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आसान नहीं है अस्थायी कामगारों के लिए कानून बनाना

सोमेश झा /  October 20, 2019

केंद्र सरकार देश में श्रम कानूनों के जटिल ढांचे को सरल बनाने का प्रयास कर रही है और इसमें बढ़ती गिग इकनॉमी (अल्पावधि अनुबंध या फ्रीलांस व्यवस्था) के हितों का पूरा ध्यान रखना चाहती है। यही वजह है कि श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा 17 सितंबर को जारी सामाजिक सुरक्षा विधेयक संहिता, 2019 के तीसरे मसौदे में गिग वर्कर, प्लेटफॉर्म वर्कर और गिग इकनॉमी जैसे शब्दों का जिक्र है। इसका मतलब है कि सरकार गिग वर्करों (अस्थायी कामगारों) के लिए किसी न किसी रूप में सामाजिक सुरक्षा चाहती है। अमूमन गिग वर्करों का आशय ऐसे कामगारों से है जिन्हें मांग के समय काम पर रखा जाता है। इनमें उबर और ओला के ड्राइवर और जोमैटो और स्विगी के लिए फूड डिलिवरी का काम करने वाले लोग शामिल हैं। ये ऐसे रोजगार हैं जिनका सृजन प्रौद्योगिकी से संचालित प्लेटफॉर्म द्वारा किया जाता है और कामगार कंपनी के साथ जुड़े रहने के लिए बाध्य नहीं है और जब तक चाहे काम छोड़ सकता है। 

 
इसके अलावा फ्रीलांसर के तौर पर काम करने वाले ग्राफिक डिजाइनर, कोडर, वेब डिजाइनर और लेखक भी शामिल हैं जो जरूरत के मुताबिक अल्पावधि परियोजनाओं पर काम करते हैं। इन्हें भी गिग वर्करों की श्रेणी में शामिल किया जा सकता है। ये लोग अपनी सुविधा या काम की उपलब्धता के मुताबिक काम करते हैं। घरेलू और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ऐप आधारित सेवाओं की बाढ़ आने से भारत की गिग इकनॉमी का आकार तेजी से बढ़ा है। मानव संसाधन सलाहकार कंपनी नोबल हाउस की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में भारत में 70 फीसदी कंपनियों ने बड़े सांगठनिक काम के लिए कम से कम एक बार अस्थायी कामगारों की सेवाएं ली थीं।  पंरपरागत नियोक्ता-कर्मचारी मॉडल में श्रम कानून लागू होते हैं। किसी कामगार को सीधे तौर पर या किसी ठेकेदार के जरिये स्थायी आधार पर या तय अवधि के अनुबंध पर नौकरी पर रखा जाता है। इन कामगारों को भविष्य निधि, बीमा, ग्रैच्युटी और कुछ मामलों में छंटनी से बचाव जैसे फायदे मिलते है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कामगार की किस श्रेणी में आते हैं और आपकी कंपनी का आकार क्या है। लेकिन गिग वर्कर्स 'कर्मचारी' या 'कामगार' की परिभाषा में फिट नहीं बैठते हैं और यही वजह है कि वे श्रम कानूनों के दायरे से बाहर हैं। उन्हें इसके दायरे में लाने की असली चुनौती उस काम की प्रकृति है जो वे करते हैं। उदाहरण के लिए 32 साल में मोहित दिल्ली में स्विगी के लिए फूड डिलिवरी करते हैं और हफ्ते में केवल तीन दिन शुक्रवार, शनिवार और रविवार को काम करते हैं। उन्हें हरेक फूड डिलिवरी पर 65 से 70 रुपये मिलते हैं। 
 
उन्होंने कहा, 'कोई लिखित अनुबंध नहीं है। मुझे मेरे काम के आधार पर पैसे मिलते हैं। मैं कभी भी मोबाइल ऐप से बाहर निकलकर इस काम को खत्म कर सकता हूं।' इसी तरह शेवरले सेल के मालिक बलिस्तर सिंह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में उबर और ओला दोनों के लिए काम करते हैं। जहां तक गिग वर्करों को परिभाषित करने की बात है तो सरकार इसमें यथास्थिति बनाए रखने के पक्ष में है। मसौदे में कहा गया है कि गिग वर्कर ऐसा व्यक्ति है जो एक व्यवस्था में काम करता है या भागीदारी करता है और परंपरागत नियोक्ता-कर्मचारी संबंध से बाहर की गतिविधियों से कमाई करता है। 
 
