ स्पिनर हरभजन ने दादा की उम्मीद पर खरे उतरते हुए केवल अपने दम पर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सीरीज जिताई थी।
 
भरोसा
 
टीम नेतृत्व करने वाले हर शख्स को कड़े फैसले लेने होते हैं लेकिन टीम के सदस्यों को यह विश्वास होना चाहिए कि उनका वजूद विशुद्घ रूप से पेशेवर कारणों से है। इस तरह हर बार जब गांगुली किसी खिलाड़ी को टीम से बाहर करते थे तो वह चयन समिति के साथ इस मुद्दे पर चर्चा करने से पहले उस खिलाड़ी को विस्तार से इसके कारण बताते थे। इस तरह खिलाड़ी जानता था कि कप्तान ने यह फैसला क्यों किया है और उसे यह विश्वास होता था कि अगर उसका प्रदर्शन सुधरता है तो वह टीम में वापसी कर सकता है। संक्षेप में कहें तो टीम लीडर को ऐसा माहौल बनाना होता है जहां पेशेवर मामलों में व्यक्तिगत समीकरणों का कोई महत्त्व नहीं होता है। शेन वार्न और स्टीव वॉ के बीच व्यक्तिगत संबंध अच्छे नहीं थे लेकिन इसके बावजूद उन्होंने क्रिकेट के मैदान में ऑस्ट्रेलिया के लिए एकदूसरे का पूरा सहयोग किया।
 
रणनीतिक सोच
 
गांगुली भारतीय टीम के बारे में इस धारणा को बदलना चाहते थे कि वह केवल घर में ही शेर हैं। अपनी किताब में वह लिखते हैं, 'जिस दिन मैं कप्तान बना, मैंने खुद से कहा कि स्पिनरों को तरजीह देने की दशकों पुरानी नीति को बदलना होगा। मैं पूरी तरह फिट और मजबूत तेज गेंदबाजों की एक टोली बनाना चाहता था और एक नया प्रारूप चाहता था। मैंने कहा कि भारतीय उपमहाद्वीप में स्पिनरों पर जोर रहेगा। लेकिन विदेशों में 20 विकेट लेने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से तेज गेंदबाजों पर होगी।' नए प्रारूप में टीम ने विदेशों में जुझारू प्रदर्शन करना था। यह रणनीति काम कर गई और भारत ने गांगुली की कप्तानी में विदेशों में कई यादगार जीत हासिल कीं।
 
आत्मविश्वास
 
गांगुली ने एक बार वेस्टइंडीज के महान बल्लेबाज गॉर्डन ग्रीनिज से हुई बातचीत का जिक्र किया था। हर बार जब वह डेनिस लिली, ग्रीम पॉलक जैसे गेंदबाजों के खिलाफ अपनी पारी की शुरुआत करने उतरते थे तो अपने दिमाग से स्लिप क्षेत्ररक्षण को हटा देते थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि जब भी उनके दिमाग में यह बात आती कि स्लिप में चार क्षेत्ररक्षक खड़े हैं तो वह तुरंत उनमें से किसी एक को कैच थमा देते। यह डर से पार पाने का ग्रीनिज का तरीका था। गांगुली ने कहा कि दुनिया के सबसे सफल सलामी बल्लेबाजों में शामिल ग्रीनिज से मिली सीख से उन्हें यह आत्मबल मिला कि वह हर बार क्रिकेट के मैदान पर सफल होंगे। एक टीम लीडर के मन में कोई शंका नहीं होनी चाहिए और उसे पूरा विश्वास होना चाहिए कि वह परिणाम देगा, चाहे जो हो जाए।
Keyword: cricket, saurabh ganguly, management, BCCI,,
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