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वृद्धि को लेकर चिंतित थी मौद्रिक नीति समिति

अनूप रॉय / मुंबई October 18, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक की 6 सदस्यों वाली मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) मौद्रिक नीति का लाभ निचले स्तर तक न पहुंचने को लेकर चिंतित थी। समिति की बैठक के विस्तृत ब्योरे से पता चलता है कि अर्थव्यवस्था में मंदी और निजी क्षेत्र से निवेश में गिरावट को लेकर भी सदस्यों ने चिंता जताई। समिति की बैठक तीन दिन 1, 2 और 4 अक्टूबर को चली, जिसके बाद केंद्रीय बैंक ने नीतिगत रीपो दर में 25 आधार अंक की कटौती की थी और कहा कि अभी रुख समावेशी बना रहेगा, क्योंकि वृद्धि बहाल करने के लिए इसकी जरूरत है। 
 
ब्योरे के मुताबिक गवर्नर शक्तिकांत दास ने बैठक में कहा, 'कुल मिलाकर घरेलू मांग में उल्लेखनीय रूप से सुधार हुआ है। निजी खपत कमजोर रहने, जिसका असर लंबे समय तक कुल मांग पडऩा चिंता का विषय है।' दास के मुताबिक निजी निवेश गति गंवा चुका है। उन्होंने कहा कि विनिर्माण क्षेत्र का क्षमता उपभोग हाल की अवधि के दौरान दीर्घावधि औसत के नजदीक पहुंच गया है, उसके बावजूद कॉर्पोरेट क्षेत्र नया निवेश करने से बच रहा है।  पहली तिमाही और 2019-20 की शेष अवधि में महंगाई दर 4 प्रतिशत से नीचे बने की संभावना पर विचार करते हुए गवर्नर ने पाया कि वृद्धि संबंधी चिंता का समाधान करने की संभावना है। बाहरी सदस्य चेतन घाटे ने बैंकिंग सिस्टम द्वारा नीति का लाभ न पहुंचाने को लेकर चिंता जताई। अगस्त की नीतिगत समीक्षा तक बैंकों द्वारा दिए जाने वाले नए कर्ज पर ब्याज दरों में 20 आधार अंक की कटौती की गई, जबकि फरवरी के बाद से रीपो दर में 110 आधार अंक की कमी की जा चुकी है। 
 
इसे देखते हुए सदस्यों ने इस बात पर जोर दिया कि रिजर्व बैंक को इस बात के लिए दबाव देना चाहिए कि कर्ज से बाहरी बेंचमार्क को जोड़ा जाए, जिससे इसके बेहतर परिणाम नजर आ सकें।  बहरहाल मौद्रिक नीति एक अंतराल के साथ काम करती है, लेकिन भारत के मामले में यह अंतराल बैंकिंग व्यवस्था में टकराव के कारण स्थिति और खराब करता है। घाटे ने कहा कि इसकी वजह से एमपीसी की कवायदों को मूर्त रूप देना जटिल हो गया है। घाटे इस बात से भी चिंतित थे कि कुछ तिमाही तक गिरावट के बाद महंगाई बढ़ रही है। खाद्य महंगाई अगस्त में 3 प्रतिशत बढ़ी, जिसपर सावधानी से नजर रखने की जरूरत है, लेकिन मॉनसून की देरी से वापसी रबी फसल के लिए लाभदायक होगी। 
 
घाटे ने कहा कि मौद्रिक नीति प्रोत्साहन का स्थायी रूप नहीं हो सकती। उन्होंने पाया कि निगमित कर में कटौती का सरकार के राजकोषीय घाटे पर मामूली असर पड़ेगा।  एक और बाहरी सदस्य पमी दुआ ने निजी खपत और निवेश गतिविधियां कमजोर रहने को लेकर चिंता जताई वहीं उनकी चिंता ग्राहकों और कारोबार की धारणा को लेकर भी रही। सरकार के कदमों व मौद्रिक नीति के लंबित असर को देखने और इंतजार करने की संभावना जताते हुए दुआ ने 25 आधार अंक कटौती का पक्ष लिया और कहा कि वृद्धि दर सुस्त रहने और महंगाई दर नियंत्रण में रहने के कारण ऐसा किया जा सकता है। 
 
बाहरी सदस्य रवींद्र ढोलकिया एकमात्र सदस्य थे, जो रीपो दर में 40 आधार अंक की कटौती चाहते थे। उनका तर्क था कि ज्यादा आक्रामक ररूप से काम करने की जरूरत है, जिससे वास्तविक ब्याज दरों में सुधार हो सके और अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ सके। ढोलकिया ने कहा कि उनकी तरफ से प्रस्तावित ज्यादा कटौती के प्रस्ताव की अभी भी संभावना है।  रिजर्व बैंक के कार्यकारी निदेशक माइकल पात्रा ने कहा, 'मौजूदा चुनौतीपूर्ण माहौल में मेरा विचार है कि डेटा पर निर्भरता के बजाय विवेक पर जोर होना चाहिए।'
 
पात्रा ने 25 आधार अंक क टौती की वकालत करते हुए कहा, 'अपने काउंटर साइकिल रोल में मौद्रिक नीति नकारात्मक अंतर कम करने के लिए जगह भरने वाली होनी चाहिए। महंगाई दर लक्ष्य से नीचे है और आउटपुट क्षमता से कम। ऐसे में कुछ धैर्य की जरूरत है। नीतिगत कार्रवाई की संभावना नजर आ रही है, ऐसे में यह अंतर कम किया जा सकता है।'  मौद्रिक नीति के प्रभारी और कार्यकारी निदेशक बीपी कानूनगो के मुताबिक 2019-20 की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 5 प्रतिशत रहना चकित करने वाला था और रिजर्व बैंक के 5.8 प्रतिशत के कम अनुमान से भी नीचे रही। कानूनगो ने कहा, 'खासकर यह चिंता का विषय है क्योंकि निजी खपत पर व्यय में तेज गिरावट की वजह से ऐसा हुआ है। निवेश गतिविधियां सुस्त बनी हुई हैं और निर्यात मं कमी से कमजोर वैश्विक मांग का पता चलता है।' मंदी की वजह घरेलू मांग में कमी थी। सरकार की ओर से उठाए गए कदम और पिछली नीतिगत दरों में कटौतियोंं का असर धीरे धीरे होगा। मौद्रिक नीति में बदलाव के पिछले कदमों और सरकार द्वारा हाल के कदमों को को प्रभावी बनाने की जरूरत है, जिससे घरेलू मांग को समर्थन मिल सके। 
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