इसकी परिभाषा को व्यापक बनाने के लिए सरकार ने मसौदे में अलग से 'प्लेटफॉर्म वर्कर्स' का जिक्र किया है। मसौदे के मुताबिक, 'प्लेटफॉर्म वर्क एक तरह का रोजगार है जिसमें संस्थान या व्यक्ति भुगतान के बदले खास समस्याओं को सुलझाने या खास सेवाएं देने के लिए दूसरे संस्थानों या लोगों तक पहुंच बनाने के लिए ऑनलाइन प्लेटफार्म का इस्तेमाल करता है।' गिग और प्लेटफॉर्म वर्करों के प्रावधान असंगठित क्षेत्र के कामगारों से संबंधित अध्याय में दिए गए हैं। यह इस बात का संकेत है कि सरकार उन्हें संगठित श्रमिकों की श्रेणी में डालने को तैयार नहीं है जहां सामाजिक सुरक्षा लाभों का एक हिस्सा नियोक्ता को देना पड़ता है। निशीथ देसाई ऐसोसिएट्स में लीडर 'लेबर ऐंड एम्पलॉयमेंट लॉ (प्रैक्टिस) अजय सिंह सोलंकी ने कहा, 'सरकार ने गिग वर्करों की जरूरतों के साथ संतुलन कायम करने और उन्हें परंपरागत कर्मचारी-नियोक्ता संबंधों से अलग करने की कोशिश की है। उन्हें सीधे तौर पर भविष्य निधि और कर्मचारी राज्य बीमा जैसे प्रावधानों का लाभ देने के बजाय उनके लिए योजनाएं बनाने के प्रस्ताव में यह बात दिखती है।' अगर यह मसौदा कानून बनता है तो गिग वर्कर कर्मचारी भविष्य निधि और कर्मचारी राज्य बीमा योजनाओं, ग्रैच्युटी और मातृत्व अवकाश जैसे लाभों की परिधि से बाहर होंगे। इनमें से कुछ योजनाओं में कंपनियों को पैसा देना पड़ता है जिससे उन पर वित्तीय बोझ बढ़ता है। वेतन संहिता अधिनियम में भी गिग वर्करों को बाहर रखा गया था। यह संहिता अगस्त 2019 में कानून बनी थी। सरकार उन्हें न्यूनतम वेतन कानून से भी बाहर रखना चाहती है।
 
लेकिन गिग वर्करों को श्रम कानूनों के दायरे में लाने की सरकार की कवायद से उद्योग में बेचैनी है। ओएलएक्स पीपल के मुख्य कार्याधिकारी दिनेश गोयल ने कहा, 'नीति निर्माण की प्रक्रिया समावेशी होनी चाहिए जिसमें फौरी प्रतिक्रिया के बजाय सभी पक्षों के साथ सलाह मशविरा होना चाहिए। सरकार को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे एक अहम उद्योग बर्बाद हो जाए। गिग वर्करों को सामाजिक सुरक्षा लाभों की जरूरत है लेकिन यह स्पष्ट होना चाहिए कि कौन सी योजनाएं इसके दायरे में आएंगी और इसकी लागत कौन वहन करेगा।' ओएलएक्स पीपल जोमैटो और स्विगी जैसी कंपनियों को कर्मचारियों को नौकरी पर रखने में मदद करती है और पिछले छह महीनों में उसने करीब 20 फीसदी गिग वर्करों की भर्ती की है। उद्योग की चिंता यह है कि उसे गिग वर्करों की सामाजिक सुरक्षा की लागत वहन करनी होगी। जाहिर है कि यह कदम कारेबारियों के अनुकूल नहीं होगा। गोयल का कहना है कि गिग इकनॉमी कर्मचारियों और नियोक्ताओं, दोनों के लिए आकर्षक रही है क्योंकि यह उनके लिए सुविधाजनक है। 
 
सोलंकी ने कहा कि गिग इकनॉमी के नियमन की किसी भी कोशिश से एग्रीगेटरों और प्लेटफॉर्मों पर प्रतिकूल असर होगा जो इस तरह की व्यवस्था में यकीन रखते हैं। इसमें कामगारों के लिए कोई सख्त कानून नहीं है और ज्यादा अनुपालन का झंझट भी नहीं है। प्रस्तावित कानून के मुताबिक केंद्र सरकार गिग और प्लेटफॉर्म वर्करों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का खाका तैयार करेगी। इनमें बीमा और विकलांगता कवर, सुरक्षा और मातृत्व लाभ तथा बुढ़ापे में गुजारे की सुविधा शामिल है। लेकिन उद्योग को आशंका है कि संसद के विधेयक पारित करने के बाद सरकार इन योजनाओं में एग्रीगेटरों की भूमिका को परिभाषित कर सकती है। 
 
सवाल यह है कि क्या ये कानून सही मायनों में कारगर होंगे। 2008 में बनाए गए असंगठित क्षेत्र श्रमिक सामाजिक सुरक्षा कानून में भी इसी तरह की योजनाएं बनाने का प्रावधान है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने इस कानून के तहत असंगठित क्षेत्र के कामगारों के कल्याण के लिए 1,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के महासचिव अमरजीत कौर ने कहा, 'हाल में वित्त मंत्रालय ने श्रम मंत्रालय से इस फंड में पड़े 700 करोड़ रुपये वापस लेने को कहा था। असंगठित क्षेत्र के कामगारों के कल्याण की व्यवस्था बुरी स्थिति में है।' अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से संगठित कामगारों के लिए जो व्यवस्था काम नहीं कर पाई, वह उस वर्ग के लिए कैसे काम करेगी जिसमें शामिल लोग ड्राइवर और डिजाइनर जैसे अलग-अलग वर्गों से आते हैं।
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