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सबकी अच्छी सेहत का लोक वित्त से वास्ता

अजय शाह /  October 22, 2019

यदि 'कॉमन गुड्स फॉर हेल्थ' की अवधारणा पर गंभीरतापूर्वक आगे बढ़ा जाए तो इसका राजकोषीय मोर्चे पर यकीनन सकारात्मक असर देखने को मिलेगा। विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं अजय शाह 

 
स्वास्थ्य नीति को लेकर पुरातन विचार बचाव और उपचार के बीच का तनाव है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि 'कॉमन गुड्स फॉर हेल्थ' की दिशा में और अधिक कदम उठाए जाएं। यानी जनसंख्या के आकार के मुताबिक हस्तक्षेप किए जाएं जिससे बीमारियों का बोझ कम हो। यह सर्वव्यापी बीमारियों तथा हवा की गुणवत्ता के नए खतरों के रूप में हमारे सामने है। देश में पारंपरिक जन स्वास्थ्य के अधूरे एजेंडे में भी इसे महसूस किया जा सकता है। स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले व्यय के कारण सरकार के बढ़ते राजकोषीय खर्च को देखते हुए अब यह आवश्यकता आन पड़ी है कि इन व्यापक जन समुदाय से जुड़े हस्तक्षेपों को देखते हुए व्यापक राजकोषीय प्रोत्साहन दिया जाए। 
 
स्वास्थ्य नीति के मूल में बचाव बनाम स्वास्थ्य की बहस है। एक ओर जहां स्वास्थ्य सेवा से जुड़ा समुदाय लोगों के उपचार पर केंद्रित रहता है, वहीं ऐसी तमाम वजह हैं जो उपचार के बजाय बचाव को केंद्र में रखती हैं। आम व्यक्ति की दृष्टि से देखा जाए तो बेहतर यही माना जाता है कि बीमार पड़ा ही न जाए। हाल के वर्षों में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 'कॉमन गुड्स फॉर हेल्थ' नामक परियोजना शुरू की जिसका लक्ष्य है आबादी आधारित जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में बुनियादी तौर पर नई ऊर्जा का संचार करना। सार्वजनिक आर्थिकी की तकनीकी भाषा में यह सार्वजनिक बेहतरी के क्षेत्र में बाजार की तथा अन्य बाह्य विफलताओं को कवर करता है। 'कॉमन गुड्स फॉर हेल्थ' एक अच्छा कथन है जिसे आसानी से समझा जा सकता है और यह जन स्वास्थ्य से जुड़े लगभग सार्वभौमिकता के भ्रम को समाप्त करता है। 
 
इबोला जैसी वैश्विक महामारियों, देश में हवा की खराब गुणवत्ता अथवा जलवायु परिवर्तन के कारण पर्यावरण में आ रही गिरावट के दुष्परिणामों पर विचार कीजिए। ये सभी अपने आप में बेहद बड़ी समस्याओं में शामिल हैं। ये लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाली हैं। अगर हम केवल स्वास्थ्य सेवाओं पर केंद्रित रहे तो यह प्रतिक्रिया अपर्याप्त मानी जाएगी। हम इबोला जैसी महामारी या उत्तर भारत में हवा की खराब गुणवत्ता के शिकार लोगों को केवल इलाज करके ठीक नहीं कर सकते बल्कि हमें आगे बढ़कर इन समस्याओं की जड़ पर प्रहार करना होगा।
 
इसके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य की बुनियाद मजबूत करनी होगी। उदाहरण के लिए वैश्विक महामारियों से सबसे अच्छा बचाव यह है कि संचारी रोगों से निपटने के लिए जन स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा मजबूत हो। इसमें बीमारियों की निगरानी की व्यवस्था, आपातकालीन प्रतिक्रिया, टीकाकरण आदि शामिल हैं। दुनिया भर में राजनीतिक और शासन तंत्र आपात परिस्थितियों को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे में इन बुनियादों की अनदेखी की जाती है। चिकित्सक, राजनेता और पीडि़तों को स्वास्थ्य सेवाओं का मोल नजर आता है जबकि नजर न आने वाले जन स्वास्थ्य के काम सामने नहीं दिखते जिनमें लोगों के बीमार न पडऩे पर जोर दिया जाता है।
 
