बिजनेस स?टैंडर?ड - भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कर का योगदान बढ़ाने की जरूरत
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भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कर का योगदान बढ़ाने की जरूरत

राजेश कुमार /  October 21, 2019

अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार से संयुक्त रूप से सम्मानित प्रोफेसर अभिजित बनर्जी इन दिनों अपनी नई किताब के प्रमोशन के सिलसिले में भारत आए हुए हैं। बनर्जी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड के राजेश कुमार को दिए साक्षात्कार में भारतीय एवं वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े पहलुओं पर खुलकर बात की। पेश हैं संपादित अंश:

 
हम ऐसी स्थिति में हैं कि वैश्विक वृद्धि सुस्त हो रही है और नीति-निर्माताओं के पास इसे दुरुस्त करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं दिखाई दे रहे। क्या हालात इससे भी खराब होंगे?
 
कुछ तो अपना ही किया-धरा है। फिलहाल अमेरिका अंतरराष्ट्रीय व्यवहार के सभी नियमों को तोड़ रहा है और अगर ट्रंप दोबारा जीतते हैं तो हालात बिगड़ेंगे। वह नहीं जीतते हैं तो भी चीन की तकनीकी कंपनियों के खिलाफ जारी कुछ कदम बने रहेंगे क्योंकि वे राजनीतिक रूप से लोकप्रिय कदम हैं। हालांकि व्यापार युद्ध के मोर्चे पर हमें थोड़ी राहत मिलती दिखेगी। पहले से ही सुस्ती का माहौल है। चीन की अर्थव्यवस्था धीमी पड़ रही है और दो वर्षों तक काफी तेज गति से बढ़ा अमेरिका सुस्त होने जा रहा है। इस सुस्ती का और गंभीर होना अमेरिकी चुनाव के नतीजों पर निर्भर करेगा।
 
भारत के संदर्भ में देखें तो एक वक्त जीएसटी, दिवालिया कानून और महंगाई पर काबू पाने की कोशिशें सही दिशा में जाने का संकेत दे रही थीं। हालात कहां पर बिगडऩे लगे?
 
मुझे कभी नहीं लगा कि मुद्रास्फीति के उस स्तर को थामना एक बढिय़ा सोच थी। मैं हमेशा ही इसका विरोधी रहा हूं। हमें मुद्रास्फीति से खासा लाभ हुआ है क्योंकि यह अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने का रास्ता रहा है। कीमतों में गिरावट का रुख हो तो मुझे लगता है कि मुद्रास्फीति कोई बुरी चीज नहीं है क्योंकि इससे श्रम की मांग में तेजी बनी रहती है। मजदूरी में गिरावट नहीं आती है तो आपको वास्तविक वेतन को लचीला बनाने के लिए कदम उठाने होते हैं। हमारी वास्तविक ब्याज दर काफी कम थीं लेकिन अब ये काफी ऊंची हैं और वह बड़ी समस्या है। अब मांग में गिरावट का दौर देखें तो ब्याज दरों में आंशिक कटौती कर तेजी को वापस ला पाना मुश्किल है। मेरा मानना है कि मुद्रास्फीति नियंत्रण के साथ समर्थन मूल्यों पर दबाव का मांग में सुस्ती से भी कुछ संबंध हो सकता है।
 
आपने कहा है कि भारत मांग में कमी के दौर से गुजर रहा है। भारत सकल घरेलू उत्पाद के 10 फीसदी के करीब वास्तविक बजट घाटे को गंवा रहा है। इसके बावजूद मांग गिरती है तो क्या कहा जा सकता है कि समस्या अधिक गंभीर है?
 
