बिजनेस स्टैंडर्ड - राजकोषीय नीति और वृद्धि में धीमापन
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राजकोषीय नीति और वृद्धि में धीमापन

रथिन रॉय /  October 21, 2019

मौजूदा परिस्थितियों में यह सवाल उठता है कि सरकार को अपनी अतिरिक्त उधारी किन चीजों पर व्यय करनी चाहिए। इस संबंध में विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं रथिन रॉय

 
हाल के दिनों में कई अर्थशास्त्रियों ने दलील दी है कि घाटे की भरपाई करते हुए सार्वजनिक व्यय बढ़ाया जाए। ऐसा करने से मौजूदा मंदी को कुछ हद तक थामा जा सकेगा। यह दलील इस तर्क पर आधारित है कि सरकारी व्यय बढऩे से उपभोक्ताओं एवं कंपनियों की क्रय शक्ति बढ़ेगी और मांग बढऩे से वृद्धि दर में तेजी आएगी। इस दलील का विश्लेषण करना चाहता हूं। जिन लोगों को लगता है कि मौजूदा मंदी चक्रीय प्रकृति की है, उनके लिए यही सबसे सहज उपाय है कि मंदी में ज्यादा खर्च करो। परंतु मुझे नहीं लगता कि इसकी प्रकृति चक्रीय है।
 
यह दलील गलत है। पहली बात, सार्वजनिक व्यय बीते कई वर्षों से विस्तार पाता दिख रहा है। बजट में राजकोषीय विस्तार को सीमित रखा जाता है क्योंकि राजकोषीय घाटे और जीडीपी के अनुपात का भी ध्यान रखना होगा लेकिन बजट से इतर उधारी बहुत आसानी से जीडीपी के एक फीसदी का स्तर पार कर जाती है। मेरे अत्यंत संकुचित अनुमान के मुताबिक भी यह नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा जताए गए अनुमान से काफी कम है। दूसरा, कुछ टीकाकार बार-बार और गलत तरीके से जोर देते आए हैं कि राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3 फीसदी के स्तर तक रखने का लक्ष्य मनमाना और गलत है। ऐसा लगता है कि वे वर्ष 2003 के बाद से जारी वित्त आयोगों और राजकोषीय जवाबदेही और बजट प्रबंधन की रिपोर्ट से अनभिज्ञ हैं। रिपोर्टों के मुताबिक वित्तीय बचत के जीडीपी के 10 फीसदी के आसपास रहने के साथ सार्वजनिक ऋण की आवश्यकता जीडीपी के 7.5 फीसदी से कम नहीं है। ऐसा तब है जब बजट से इतर उधारी को छोड़ दिया जाए। सार्वजनिक क्षेत्र के ऋण में और इजाफा पूंजी की इस बढ़ी लागत में और अधिक इजाफा ही करेगा जबकि मौद्रिक और ऋण नीति के अनुसार इसमें कमी करने की आवश्यकता है। 
 
अर्थशास्त्री कींस के सिद्धांतों के अनुसार राजकोषीय विस्तार का लक्ष्य संतुलित बजट गुणक के माध्यम से भी प्राप्त किया जा सकता है। जब वृद्धि मांग के कारण प्रभावित हो, सरकार निजी आय पर कर लगाती है और अपनी खपत या निवेश व्यय बढ़ाकर समेकित मांग को गति प्रदान करती है। ऐसे में बढ़े हुए कर से बढ़े हुए सरकारी व्यय की भरपाई हो जाती है और समेकित मांग पर इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है। यदि कर लचीले नहीं हों या यदि राजकोषीय मशीनरी कर-जीडीपी अनुपात में इजाफा करने में सक्षम नहीं हो तो यह कारगर नहीं साबित होता। ऐसे में भारतीय संदर्भों में अंतर्निहित अनुमान यह है कि ऐसा संभव नहीं है। ऐसे में दूसरा बेहतर हल अपनाया जाना चाहिए- सरकार को और अधिक ऋण लेना चाहिए। मेरी कामना है कि नवोदित कींसवादी इसे स्पष्ट करेंगे।
 
सवाल यह है कि सरकार को यह अतिरिक्त ऋण किस चीज पर खर्च करना चाहिए? भारत लंबे समय तक ऐसी स्थिति में रहा है जहां केंद्र सरकार की उधारी का दोतिहाई हिस्सा राजस्व व्यय के लिए रहा है। सार्वजनिक निवेश के लिए उधारी अच्छा विचार है लेकिन हकीकत यह है कि ढेर सारा सार्वजनिक निवेश (उदाहरण के लिए रक्षा) आयात व्यय आधारित होता है। एक हिस्सा वित्तीय निवेश के लिए अलग रहता है, न कि तयशुदा पूंजी निर्माण के लिए। केंद्र के स्तर पर तयशुदा पूंजी निर्माण निहायत कम है और ऐसे निवेश के क्रियान्वयन में इतना समय लगता है कि इसका असर होने में बहुत वक्त लगता है। भले ही अस्थायी रूप से इसका आकार बढ़ा दिया जाए। 
 
