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पीएमसी संकट के हल में छिपा अवसर

देवाशिष बसु /  October 17, 2019

तीन हफ्ते पहले पंजाब ऐंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक (पीएमसी बैंक) अचानक धराशायी हो गया। बैंक के तीन लाख से अधिक खाताधारकों ने करीब 11,500 करोड़ रुपये उसमें जमा कर रखे थे। उसने दिवालिया हो चुके रियल एस्टेट समूह एचडीआईएल को 6,500 करोड़ रुपये से अधिक कर्ज दिया हुआ था। खास बात यह है कि पीएमसी बैंक पर एचडीआईएल ही समान निदेशकों एवं शेयरधारिता के जरिये चोरी-छिपे नियंत्रण कर रहा था। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंक से जमा राशि निकालने पर पाबंदियां लगा दी हैं। ऐसे में जमाकर्ताओं का गुस्सा एवं मायूसी बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया पर वित्त मंत्री की असंवेदनशीलता को लेकर टिप्पणियों की भरमार है। वित्त मंत्री ने जिंदगी भर की बचत स्वाहा हो जाने की हृदयविदारक घटनाओं पर दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि सहकारी बैंक वित्त मंत्रालय के नियंत्रण में नहीं आते हैं।

महाराष्ट्र में आसन्न विधानसभा चुनावों के बीच मुख्यमंत्री ने यह आश्वासन दिया है कि वह एक महीने में इस मसले का समाधान निकाल लेंगे। आरबीआई गवर्नर ने असाधारण दावा किया है कि वह किसी भी सहकारी बैंक को डूबने नहीं देगा जबकि पुराने आंकड़े बताते हैं कि हरेक कुछ महीनों पर एक सहकारी बैंक दिवालिया होता है और ऐसे बैंकों की संख्या 1,000 से भी अधिक है। हम सहकारी बैंकों की समस्या दूर करने के लिए एक भी समझदार कदम नहीं उठाया है क्योंकि हमारे पास ऐसे संकट से निपटने का कोई सांचा ही नहीं है। इस लेख में पीएमसी बैंक संकट के समाधान एवं भविष्य में ऐसा संकट पैदा होने से रोकने के लिए जरूरी कदमों के बारे में कुछ विचार रखे गए हैं। इसके लिए वित्त मंत्रालय एवं आरबीआई को तीव्र कार्रवाई करने और कुछ नियमों में बदलाव करने की जरूरत पड़ेगी। यह सरकार तो जब चाहे, नियम बदल सकती है।

तात्कालिक कदम

किसी भी वित्तीय संकट में पहला काम यह होता है कि चल एवं अचल संपत्तियों का मूल्य बचाए रखने के लिए जल्दी से कदम उठाए जाएं। इसके लिए हमें नियमों के एक समूह की जरूरत है या फिर सत्यम और आईएलऐंडएफएस मामलों की तरह जरूरत पडऩे पर हम नए नियम भी बना सकते हैं। पीएमसी बैंक संकट सामने आने के बाद तीन हफ्ते बीत चुके हैं और अभी तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है। यह चौंकानी वाली बात नहीं है क्योंकि नेताओं एवं बाबुओं का कुछ भी दांव पर नहीं होता है लिहाजा वे परिसंपत्ति मूल्य को बचाए रखने पर ध्यान नहीं देते हैं। 

दुर्भाग्य से कुछ व्यावहारिक दिक्कतें भी हैं। आप यह गौर करेंगे कि जब भी संकट आता है तो राजस्व विभाग, प्रवर्तन निदेशालय, आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ और गंभीर धोखाधड़ी कार्यालय जैसी तमाम एजेंसियां सक्रिय हो जाती हैं। इनमें से कुछ एजेंसियां परिसंपत्तियों को जब्त करना शुरू कर देती हैं। नेता संपत्तियों की जब्ती एवं कुर्की की खबरें मीडिया में देखना पसंद करते हैं लेकिन ऐसे कदम जमाकर्ताओं एवं ऋणदाताओं के हितों के खिलाफ है। किसी भी समाधान का फायदा इन्हीं दो समूहों को होता है। आरबीआई या वित्त मंत्रालय को फौरन एक पैनल बनाना चाहिए जिसकी मियाद सीमित हो। इस पैनल को यह दायित्व एवं शक्ति दी जाए कि वह पीएमसी बैंक की परिसंपत्तियों और एचडीआईएल के प्रवर्तकों एवं पीएमसी बैंक के प्रमुख की निजी संपत्तियों को एक एस्क्रो खाते में रख दे और राजस्व विभागों एवं कर्जदाताओं के तदर्थ कदमों से उसे सुरक्षित रखे। आईएलऐंडएफएस मामले में ऐसा ही किया गया था। 

