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अहम फैसले देते वक्त पिछली गलतियों से बचे सर्वोच्च अदालत

एम जे एंटनी /  October 17, 2019

यह सवाल अंतहीन बहस का मुद्दा है कि क्या न्याय की चक्की को धीरे-धीरे और सुचारु रूप से चलना चाहिए या इसका मकसद तेजी से फैसला देने का होना चाहिए। जब ब्रिटेन के उच्चतम न्यायालय ने पिछले महीने तीन दिन की सुनवाई के बाद प्रधानमंत्री के खिलाफ 20 पृष्ठ का फैसला दिया था, तो कुछ लोगों ने इसे हमारी अदालतों के लिए नजीर माना था जहां लोगों को न्याय पाने के लिए दशकों लग जाते हैं। हालांकि ब्रिटेन की अदालत के सामने तुलनात्मक रूप से सरल मसला था लेकिन इसका राजनीतिक प्रभाव बहुत व्यापक था। हमारे उच्चतम न्यायालय के सामने कई अपील और रिट याचिकाएं हैं जिनमें इतिहास, पुरातत्व, धर्म, राजनीति, आठ भाषाओं में 20,000 पृष्ठ के दस्तावेज और 8,000 पृष्ठों का उच्च न्यायालय का फैसला है। यदि मुख्य न्यायाधीश ने समयसीमा निर्धारित नहीं की होती तो अयोध्या मामले की सुनवाई इस सप्ताह पूरी नहीं होती। 

अमूमन न्यायाधीश जिरह खत्म करने के लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं करते हैं। सामान्य मामलों में सुनवाई पूरी होने में कई हफ्ते लग जाते हैं। सुनवाई में तेजी दुर्लभ है और अगर किसी एक न्यायाधीश को सेवानिवृत्त होना हो तो इससे न्यायिक व्यवधान का खतरा रहता है। अयोध्या मामले में यह उन कारकों में शामिल था जो मुख्य न्यायाधीश की अगुआई वाले पांच न्यायाधीशों के पीठ के समक्ष थे। वह 17 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं और सुनवाई में तेजी के लिए इसे सबसे अहम कारण माना जा रहा है। 

वकीलों का एक वर्ग मानता है कि सेवानिवृत्त होने जा रहे न्यायाधीशों को बड़े मामलों पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए। ऐसे मामलों की सुनवाई ऐसे न्यायाधीशों को करनी चाहिए जिनके पास सभी पक्षों की दलीलें सुनने, सम्मेलन करने, टिप्पणियों का आदानप्रदान करने और अंतिम फैसला देने के लिए पर्याप्त समय हो। पिछले मामलों में यह देखने में आया है कि अगर पीठ का कोई एक सदस्य सेवानिवृत्त होने वाला हो तो इससे पीठ के तालमेल में व्यवधान पैदा होता है। ऐतिहासिक माने जाने वाले केशवानंद भारती मामले में स्पष्टï तौर पर ऐसा हुआ था। सेवानिवृत्त होने जा रहे तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश और पीठ में शामिल 12 अन्य न्यायाधीशों ने 11 अलग-अलग फैसले दिए। मुख्य न्यायाधीश के सेवानिवृत्त होने से एक दिन पहले आया यह फैसला 800 पृष्ठ का था। पीठ के एक सदस्य की शिकायत थी कि चूंकि मुख्य न्यायाधीश सेवानिवृत्त होने वाले थे, इसलिए सदस्यों के बीच मामले से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करने का समय नहीं था। दिवंगत न्यायाधीश वाईवी चंद्रचूड ने अपने अलग फैसले में लिखा कि इस वजह से न्यायाधीशों के बीच पूरी चर्चा नहीं हो सकी। 

कई अन्य मामलों में इस अप्रिय परिदृश्य की पुनरावृत्ति हुई। संविधान के बुनियादी ढांचे से जुड़े एक और ऐतिहासिक मामले मिनर्वा मिल्स वाद में दिवंगत न्यायाधीश पी एन भगवती ने इस मुद्दे पर एक लंबा अंश लिखा। उनका कहना था कि एक न्यायाधीश जल्द सेवानिवृत्त होने जा रहे थे जिसके कारण संविधान पीठ के पास सभी मुद्दों पर विचार करने के लिए पर्याप्त समय नहीं था। उन्होंने 'न्यायिक सामूहिकता' की जरूरत पर जोर दिया। ओडिशा की पूर्व मुख्यमंत्री नंदिनी सत्पथी से जुड़े व्यक्तिगत आजादी के एक और प्रसिद्घ मामले में फैसला जल्दबाजी में शनिवार को सुनाया गया जबकि उस दिन अदालत की छुट्टी होती है। पूरा फैसला अगले मंगलवार को उपलब्ध हो पाया था। एक न्यायाधीश ने लिखा कि उसे फैसले सुनाए जाने से एक दिन पहले ही दोपहर को अपने साथी न्यायाधीश से मसौदा मिला था। साथ ही मुख्य न्यायाधीश के सेवानिवृत्त होने में कुछ ही घंटे थे। न्यायाधीश ने लिखा, 'मेरे पास विस्तृत फैसला लिखने के लिए समय नहीं है।' बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा से जुड़े एक मामले में उसी न्यायाधीश ने इसी तरह की टिप्पणी की थी। 

अगर न्यायाधीशों के पास एकदूसरे से मंत्रणा करने और छोटे फैसले लिखने के लिए पर्याप्त समय है तो इस तरह के नुकसान से बचा जा सकता है। दिवंगत कानूनविद एनए पालकीवाला ने एक बार कहा था कि न्यायाधीशों को इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि इंसान की जिंदगी छोटी होती है। मुख्य न्यायाधीश ने हाल में अदालत के फैसलों को राष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद करने से जुड़ी परियोजना की शुरुआत करते हुए कहा था कि लोगों को फैसलों को पढऩा और समझना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि दुष्प्रचार और मुद्दों के राजनीतिकरण के इस दौर में किसी विचार का सही संचार ज्यादा जरूरी है। न्यायाधीशों को लंबे चौड़े फैसलों के साथ उनका एक सारांश भी देना चाहिए। केशवानंद और मिनर्वा मिल्स मामलों में ऐसा किया गया था। अयोध्या मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों ने अपने फैसलों में सारांश दिया था। 

आने वाले महीनों में निर्णयों का सही अर्थ समझने की अहमियत पर ज्यादा जोर नहीं दिया जा सकता है। लोगों को अयोध्या मामले के फैसले को समझना ही होगा। संविधान के अनुच्छेद 370 को खत्म करने के मामले में भी न्यायालय का फैसला लोगों की समझ में आना चाहिए। लंबी सुनवाई के बाद अनिर्दिष्टï फैसलों से अनिश्चितता बढ़ेगी जैसा कि आरक्षण, भूमि अधिग्रहण और सबरीमला के मामलों में हो रहा है। सैकड़ों पृष्ठ के न्यायिक विवेक के बावजूद ये मामले अभी तक नहीं सुलझ पाए हैं। इसमें स्पष्टïीकरण आवेदन, पुनर्विचार याचिकाएं और उपचारात्मक याचिकाएं आएंगी और शायद सड़कों पर प्रदर्शन भी हो सकते हैं। अंत में न्यायाधीशों को अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के अपने समकक्षों की तरह यह स्वीकारोक्ति करनी पड़ेगी कि 'हमारी बात इसलिए अंतिम नहीं हैं क्योंकि हम गलती नहीं करते हैं मगर हम गलती इसीलिए नहीं करते हैं क्योंकि हमारी बात अंतिम हैं।'

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