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किराये पर जमीन लेकर अपनी फसल खुद उगा सकते हैं आप

निकिता पुरी /  October 21, 2019

बेंगलूरु के मध्य इलाके से करीब एक घंटे की दूरी पर एक कच्ची सड़क रामधूता ऑर्गनिक फार्म की तरफ जाती है। यहां 32 साल के मंजूनाथ एन ने अपनी पतलून घुटनों तक चढ़ा रखी है और सब्जियों की खेती में मशगूल हैं। 7.5 एकड़ खेती को संभालना मुश्किल है। लेकिन यह उनकी जमीन है और उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। सात साल से मंजूनाथ इस जमीन पर एक फसल उगा रहे थे और साथ में ठेकेदारी भी करते थे। केवल खेती से उनके घर का गुजारा नहीं चल रहा था। लेकिन जब वह बेंगलूरु की एग्री टेक स्टार्टअप फार्मिजेन से जुड़े तो उनके लिए चीजें आसान हो गई। इससे उनका संपर्क ऐसे शहरी लोगों से हुआ जो अपने लायक खुद उपजाना चाहते हैं। 

 
मंजूनाथ की पत्नी भवानी और उनका चार साल का बेटा अभिराम भी हमारे साथ खेतों में आया है। अभिराम भले ही उम्र में अभी छोटा है लेकिन वह अच्छी तरह जानता है कि गीली मिट्टी पर कैसे चलना है जिससे सब्जियों और बेलों को कोई नुकसान न हो। गणित की लेक्चरर रह चुकीं भवानी ने फार्मिजेन के प्रीपेड मासिक सदस्यता शुल्क मॉडल के बारे में कहा, 'खेती करना आसान नहीं है लेकिन खेतों को किराये पर देने का यह मॉडल सही चल रहा है।' आज देश में हर सुपरमार्केट जैविक खाद्य पदार्थों से भरे पड़े हैं और ऐसी कंपनियों की कमी नहीं है जो आपको घर पर ही सेवाओं की आपूर्ति कर रही हैं। इसके बावजूद ऐसे शहरियों की तादाद भी बढ़ रही है जो खुद अपनी उपज तैयार करना चाहते हैं और इसके लिए उन्हें शहर से दूर जाने में भी गुरेज नहीं है। दिल्ली की कंपनी एडिबल रूट्स, गुरुग्राम की ग्रीन लीफ इंडिया और बेंगलूरु की फार्मिजेन इस तरह की पहल कर रही हैं। यही कारण है कि लोग अब जैविक खेती के लिए जमीन किराये पर ले रहे हैं।
 
मंजूनाथ और भवानी के खेत को 600 वर्ग फीट के 301 भूखंडों में बांटा गया है और इनमें में 278 भूखंडों को प्रति इकाई 2,500 रुपये प्रति माह के किराये पर दिया गया है। मंजूनाथ ने कहा, 'आपको शनिवार को यहां आना चाहिए। यहां बहुत भीड़ होती है जिसमें बच्चे भी होते हैं।' लोग सामान्य दिनों में भी आते हैं लेकिन अक्सर ऐसा तभी होता है जब वे कुछ ऐसा उगाना चाहते हैं जो फार्मिजेन के मेन्यू का हिस्सा नहीं है। फार्मिजेन के मेन्यू में चौलाई, चुकंदर, फ्रेंच बीन, केल, मेथी, बैगन और फूलगोभी शामिल है। कुछ समय पहले आंध्र प्रदेश के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने अपने गृहनगर की गुंटूर मिर्च उगाई थी। आज एक और ग्राहक आने वाली है। वह मालाबार पालक उगाना चाहती है।
 
