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बाजार में उथल-पुथल

संपादकीय /  October 21, 2019

एक ऐसा राजनीतिक दल जिसने कारोबारी समुदाय से वादा किया था कि वह कांग्रेस के आर्थिक प्रबंधन से स्पष्ट दूरी बनाएगा, वह उसी कांग्रेस की पुरानी लाइसेंस और परमिट राज की कुव्यवस्था को दोहराता नजर आ रहा है। गत सप्ताह सरकार ने शीर्ष ई-कॉमर्स रिटेलर एमेजॉन और वॉलमार्ट की भारतीय शाखा फ्लिपकार्ट से कहा कि वे अपने शीर्ष पांच विक्रेताओं के बारे में जानकारी दें और निवेश तथा वेंडरों के साथ कमीशन समझौते सामने रखें। उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवद्र्घन विभाग (डीपीआईआईटी) ने दोनों कंपनियों को अलग-अलग प्रश्नावली भेजकर उनसे कहा है कि वे अपने पूंजीगत ढांचे, कारोबारी मॉडल और इन्वेंटरी प्रबंधन व्यवस्था का पूरा ब्योरा पेश करें। यह जांच खुदरा कारोबारियों की एक लॉबी की शिकायत के बाद की जा रही है जिसका नाम है कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी)। 
 
इस संगठन का आरोप है कि ऑनलाइन कारोबारी दशहरे पर अपनी भारी बिक्री की जानकारी देने में एफडीआई मानकों का उल्लंघन कर रहे हैं। गौरतलब है कि ऑनलाइन जगत में यह भारी बिक्री तब हुई है जबकि खुदरा दुकानों में लोगों की आवक तेजी से घटी है। ऑनलाइन मिलने वाली भारी छूट भी इसकी एक वजह है। यह स्पष्ट नहीं है कि आखिर क्यों सरकार को अपनी प्रशासनिक क्षमता का इस्तेमाल एक ऐसी जांच करने में करना चाहिए जबकि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के रूप में एक स्वतंत्र और सक्षम एजेंसी मौजूद है। यह एजेंसी ऐसी शिकायतों से निपटने में सक्षम है। चूंकि प्रतिस्पर्धा आयोग के पास जांच की शक्ति है इसलिए सीएआईटी को वहीं शिकायत करनी थी। या फिर सरकार को ही ऐसा करना था। सीएआईटी भारतीय जनता पार्टी की उत्साही समर्थक रही है। इससे भी समझा जा सकता है कि आखिर क्यों सरकार ने विदेशी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के समक्ष इसके हितों के बचाव का निर्णय लिया होगा। 
 
सीएआईटी का प्रमुख आरोप यह है कि एमेजॉन और फ्लिपकार्ट ने भारी भरकम छूट देकर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश मानकों का उल्लंघन किया है। इस वर्ष फरवरी में लागू हुए ये नियम घरेलू ऑनलाइन और खुदरा कारोबारियों के बचाव के लिए बनाए गए थे और इनके पीछे कोई ठोस आर्थिक कारण नहीं है। पहला, इसमें कंपनियों को विदेशी स्वामित्व वाले ऑनलाइन पोर्टलों के साथ विपणन समझौते करने से रोका गया। दूसरा, विदेशी निवेश वाले ऑनलाइन संस्थान उन उत्पादों की पेशकश नहीं कर सकते जिन्हें बेचने वाले खुदरा कारोबार में उनकी हिस्सेदारी हो। तीसरा, ऑनलाइन ई-कॉमर्स दिग्गजों को एक वेंडर से 25 फीसदी से अधिक इन्वेंटरी कायम करने से रोका गया। चौथा, ऐसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को भारी छूट देने या कीमतों में बदलाव करने से रोका गया। एक ओर जहां इस प्रकार का संरक्षणवाद अग्रगामी वैश्विक अर्थव्यवस्था की देश की आकांक्षा से मेल नहीं खाता है, वहीं दूसरी ओर यह ऑनलाइन कारोबार की बुनियादी तौर पर गलत समझ को भी सामने रखता है।
 
ऑनलाइन रियायतें दरअसल कम वितरण लागत का नतीजा हैं। यह छूट इसलिए संभव होती है क्योंकि वितरण प्रक्रिया की एक अहम कड़ी यानी खुदरा दुकान पर होने वाला खर्च बचता है। ऑनलाइन कंपनियों के आपूर्तिकर्ता इस प्रतिस्पर्धी लाभ की सहायता से त्योहारी मौसम में छूट देते हैं। खुदरा कारोबारी भी यही करते हैं लेकिन उच्च लागत के कारण वे उतनी छूट नहीं दे सकते। संभव है कि विदेशी मार्केट प्लेस एफडीआई मानकों का उल्लंघन कर रहे हों और अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करके सीएआईटी ने शायद उनके कामकाज में एक बाधा डाल भी दी हो। अगर इसके सदस्य चाहते हैं कि ऐसी जांच से उन्हें लाभ होगा तो वे न केवल समय से बहुत पीछे चल रहे हैं बल्कि आगे वे और पिछड़ जाएंगे क्योंकि देश के उपभोक्ता ई-कॉमर्स को अपना रहे हैं। बेहतर होता कि सरकार इस कवायद के बजाय फरवरी में बनाए नियमों को शिथिल करती। 
Keyword: BJP, congress, online, e commerce, FDI,,
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