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नई तकनीक बदल रही किसानों की तकदीर

दिलीप कुमार झा और विभु रंजन मिश्रा /  October 21, 2019

पहली नजर में जेएस राणा की पांच एकड़ खेती हरियाणा के करनाल जिले के नंदाना गांव के अन्य किसानों के खेतों से अलग नहीं दिखती है। लेकिन करीब से देखने पर आपको उनके खेतों के करीब से गुजर रही सड़क के किनारे लगे खंभों पर टेलीमेट्री उपकरण के साथ पैनल दिखाई देते हैं। लेकिन आपको उनके खेतों में गाड़े गए संवेदक नहीं दिखाई देते हैं जिनसे राणा को अपने खेतों की स्मार्ट सिंचाई में मदद मिलती है। ये संवेदक मिट्टी में आद्र्रता की जानकारी देते हैं और इन्हीं आंकड़ों के आधार पर जरूरत के मुताबिक सिंचाई होती है। राणा जैन लॉजिक का इस्तेमाल करते हैं जो एक एकीकृत ऑटोमेशन सॉल्यूशन है। इसे जैन इरिगेशन ने सिंचाई के प्रबंधन के लिए विकसित किया है। पिछले साल राणा ने अपने खेतों में गेहूं उगाया था। इस साल प्रौद्योगिकी की मदद से उन्होंने धान की खेती की है। धान की खेती में बहुत पानी लगता है और अगर सिंचाई प्रौद्योगिकी उपलब्ध नहीं होती तो वह धान नहीं बोते। 

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जैन लॉजिक का मुख्य आधार मिट्टी में आद्र्रता की निगरानी करने वाले संवेदक हैं जो लगातार फसल की जड़ों में आद्र्रता की निगरानी करते रहते हैं। टेलीमीट्रिक उपकरण या पास मौजूद नियंत्रण इकाइयां इस सूचना को ग्रहण करती हैं।  इन उपकरणों पर मोबाइल सिम कार्ड लगे हैं। वे आंकड़ों को विश्लेषण के लिए बैकएंड सर्वर को भेजते हैं। बैंकएंड टीम इन आंकड़ों को सिंचाई के आंकड़ों और मौसम विभाग जैसे बाहरी स्रोतों से मिले बारिश के अनुमान के आंकड़ों के साथ मिलाती है और मशीन लर्निंग एलगोरिद्म का इस्तेमाल करते हुए इनका विश्लेषण करती है।
 
इससे राणा को यह अंदाजा मिलता है कि अगले सात दिनों में उन्हें अपने खेतों में कब और कितना पानी देना है। जैन इरिगेशन के प्रबंध निदेशक अनिल जैन ने कहा, 'अगर बारिश अनियमित रहती है या ज्यादा समय तक रहती है तो किसान सिंचाई की योजना बना सकते हैं।' राणा और उनके साथी किसान पहली बार ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल करते हुए निर्यात श्रेणी का बासमती चावल उगा रहे हैं। महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश सहित कुछ राज्यों में पिछले कई वर्षों से धान के लिए ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन हरियाणा और पंजाब में अभी इसकी शुरुआत हो रही है। इन राज्यों में अत्यधिक इस्तेमाल के कारण भूजल स्तर तेजी से घट रहा है। करनाल और अन्य जिलों में करीब 25 किसान ड्रिप सिंचाई पर हाथ आजमा रहे हैं। स्विस एजेंसी फॉर डेवलपमेंट ऐंड कोऑपरेशन द्वारा प्रायोजित प्रायोगिक परियोजना के तहत राणा की जमीन को संवेदक आधारित स्मार्ट सिंचाई तकनीक के लिए चुना गया है। यह संस्था किसानों को कम पानी और कम कार्बन के इस्तेमाल से धान की खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही है ताकि इसे यूरोपीय देशों को निर्यात किया जा सके। उसने आद्र्रता का स्तर मापने के लिए जैन इरिगेशन से संपर्क साधा क्योंकि वह सुनिश्चित करना चाहती थी कि किसान सामान्य सिंचाई के बजाय ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल कर रहे हैं। 
 