तकनीकविद् और हैदराबाद की सामूहिक खेती कराने वाली कंपनी बीफोरेस्ट से जुड़े सुनित रेड्डी ने कहा, 'खेत का मालिक होना एक रोमांटिक विचार है लेकिन एक साल बाद खेती की दैनिक जरूरतों से आप ऊब जाते हैं और इससे दूर होने लगते हैं।' इसी रोमांटिक विचार को सींचने के लिए कपिल मंडावेवाला की एडिबल रूट्स जैसी स्टार्टअप कंपनियां उभर आई हैं। जमीन किराये पर लेकर खेती करने वालों के पास खेती करने का कोई अनुभव नहीं है लेकिन इसमें किसानों के जुड़े होने के कारण उपज खराब होने का कोई डर नहीं है। लेकिन यह इतने तक ही सीमित नहीं है। गुरुग्राम की इंटीरियर डिजाइनर अमिता गोयल ने छुट्टियों के दौरान एडिबल रूट्स के जरिये एक खेत किराये पर लिया। इसके पीछे उनकी सोच जमीन से जुडऩे और यह सुनिश्चित करने की थी कि वह और उनका परिवार जो कुछ खाए, वह उनकी आंखों के सामने पैदा हो। देश की अधिकांश उपज बिना लेबल की होती है। बच्चों के अखबार चाइल्ड फ्रेंडली न्यूज की संस्थापक और संपादक अनीता मणि की भी यही कहानी है। उन्हें दिल्ली के बाहरी इलाके एडिबल रूट्स द्वारा संचालित दमाली फार्म पहुंचने में एक घंटा लगता है। वह कहती हैं, 'आजकल आपको यह पता नहीं चलता है कि आपकी सब्जी में क्या है और न ही किसान इस बारे में जानते हैं।' इन छोटे खेतों में सबकुछ नहीं उगाया जा सकता है लेकिन मणि का कहना है कि उन्हें लौकी, टमाटर, भिंडी, फलियों और शरीफे की भरपूर उपज मिलती है जिससे उनकी आने जाने की मेहनत और अतिरिक्त लागत वसूल हो जाती है। 
 
एग्री स्टार्टअप एक कठिन जगह है। इस तरह की पहल पूर्व में भी सुर्खियां बनी थीं लेकिन शहर से खेत की दूरी, प्रतिबद्घता की कमी, खेतों के किराये में बढ़ोतरी, फंड की कमी जैसे कारणों से अधिकांश कंपनियों को अपना कामकाज समेटना पड़ा। लेकिन कई ऐसी कंपनियां हैं जो होड़ में बनी हुई हैं और पिछले कई सालों से अपना कामकाज बखूबी चला रही हैं। किराये के आम मॉडलों में बदलाव से इन कंपनियों को सफलता मिली है।  एडिबल रूट्स छोटे खेतों को करीब 10 महीने के लिए किराये पर देती है। करीब 200 परिवार इसके सदस्य हैं जो न्यूनतम 1,200 वर्ग फुट जमीन किराये पर लेते हैं और हर महीने 3,000 से 5,500 रुपये किराया देते हैं। कंपनी का दमाली फार्म सुल्तानपुर पक्षी विहार के करीब है जबकि आली फार्म ओखला पक्षी विहार के पास है। इसके अलावा कंपनी ने वसंत कुंज में नीलगिरि फार्म लिया है। 
 
इसी तरह जब फार्मिजेन ने 2017 में शुरुआत की थी तो उसके पास बेंगलूरु और हैदराबाद में 24 फार्म थे। अब कंपनी ने सूरत, चंडीगढ़ और कोयंबत्तूर में भी फार्म की शुरुआत की है। अब उसकी योजना चेन्नई और पुणे सहित 100 शहरों में अपना विस्तार करने की है। एडिबल रूट्स के मंडावेवाला कहते हैं कि जमीन के एक हिस्से का साझा करने का एक अतिरिक्त फायदा यह है कि जब प्रकृति आपको ज्यादा उपज देती है तो आपके पास उसे बांटने के लिए एक समुदाय है। खेती करने से पहले हर बीज और घर में बनी खाद की गहराई से जांच की जाती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके उनमें कोई रसायन या कीटनाशक न हो। 
 
फार्मिजेन के तीन सहसंस्थापकों में से एक शमीक चक्रवर्ती कहते हैं, 'हम नियमित रूप से मिट्टी और बोरवेल से निकलने वाले पानी की जांच करते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जमीन जैविक रहे।' किसान उपज की देखभाल करते हैं जबकि फार्मिजेन ग्राहक लाती है, उपज का फैसला करती है और ताजा उपज की साप्ताहिक आपूर्ति संभालती है।  गुरुग्राम में जिला कृषि अधिकारी दीन मोहम्मद खान कहते हैं, 'हमारे पास घर पर आपूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं है क्योंकि इसके पीछे अवधारणा लोगों को खेती से जोडऩे की है।' उनके परिवार ने ग्रीन लीफ इंडिया के जरिये जमीन किराये पर दे रखी है। 
 
