बिजनेस स्टैंडर्ड - विश्वविद्यालय रैंकिंग का गहराता भ्रम
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, November 13, 2019 04:43 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

विश्वविद्यालय रैंकिंग का गहराता भ्रम

अजित बालकृष्णन /  October 18, 2019

वैश्विक रैंकिंग में भारतीय विश्वविद्यालयों की खराब हालत पर चिंतित होने के बजाय हमें उद्यमशीलता को बढ़ावा देने एवं बदलते दौर के हिसाब से ढलने की जरूरत है। बता रहे हैं अजित बालकृष्णन

 
यही मौसम है: इस त्योहारी मौसम में जब खुदरा बिक्री शृंखलाएं अपने उत्पादों की पेशकश और अविश्वसनीय रूप से सस्ती नजर आने वाली कीमतों को लेकर मीडिया में ढिंढोरा पीट रही हैं, उसी समय ब्रिटेन, अमेरिका एवं ऑस्ट्रेलिया के विश्वविद्यालय भारतीय मीडिया में मौजूदगी दर्ज कराते हुए भारतीयों को लुभाने में लगे हुए हैं। दोनों के बीच फर्क बस यह है कि भुगतान-आधारित विज्ञापनों पर पैसे खर्च करने के बजाय मीडिया कंपनियों की रेटिंग को जरिया बनाकर अपना दावा पेश करते हैं। टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग्स, यूएस न्यूज़ और वल्र्ड बेस्ट कॉलेजेज रिपोर्ट जैसी शैक्षणिक संस्थान रेटिंग की सूची काफी लंबी है।
 
आश्चर्य की बात यह है कि सम्मानित भारतीय मीडिया भी इन रैंकिंग को पूरी जगह देतीं है। इस साल की टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग से जुड़ी खबर 'वैश्विक रैंकिंग में भारत शीर्ष 300 के बाहर', 'वैश्विक रैंकिंग में भारतीय विश्वविद्यालय शीर्ष 300 के बाहर' और 'ऊंची रैंकिंग क्यों नहीं हासिल कर सकते हैं भारतीय विश्वविद्यालय?' जैसे शीर्षकों के साथ पेश की गई। कुछ मीडिया रिपोर्ट में इस रेटिंग को थोड़ा सहज अंदाज में 'वैश्विक रैंकिंग में भारतीय विश्वविद्यालयों की स्थिति सुधरी' और 'शीर्ष 200 में 25 संस्थान शामिल' के रूप में पेश किया गया। लेकिन इसके साथ यह भी जुड़ा था कि यह स्थिति उभरती अर्थव्यवस्थाओं के विश्वविद्यालयों की सूची की है।
 
अब भी कई लोग भारतीय विश्वविद्यालयों के बारे में इस तरह की 'बुरी' खबर के बारे में प्रतिक्रिया लेने की कोशिश करते हैं, मसलन  'नाखुश आईआईटी संस्थानों ने की टाइम्स रैंकिंग की शिकायत, मानव संसाधन मंत्रालय ने पहले खुद को दुरुस्त करने को कहा।' एक और खबर में कहा गया कि 'कोई भी भारतीय संस्थान टाइम्स रैंकिंग के शीर्ष 200 में जगह बनाने में रहा नाकाम, आईआईटी दिल्ली एवं बंबई को नए संस्थानों ने पीछे छोड़ा'। आईआईटी दिल्ली के निदेशक रामगोपाल राव को यह कहते हुए उद्धृत किया गया कि रेटिंग तय करने की पद्धति अस्पष्ट एवं अपारदर्शी है। मानव संसाधन मंत्रालय का यह बयान भी पेश किया गया कि मंत्रालय की नजर में संस्थानों को आत्मनिरीक्षण की जरूरत है। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'पुराने संस्थानों को रैंकिंग में नुकसान होने की वजह यह है कि टाइम्स रैंकिंग में प्रति शिक्षक उत्पादकता का तरीका इस्तेमाल होता है। मान लीजिए, आपने 100 शोधपत्र प्रकाशित किए और आपके पास 10 शिक्षक हैं तो आपकी प्रति-शिक्षक उत्पादकता 10 हुई। वहीं दूसरे संस्थान में 250 शिक्षक मिलकर 500 पत्र पेश करते हैं तो उनकी उत्पादकता महज 2 हुई। यही वजह है कि पुराने आईआईटी पीछे रह जा रहे हैं।'
 
अगर आप टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग्स में प्रयुक्त गणना-पद्धति पर बारीक निगाह डालें तो वह कहता है, 'हम सावधानी से बनाए गए प्रदर्शन संकेतकों का इस्तेमाल करते हैं जिन्हें पांच समूहों में बांटा गया है: शिक्षण (सीखने का परिवेश), शोध (मात्रा, आय एवं प्रतिष्ठा), प्रशस्ति (शोध प्रभाव), अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य (स्टाफ, छात्र एवं शोध) और उद्योग आय (ज्ञान का हस्तांतरण)।' यह सब सुनने में अच्छा लगता है, सिवाय इसके कि इन संकेतकों के कई प्रमुख हिस्से एक सर्वे से लिए गए हैं। यह सर्वे मुख्यत: अमेरिका एवं ब्रिटेन से संबंधित 11,554 अनुभवी एवं प्रकाशित विद्वानों के बीच किया गया था।
 