सरकार हस्तांतरण पर व्यय बढ़ाने के लिए ऋण ले सकती है। इससे समस्या तब तक के लिए दूर हो जाएगी जब तक यह लगता है कि अर्थव्यवस्था में क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। परंतु मैं काफी समय से यह कह रहा हूं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की समस्या ढांचागत मांग की समस्या है। अर्थव्यवस्था में व्यापक प्रतिभागिता नहीं हो पा रही है, प्रभावी समेकित मांग सीमित हो रही है। अर्थव्यवस्था के प्रमुख सूचकांकों मसलन वाहन, एफएमसीजी, उपभोक्ता वस्तु आदि के क्षेत्र में इसे महसूस किया जा सकता है। इसके अलावा वित्तीय क्षेत्र की समस्याएं, ऋण नीति का कमजोर पारेषण और सार्वजनिक क्षेत्र तथा सार्वजनिक प्रशासन जो सामूहिक रूप से उत्पादकता पर असर डालता है वह भी इसके पीछे अहम वजह हैं।
 
इन परिस्थितियों में हस्तांतरण करने से ज्यादा से ज्यादा उन क्षेत्रों में समेकित मांग में अस्थायी वृद्धि होगी जो प्रमुख संकेतकों में शामिल नहीं हैं। इसके प्रति आपूर्ति प्रतिक्रिया केवल तभी दिखेगी जब उधारी के माध्यम से किया जा रहा ऐसा हस्तांतरण मध्यम अवधि में बरकरार रहे। ऐसा इसलिए क्योंकि समेकित मांग में हुई बढ़ोतरी को केवल हस्तांतरण से गति मिलती है न कि आय में वृद्धि से। चूंकि यह समस्या ढांचागत है इसलिए यह केवल हस्तांतरण के जरिए मांग में इजाफा करने से समाप्त नहीं होगी। ऐसे में सरकारी उधारी में स्थायी वृद्धि की मदद से हस्तांतरण का भुगतान करना केवल मांग की ढांचागत समस्या में इजाफा करने वाला साबित होगा।
 
क्या मुझे यह भी बताना होगा कि राजकोषीय स्तर पर ऐसे अविवेकपूर्ण कदम के क्या नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं और भारत को अतीत में इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ चुकी है? घाटे की भरपाई को लेकर कई टीकाकार लगभग आक्रांत रहे हैं। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार शंकर आचार्य ने लगभग ढाई वर्ष पहले इस अखबार में इस विषय पर आलेख भी लिखा था। घाटे की भरपाई को लेकर केंद्र सरकार का ऐतिहासिक रिकॉर्ड काफी हद तक वैसा ही रहा है जैसे कि शराब के नशे के आदी व्यक्ति द्वारा उससे दूरी बनाने का प्रयास।
 
यकीनन परिसंपत्तियों से समृद्ध लेकिन राजस्व के मोर्चे गरीब केंद्र सरकार परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण करके समेकित मांग में इजाफा कर सकती है। इसके लिए किसानों की आय दोगुनी करने और नवीकरणीय ऊर्जा तथा सस्ते आवास आदि जैसी ढांचागत नीतियों पर जमकर काम करना होगा। मौजूदा सरकार ने ऐसी पहलों को लेकर इच्छाशक्ति और राजकोषीय चाह दिखाई है लेकिन नियामकीय और संस्थागत विरासत से जुड़ी बाधाओं को दूर करने के लिए जरूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति वह नहीं दिखा पाई है। ये बाधाएं इन पहलों के तीव्र क्रियान्वयन को रोकती हैं। इवेंट मैनेजमेंट करके लोगों का ध्यान भटकाया जा सकता है लेकिन इसकी मदद से क्रियान्वयन की कमियों को छिपाया नहीं जा सकता। ढांचागत मंदी जिसकी जड़ें गहरी हों, उसके दौर में हमारी आर्थिक नीतियों में इन बाधाओं को हल करने के लिए पर जोर दिया जाना चाहिए जिनकी लागत बहुत अधिक नहीं है। 
Keyword: fiscal deficit, revenue, economy,,
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