यह गंभीर समस्या हो सकती है लेकिन मैं यह बिंदु नहीं उठा रहा हूं। लंबे समय से यह घाटा बड़ा होता रहा क्योंकि अर्थव्यवस्था में सुस्ती आ रही थी। सरकारी क्षेत्र अर्थव्यवस्था का इकलौता खुशनुमा बिंदु रहा है। लिहाजा मैं इससे असहमत नहीं हूं और इसकी प्रतिक्रिया में घाटा बढ़ा है। इसका एक मौद्रिक पक्ष भी है। वास्तविक ब्याज दरें काफी चढ़ी हैं और ये अहम भूमिका निभाती हैं। उधार लेने की सरकार की क्षमता के लिहाज से यह अहम है। 
 
आपने धनाढ्य लोगों पर आयकर बढ़ाने के विचार का समर्थन किया है लेकिन इतिहास बताता है कि दरें ऊंची होने पर कर चोरी के मामले बढ़ जाते हैं।
 
एक तरफ इतिहास है और दूसरी तरफ मुझे कर संग्रहण की स्थिति लगातार बेहतर होती दिख रही है। हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि रिसाव की समस्या अनवरत रहेगी। हम लगातार बेहतर हो रहे हैं। सूचना प्रणालियां भी बेहतर हैं। हम जीडीपी में मौजूदा कर अनुपात पर टिके रह सकते हैं। हमें करों की जरूरत है। 
 
आपने किताब में सार्वभौम न्यूनतम बुनियादी आय के पक्ष में दलीलें दी हैं। क्या बजट एवं राजनीतिक अवरोधों को देखते हुए यह एक व्यवहार्य विचार है?
 
मुझे लगता है कि राजनीतिक गतिरोध उतने गंभीर नहीं हैं। लोगों को भी मालूम है कि सरकारी सब्सिडी व्यर्थ गंवा दी जाती है। दरअसल लोगों को यह भरोसा ही नहीं है कि सरकार उन्हें वास्तव में समर्थन देगी। हमें एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जो यह सुनिश्चित करे कि सरकार अगर एक्स देने का वादा करती है तो वह एक्स ही देगी। इसमें विश्वसनीयता का मुद्दा काफी अहम है।
 
लेकिन सरकार अन्य सब्सिडी में कटौती किए बगैर किसानों को आय समर्थन दे रही है। कुछ लोगों को आशंका है कि क्या यह तरीका कारगर होगा?
 
मैं लोगों के इस भय को समझता हूं। लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है क्योंकि उन्होंने कुछ लिया भी है। कृषि उपजों के समर्थन मूल्य काफी डांवाडोल रहे हैं। ऐसे में सरकार ने पहले इसे वापस लिया और फिर उसकी भरपाई करने की कोशिश की। मुझे नहीं लगता है कि यह सबसे अच्छी प्रक्रिया है। समर्थन मूल्य ने एक समय तक व्यापार के नियम तय किया और फिर उन्होंने ऐसा नहीं करने का फैसला किया। और फिर आम चुनाव के ऐन पहले सरकार ने यह कहा कि किसानों को आंशिक रूप से मुआवजा देने जा रही है।
 
आपने कहा है कि लोग आर्थिक अवसरों का लाभ ले पाने के लिए अक्सर अनिच्छुक एवं असमर्थ होते हैं। क्या बुनियादी आय और मनरेगा जैसे कार्यक्रम श्रमिकों के आवागमन को धीमा नहीं करते हैं?
 
ये दोनों काफी अलग हैं। बुनियादी आय बिना-शर्त होती है। अगर मैं खेती छोड़कर निर्माण मजदूर बनने के लिए शहरी क्षेत्र में आता हूं तो मेरी बुनियादी आय कहीं नहीं जाती है। वहीं मनरेगा काफी अलग है और ऐसे सबूत हैं कि इस योजना की वजह से शहरी इलाकों की तरफ प्रवास की दर धीमी होती है। बुनियादी आय में मुनाफा कमाने की क्षमता अहम है। अगर यह पोर्टेबल नहीं है तो फिर इसमें गलतियों की काफी गुंजाइश है। बुनियादी आय सुनिश्चित करने से शहरों की तरफ प्रवास पर असर नहीं पड़ेगा। एक तरह से यह उसे प्रोत्साहित ही करेगा। जब मैं पहली बार शहर जाता हूं तो मुझे नहीं मालूम होता कि मुझे कोई काम मिलेगा या नहीं। लेकिन अगर मेरे पास बुनियादी आय समर्थन है तो मैं शहर की तरफ कदम बढ़ा सकता हूं और वह जोखिम उठाने को तैयार रहूंगा। 
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