लेकिन इसमें यह जिक्र भी किया गया है कि भारतीय संभ्रांत वर्ग अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका, ब्रिटेन या ऑस्ट्रेलिया के विश्वविद्यालयों में भेजना पसंद करता है। लेकिन इस समस्या का एक हिस्सा यह है कि भारत का कुलीन तबका अपने बच्चों को सबसे अच्छे स्कूलों में भेजता है और फिर बेहतरीन अंडर-ग्रैजुएट कॉलेजों में भी उन्हें प्रवेश दिला देता है। लेकिन कुलीन परिवारों के ये बच्चे आईआईटी, एनआईटी और आईआईएम जैसे भारत के बेहद प्रतिस्पद्र्धी उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश की मुश्किल परीक्षा पास करने में नाकाम हो जाते हैं। मैंने देखा है कि प्रतिभा पर जोर देने वाले माता-पिता भी कई बार बच्चों के दबाव में आकर बैंक से एक करोड़ रुपये से भी अधिक कर्ज लेकर उन्हें विदेश भेजने को राजी हो जाते हैं। इसकी वजह यह है कि ये बच्चे मां-बाप पर भावनात्मक दबाव बनाने लगते हैं। मसलन- 'मेरी क्लास के सारे बच्चे पढऩे के लिए विदेश जा रहे हैं, आप मुझे बाहर क्यों नहीं भेज सकते हैं?'
 
अमेरिकी, ब्रिटिश एवं ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालयों को भी भारतीय छात्र पसंद हैं। दरअसल ये छात्र उनके अपने देशों के छात्रों की तुलना में दोगुने से लेकर पांच गुना तक फीस देने को तैयार होते हैं। शीर्ष विश्वविद्यालयों में ऐसे छात्रों का अनुपात करीब 10 फीसदी तक होता है। पढ़ाई के लिए विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की बड़ी संख्या कारोबारी परिवारों से ताल्लुक रखती है और वे वापस लौटकर अपना पारिवारिक व्यवसाय संभाल लेते हैं। बहुत अच्छी आर्थिक स्थिति नहीं रखने वाले माता-पिता को भी ऐसा लगता है कि अगर वे कर्ज लेकर अपने बच्चों को पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों में पढ़ा देते हैं तो वहां के पुराने छात्रों के नेटवर्क की मदद से उन्हें भारत में काम कर रहे अमेरिकी एवं ब्रिटिश बैंकों या निजी इक्विटी फंडों में नौकरी मिल सकती है। ये ऐसे उद्योग हैं जिनमें भर्ती का मुख्य जरिया 'ओल्ड बॉयज नेटवर्क' ही होता है। 
 
लेकिन क्या ये मुद्दे भारत की सही प्राथमिकता हैं या इन्हें प्राथमिकता होना चाहिए? 
 
भारत समेत दुनिया भर में रोजगार पाने की क्षमता तय करने वाले कारक सूचना युग के प्रसार के साथ ही बुनियादी तौर पर बदल चुके हैं। अब यह केवल अंग्रेजी बोलने जैसे संप्रेषण कौशल और क्लर्क जैसे पुनरावृत्ति-परक कामों को अंजाम देने की सम्मति से निर्धारित नहीं हो रहा है। आज के समय में रोजगार हासिल करने की नई कुंजी डिजिटल विश्लेषण एवं क्रियान्वयन दक्षता होगी। इन दक्षताओं का बुनियादी स्वरूप बॉट्स एवं रोबोट पर निगरानी का व्यावसायिक कार्य का होगा। वहीं जटिल कार्यों के लिए मशीन लर्निंग, क्रिप्टोग्राफी, नेटवर्क साइंस एवं बायोइन्फॉर्मेटिक्स जैसे कौशल की जरूरत होगी। ऐसी दक्षता की जरूरत इंजीनियरिंग एवं प्रबंधन के छात्रों को होगी बल्कि बी-कॉम, चार्टर्ड अकाउंटेंट और पत्रकारिता के छात्रों के लिए भी ये जरूरी होगा।
 
लेकिन ऐसी नौकरियां हर साल भारतीय विश्वविद्यालय से स्नातक करने वाले 60 लाख छात्रों में से 10 फीसदी की भी जरूरत नहीं पूरी कर पाएंगे। इन स्नातकों की बड़ी संख्या को आजीविका के साधन के तौर पर उद्यमशीलता अपनाने को मजबूर किया जा रहा है। लेकिन फिलहाल पूंजी उपलब्धता केवल कारोबारी घरानों के बच्चों तक ही सीमित होने के चलते भारत में उद्यमी बनना भी आसान नहीं है। भारत में वेंचर कैपिटल एवं निजी इक्विटी उद्योग मौजूदा समय में निष्क्रिय हालत में है क्योंकि इनका असल कारोबारी मॉडल पिछले दरवाजे से विदेशी कंपनियों को भारतीय बाजार में प्रवेश दिलाना ही है। 
 
उद्यमशीलता को बढ़ावा देने की कुंजी यह है कि करीब 10 लाख वेंचर निवेशकों का घरेलू इंडिया ऐंजल निवेश समुदाय बनाया जाए। इसके लिए भारतीय ऐंजल निवेशक को सीमित दायित्व भागीदारी में होने वाली शुरुआती वित्तीय क्षति को अलग करने की व्यवस्था करनी होगी। आयकर अधिनियम की धारा 10 में संशोधन कर अन्य स्रोतों से होने वाली आय के बरक्स निवेशक को यह छूट दी जा सकती है। इस काम को संपन्न कराने और अपनी अगली पीढ़ी को बचाने की इस मुहिम में आप भी आवाज बुलंद करें। 
Keyword: education, india, university, ranking,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या दूरसंचार क्षेत्र को राहत देने के उपाय करे सरकार?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.