भारत में अभी जन स्वास्थ्य के पुराने एजेंडे पर काफी कुछ किया जाना शेष है। इसमें जल और स्वच्छता, संचारी रोगों की निगरानी और महामारियों अथवा प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की संस्थागत क्षमता विकसित करना जरूरी है। आज जो परिस्थितियां मौजूद हैं उन पर नए सिरे से दृष्टि डालें तो वायु गुणवत्ता, सड़क सुरक्षा, औषधि सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, जल प्रदूषण और जीवाणु प्रतिरोध के रूप में इसमें नए तत्त्व शामिल हो रहे हैं। कॉमन गुड्स फॉर हेल्थ और सार्वजनिक वित्त के बीच रोचक संबंध है। सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार से लोगों के बीमार होने में कमी आएगी। इससे स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला व्यय कम होगा और साथ ही सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर पडऩे वाला राजकोषीय दबाव भी सीमित होगा। इससे दुनिया भर की सरकारों द्वारा इसे दी जा रही तवज्जो का औचित्य समझ में आता है। ये सरकारें स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत अधिक धन व्यय कर रही हैं। सरकार किसी स्वास्थ्य सेवा प्रदाता को धन दे या बीमा कंपनी को दे लेकिन आखिरकार इस भुगतान का संबंध स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा रहता है। ऐसे में कॉमन गुड्स फॉर हेल्थ के लिए काम करना इन सेवाओं के लिए वित्तीय सुविधा को मजबूत करने और सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा की व्यवहार्यता के लिए बुनियाद के पत्थर का काम करेगा। 
 
भारत की बात करें तो देश में सरकार समर्थित कई बीमा योजनाओं के आगमन के बाद सरकार के स्वास्थ्य सेवा खर्च में काफी बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में इस तरह का रुख अपनाकर इस व्यय तथा राजकोषीय जोखिम को कम किया जा सकता है।  उक्त एजेंडा कई मंत्रालयों के और एजेंसियों के बीच विस्तारित है। उदाहरण के लिए हवा की गुणवत्ता या सड़क सुरक्षा जैसी समस्याओं का स्वास्थ्य सेवा व्यय पर काफी अधिक असर पड़ता है। जबकि ये समस्याएं स्वास्थ्य मंत्रालय के दायरे में नहीं आतीं। ऐसे में एक समन्वय प्रणाली की आवश्यकता है ताकि इनसे जुड़ी तमाम जवाबदेहियों का मिलजुलकर निर्वहन किया जा सके। यह काफी हद वैसा ही है जैसे बड़ी आपदाओं से निपटा जाता है। 
 
मान लेते हैं कि हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां स्वास्थ्य सेवाएं एकदम दुरुस्त तरीके से काम करती हैं। वहां भी उक्त रुख की आवश्यकता है क्योंकि लोग अगर बीमार ही न पड़ें तो यह उनके लिए अधिक बेहतर है।  हमारे देश में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में तमाम चुनौतियां हैं। इसके चलते यहां कॉमन गुड्स फॉर हेल्थ की जरूरत भी अधिक है। कोई व्यक्ति खराब चिकित्सा प्रणाली में जाए, उससे बेहतर है कि वह बीमार ही नहीं पड़े। अगर लोग बीमार नहीं पड़ेंगे तो सरकार पर पडऩे वाला वित्तीय बोझ भी पहले की तुलना में काफी कम होगा। 
 
वैश्विक स्वास्थ्य नीति की बात की जाए तो अल्पावधि में इसमें कोई बदलाव आता नहीं दिखता। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 'कॉमन गुड्स फॉर हेल्थ' परियोजना की बात करें तो यह यह सही दिशा में उठाया गया कदम है। माना जा सकता है कि यह विश्व व्यापी स्तर पर स्वास्थ्य नीतियों में बदलाव लाने वाला साबित होगा। भारत जैसे देश में जहां पारंपरिक जन स्वास्थ्य एजेंडे पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है और जहां बीमारियों का बोझ बहुत अधिक है, वहां यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। 
Keyword: health, policy, pollution,,
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