ग्रीन लीफ इंडिया के फार्म गुरुग्राम के करीब टिकली गांव में हैं। कंपनी खेती के लिए 5,400 वर्ग फुट जमीन 4,479 रुपये प्रति माह के किराये पर देती है। इनमें श्रमिक और खेत में कामकाज का खर्च भी शामिल है। यह सामूहिक खेती परियोजना है जो दो साल पहले शुरू हुई थी। कंपनी के अवैतनिक सलाहकार खान ने कहा कि दिल्ली और आसपास के शहरों में आपूर्ति की जाने वाली सब्जियों में गंदे पानी का इस्तेमाल होता है। उन्होंने कहा, 'गंदे पानी में कई तरह के भारी रसायन होते हैं जो धीरे-धीरे हमारे शरीर में पहुंचकर उसे हानि पहुंचा रहे हैं।' खान ने खेतों को किराये पर देने के लिए किसानों से बात की। आज इस सामूहिक खेती के 80 सदस्य हैं। 
 
खान ने वह समय याद किया जब एक अंतरराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी कंपनी के उपाध्यक्ष ने उनसे शिकायत की कि हर किसी के खेत में बड़े आलू हो रहे हैं जबकि उनके खेत में एक भी आलू पैदा नहीं हुआ। उन्होंने कहा, 'वह नहीं जानते थे कि उनके खेत में भी आलू हैं क्योंकि वह नहीं जानते थे कि आलू जमीन के भीतर होता है।' इस तरह के किस्सों से साफ है कि शहरी लोगों को खेती से जोडऩे की जरूरत है। यह एक तरह का आंदोलन है जो हैदराबाद की कंपनी बीफोरेस्ट जैसी कंपनियों की सामूहिक खेती के रूप में आकार ले रहा है। कंपनी सभी लोगों को उनके हिस्से की जमीन देना चाहती है जहां एक दिन आवासीय सुविधाएं भी होंगी। जहां सार्वजनिक क्षेत्र में जंगल की तरह पेड़ लगाए जाएंगे। रेड्डी ने कहा, 'आप भावी पीढिय़ों के लिए फार्म बना रहे हैं, आप एक चक्र की बात नहीं कर रहे हैं बल्कि अगले 100 साल की योजना बना रहे हैं। उत्पादन में बदलाव आ सकता है लेकिन जंगल बरकरार रहेंगे।'
 
बीफोरेस्ट के पास बेंगलूरु के पास कृष्णागिरि जिले में दो सामूहिक फार्म हैं। साथ ही कंपनी के पास कोडागू और हैदराबाद के करीब भी एक-एक फार्म है। 100 से अधिक लोगों ने इनमें खेती (और भावी आवास) के लिए भूखंड खरीदे हैं। वे पौधरोपण के काम में नियमित रूप से बीफोरेस्ट की टीम की मदद करते हैं।  बीफोरेस्ट के सभी सामूहिक फार्म में भूखंड का आकार तय और पूर्व निर्धारित है जो सामथ्र्य और चार लोगों के परिवार के लिए जरूरी न्यूनतम क्षेत्र जैसे मानकों पर आधारित है। उदाहरण के लिए हैदराबाद फार्म में भूखंड का आकार प्रति व्यक्ति 1.25 एकड़ रखा गया है और इसकी कीमत 40 लाख रुपये है। बेंगलूरु में कंपनी के एक फार्म का नाम वहां उगने वाले पेड़ों नाम पर टैमरिंड वैली रखा गया है। यहां पांच-छह एकड़ जमीन अनाज और सब्जी उपजाने के लिए रखी गई है। फार्मिजेन के चक्रवर्ती बीफोरेस्ट के भी सदस्य हैं। उन्होंने कहा, 'हमारे शहर रहने लायक नहीं रह गए हैं, इसलिए सतत जीवन पद्घति अब पसंद का विषय नहीं रह गई है।' मंजूनाथ कहते हैं, 'अपनी जमीन पर जैविक उपज तैयार करने से ज्यादा सुकून इस बात का है कि हम दूसरों को भी ऐसा करने में मदद कर रहे हैं।' शहरी लोगों और किसानों के बीच यह तालमेल स्वच्छ भोजन के संकट से निपटने के लिए भारत का सबसे व्यावहारिक समाधान है।
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