बिजनेस स्टैंडर्ड - ईपीएफओ का बकाया
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ईपीएफओ का बकाया

संपादकीय /  October 22, 2019

ऐसी जानकारी सामने आई है कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) अपने सदस्यों को यह विकल्प देने पर विचार कर रहा है कि वे मौजूदा 58 के बजाय 60 वर्ष की उम्र में अपनी पेंशन लेना आरंभ करें। जो अपनी पेंशन निकासी को दो वर्ष टालने के लिए राजी हो जाएंगे, उनके लिए अतिरिक्त बोनस जैसे प्रोत्साहन घोषित किए जा सकते हैं। प्रथम दृष्ट्या यह विचार समझदारी भरा लगता है क्योंकि अधिकांश पेंशन फंड 60 वर्ष की उम्र में ही भुगतान करना आरंभ करते हैं। दो वर्ष की यह अतिरिक्त अवधि लाभार्थियों की पेंशन को और मजबूत बनाने का काम करेगी। परंतु वास्तविक समस्या ईपीएफओ के इस कदम के पीछे के कारण में निहित है। हाल ही में इस समाचार पत्र में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार सरकार ईपीएफओ को लेकर अपनी प्रतिबद्धताओं को सीमित कर रही है और उसका समेकित बकाया अब 9,100 करोड़ रुपये हो चुका है। निजी क्षेत्र के कर्मचारी अपने वेतन का 12 प्रतिशत इस कोष में देते हैं और नियोक्ता भी इतना ही अंशदान करता है। 

 
नियोक्ता के अंशदान का 8.33 फीसदी हिस्सा कर्मचारी पेंशन योजना में जाता है जबकि सरकार उन कर्मचारियों के पेंशन अंशदान में 1.6 फीसदी का योगदान करती है जिनका मासिक वेतन 15,000 रुपये से कम होता है। पेंशन योजना में करीब 4 करोड़ सक्रिय खाते हैं। सरकार ने 2014 में निर्णय लिया था कि योजना में शामिल सभी लोगों की न्यूनतम मासिक पेंशन बढ़ाकर 1,000 रुपये की जाएगी।  इसके लिए उसने सालाना 800 करोड़ रुपये देने की बात कही थी। ईपीएफओ अपने स्तर पर इस स्थिति में नहीं था कि वह इसका क्रियान्वयन कर सके। बहरहाल, इस मद का फंड भी बकाया है।
 
यह जानना दिलचस्प है कि बकाया राशि का एक हिस्सा तो सन 1995-96 से ही बकाया है। यही वह वर्ष है जब कर्मचारी पेंशन योजना की शुरुआत की गई थी। यह इस बात का संकेतक है कि देश में वित्तीय प्रबंधन कैसे किया जाता है। सरकार की यह कोशिश होती है कि व्यय को हरसंभव ढंग से टाला जाए। यह प्रवृत्ति हर क्षेत्र में मौजूद है और इसे समाप्त होना चाहिए क्योंकि इससे कुछ हासिल नहीं होता। इसके उलट, इससे करदाताओं की जवाबदेही में इजाफा हो सकता है। व्यापक स्तर पर देखें तो जैसा कि पहले भी कहा गया है, सरकार को राजस्व और व्यय का उचित आकलन करना चाहिए ताकि पारदर्शिता में सुधार हो। राजकोषीय हालात की बेहतर तस्वीर से सरकार को भी अपना प्रबंधन सुधारने में मदद मिलेगी और वह जरूरी समायोजन कर सकेगी।
 
ऐसे में मौजूदा संदर्भ की बात करें तो सरकार के लिए बेहतर यही होगा कि वह ईपीएफओ का फंड जारी करे ताकि वह बिना किसी बाधा के अपनी जवाबदेही निभा सके। पेंशन फंड के बारे में कहा जा रहा है कि वह घाटे में है। इसके अलावा सरकार और ईपीएफओ को भविष्य की तैयारी करनी चाहिए। श्रमशक्ति बढऩे तथा अर्थव्यवस्था के औपचारिक होने के साथ ईपीएफओ का सदस्य आधार बढ़ेगा। व्यय में समायोजन की आवश्यकता हो सकती है ताकि सरकार समय पर अपनी प्रतिबद्धताएं निभा सके। इसके अलावा ईपीएफओ को भविष्य निधि की ब्याज दर को लचीला रखना होगा। उसे बिना ज्यादा जोखिम के मिलने वाले प्रतिफल के अनुरूप रखना होगा। हमारे देश में मजबूत सामाजिक सुरक्षा ढांचा भी नहीं है। ऐसे में यह बात महत्त्वपूर्ण है कि पहले से मौजूदा संस्थागत प्रणाली का न केवल संरक्षण किया जाए बल्कि उसका विस्तार भी किया जाए।
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