धान की खेती में बहुत पानी लगता है और इसका ग्रीनहाउस गैसों पर भयावह असर हो सकता है। कृषि विज्ञानी धान की खेती में ड्रिप सिंचाई की प्रौद्योगिकी को कारगर बनाने के लिए लगातार नवीन प्रयोग कर रहे हैं। जैन ने कहा कि प्रौद्योगिकी के स्वास्थ्य के लिए भी कई फायदे हैं। खेतों में पानी जमा होने से पेचिश, मलेरिया और टाइफाइड जैसे जलजनित रोगों का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने कहा, 'इस प्रौद्योगिकी के जरिये स्रोत से पौधों की जड़ तक पानी पहुंचाने में खेतों में पानी जमा नहीं होता है और इस तरह जलजनित रोग नहीं फैलते हैं।' हालांकि संवेदकों की कीमत कम नहीं है क्योंकि इनका आयात किया जाता है। मिट्टी की आद्र्रता मापने वाले अच्छी गुणवत्ता के एक संवेदक की कीमत 22 हजार से 25 हजार रुपये तक होती है। सटीक आंकड़ों के लिए अमूमन हरेक एकड़ जमीन के लिए एक संवेदक की जरूरत होती है। साथ ही टेलीमेट्री उपकरण लगाने में भी लागत आती है और सदस्यता शुल्क भी देना पड़ता है। 
 
कंपनी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष (उत्पाद विकास) अभिजित जोशी ने कहा कि कंपनी इसकी लागत में कटौती करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा, 'हम मिट्टी में आद्र्रता मापने वाले संवेदकों की कीमत में कमी के लिए जापानी कंपनियों के साथ काम कर रहे हैं और अगले साल तक हम इस तरह के उत्पाद जारी करने में सक्षम होंगे।' कंपनी की तकनीक का भी जलगांव में उसके अपने आम के बागानों में परीक्षण किया जा रहा है। जोशी ने कहा, 'यह एक अलग तरह का परीक्षण है जिसे हम अल्ट्रा हाई डेंसिटी प्लांटेशन कहते हैं। अमूमन आम के बागानों में किसान पेड़ों के बीच 30 फुट की जगह रखते हैं। इसका मतलब यह है कि एक एकड़ जमीन पर करीब 40 पेड़ लगाए जाते हैं लेकिन अब हम इसे बदलकर दो से तीन मीटर कर रहे हैं। यानी हम प्रति एकड़ करीब 600 आम के पेड़ लगा सकते हैं।' लेकिन इसमें आम के परंपरागत पेड़ों का इस्तेमाल नहीं हो सकता है। कंपनी ने जिन पेड़ों का इस्तेमाल किया है उनका विकास काटछांट और अन्य तकनीकों से नियंत्रित किया जाता है। जोशी ने कहा कि परीक्षण के शुरुआती नतीजों के मुताबिक प्रति एकड़ उपज 30 से 40 फीसदी तक बढ़ सकती है। कंपनी दक्षिण भारत खासकर आंध्र प्रदेश के आम किसानों के बीच इन तरीकों को बढ़ावा देने के लिए उन्नति परियोजना के हिस्से के रूप में कोका कोला के साथ भी काम कर रही है। जैन इरिगेशन कोका कोला को माजा ड्रिंक के लिए आम के गूदे की आपूर्ति करती है। 
 
जैन इरिगेशन ऐसे कुछ उपकरणों और प्रौद्योगिकी का परीक्षण के तौर फिलीपींस स्थित अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान में इस्तेमाल कर रही है। साथ ही वह इसे जापान में बढ़ावा देने के लिए जापानी कंपनियों के साथ मिलकर काम कर रही है। अमेरिका में भी इसका परीक्षण शुरू करने के लिए बातचीत चल रही है। कृषि जिंसों के विशेषज्ञ विजय सरदाना ने कहा, 'डेटा एनालिटिक्स और उत्पादन बढ़ाने में इसका इस्तेमाल जिम्मेदारी से किया जाना चाहिए। सरकार ने 22 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड बांटे हैं। लेकिन सिंचाई की जरूरतों, मौसम पूर्वानुमान या बुआई की संभावना के बारे में सुझाव देने की कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए कृषि तकनीकों को आधुनिक खेती के जिम्मेदार साधनों के साथ जोड़ा जाना चाहिए।'
 
कई अन्य भारतीय एवं वैश्विक ड्रिप सिंचाई कंपनियां असामान्य और अनियमित बारिश से निपटने और भूजल के कारगर प्रबंधन के लिए नई तकनीक विकसित कर रही हैं। इजरायल की कंपनी रिवुलिस इरिगेशन ने जल संरक्षण और सिंचाई प्रबंधन के जरिये लागत घटाने में किसानों की मदद के लिए एक उपग्रह आधारित सॉफ्टवेयर सॉल्यूशन मन्ना विकसित किया है। यह सॉफ्टवेयर उपग्रह से मिली तस्वीरों, स्थानीय मौसम केंद्रों और फसल मॉडल से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल करता है। मन्ना ऐप फसल और स्थान के आधार पर सिंचाई के सुझाव देता है और रोज स्थानीय स्तर की मौसम की जानकारी देता है। रिवुलिस इरिगेशन के प्रबंध निदेशक कौशल जायसवाल ने कहा, 'अब तक सिंचाई में पानी की सही मात्रा और सही समय के बारे में कोई वैज्ञानिक सोच नहीं रही है। मन्ना किसानों को उनकी सिंचाई जरूरतों का सटीक पूर्वानुमान लगाने, नुकसान कम करने, लागत बचाने और उपज सुधारने में मदद करेगा।'
 
जायसवाल ने कहा कि जो भारतीय किसान इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर रहे हैं उनकी पैदावार 15 से 20 फीसदी बढ़ गई है। शुरुआत में रिवुलिस का जोर महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और उत्तर प्रदेश तथा तमिलनाडु के कुछ हिस्सों पर है। बाद में कंपनी दूसरे राज्यों में अपना विस्तार करेगी। कंपनी सबसे पहले कपास, गन्ना, अनार, अंगूर और टमाटर की फसलों पर ध्यान देगी। मुंबई में पॉलिमर कंपनी ऐम्बी इंडस्ट्रीज ने एक अनोखी तकनीक इजाद की है। अवाना ब्रांड के तहत इसे जलसंचय नाम दिया गया है। इस तकनीक से आप पानी के भंडारण के लिए किसी तालाब में जमीन के ऊपर प्लास्टिक की पतली दीवारों की दो परतों के बीच पीईएल बोतल की तरह जल संग्राहक लगाते हैं। इससे एक साल के लिए पानी का संग्रहण होता है। अवाना की मुख्य कार्याधिकारी मैथिली अप्पलवार ने कहा, 'हमने महाराष्ट्र में करीब 5,000 किसानों के साथ हाथ मिलाया है और अब तक हम 200 अरब लीटर पानी बचा चुके हैं। इससे किसानों की आय में औसत 98.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।' महाराष्ट्र सरकार ने भी पूरे राज्य में इस तकनीक का विस्तार करने के लिए एम्बी के साथ करार किया है। एम्बी सरकार की जलयुक्त शिवर योजना में भी साझेदार है। प्रमुख कृषि राज्यों महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और गुजरात में मॉनसून का वितरण अनियमित रहा है जिससे खड़ी फसल को नुकसान पहुंचा और उत्पादन भी प्रभावित हुआ। हालांकि मॉनसून में औसत बारिश सामान्य रही। पिछले साल सूखे के कारण खरीफ और रबी की फसलों को नुकसान हुआ था जबकि इस साल मूसलाधार बारिश के कारण इन सभी राज्यों में बाढ़ आई।
Keyword: agri, farmer, crop, technology,,
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