सबसे अहम सवाल यह है कि इस पैनल का अगुआ किसे बनाया जाए? यह जिम्मेदारी किसी सामान्य नौकरशाह या बैंकर को दी जाती है तो यह एक निरर्थक कवायद ही साबित होगी। सत्यम घोटाले के सामने आने के बाद समाधान निकालने का काम दीपक पारेख की निगरानी में किया गया था। वहीं आईएलऐंडएफएस को संकट से बाहर निकालने का काम उदय कोटक की देखरेख में चल रहा है। पीएमसी बैंक के लिए बनने वाले पैनल का नेतृत्व दीपक पारेख या एचडीएफसी बैंक के आदित्य पुरी को सौंपा जा सकता है। दोनों ही सख्त एवं व्यावहारिक बैंकर हैं और उन्हें वित्त एवं रियल एस्टेट दोनों क्षेत्रों की समझ है। अचल संपत्तियों को कब्जे में लेने के अलावा पैनल को इसकी मुख्य परिसंपत्ति- बेहद सुचारू ढंग से संचालित शाखाओं एवं जमाकर्ता आधार की बढिय़ा कीमत निकालने पर ध्यान देना होगा। मुंबई में खास मौजूदगी नहीं रखने वाले किसी भी बैंक के लिए यह आकर्षण का विषय होगा। लेकिन बैंकिंग लाइसेंस पाने की इच्छा रखने वाली एक चुस्त-दुरुस्त एवं पूंजी से लैस वित्त कंपनी के लिए यह बेहद कीमती होगा। जहां इससे जमा आधार का बड़ा हिस्सा मिलेगा वहीं अभाव की भरपाई सरकार की तरफ से होगी। जब सहकारी बैंकों की नाकामियों के लिए वित्त मंत्रालय, राज्य सरकार और आरबीआई सम्मिलित रूप से जिम्मेदार हैं तब बैंक जमाकर्ताओं के किसी भी तरह का घाटा उठाने का कोई कारण नहीं है। दशकों से कमजोर नियामकीय व्यवस्था होने और विभिन्न सुझावों पर कदम नहीं उठाने से ये बैंक नाकाम साबित होते रहे हैं। पीएमसी बैंक के जमाकर्ताओं को सरकार की दरियादिली की कहीं अधिक जरूरत है। केंद्र सरकार के कर्मचारियों का महंगाई भत्ता गत दिनों ही पांच फीसदी बढ़ाने का फैसला लिया गया है। 

संकट के बाद

नियामकों को पता है कि सहकारी बैंकों में फैली अव्यवस्था दूर करने के लिए क्या किए जाने की जरूरत है? गत दो दशकों में तमाम सरकारी समितियों एवं कार्यबलों का गठन शहरी सहकारी बैंकों का कामकाज सुधारने के लिए किया गया है। माधव दास समिति (1978), मराठे समिति (1991), माधव राव समिति (1999), मालेगाम समिति (2010) और आर गांधी समिति (2015) इसके लिए ही बनी थीं। इसी तरह वर्ष 2006 में पूंजी परिवद्र्धन और वर्ष 2008 में शहरी सहकारी बैंकों के लिए एक छाता संगठन बनाने पर कार्य समूह बनाए जा चुके हैं। इसके बावजूद शहरी सहकारी बैंकों के नाकाम होते रहने की वजह यह है कि हर बार हम तात्कालिक उपचार करने की कोशिश कर रहे थे। इसके अलावा अधिकांश विवेकपूर्ण सुझावों को नजरअंदाज किया जाता रहा है।

यहां पर एक सरल सिद्धांत लागू करने की जरूरत है: जमा लेने वाले सभी संगठनों को आरबीआई की एकल निगरानी में लाया जाना चाहिए। पूरी तरह बेअसर रहे सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार का जमा लेने वाले संगठनों पर नियमन के साथ कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। इसमें खुद को बैंक कहने वाले वित्तीय संस्थान भी शामिल हैं। शहरी सहकारी बैंकों को छोटे बैंकों में तब्दील होने या अन्य छोटे बैंकों के साथ विलय और शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया में हमें सहकारी बैंकों एवं छोटे बैंकों के बीच स्वतंत्र एवं सरल विलय की जरूरत है। एक कहावत है, कभी भी संकट को व्यर्थ न जाने दो। पीएमसी बैंक का मामला न केवल सहकारी बैंकों की अव्यवस्था को हमेशा के लिए खत्म कर देने का बड़ा मौका है बल्कि आईएलऐंडएफएस के साथ मिलकर यह भविष्य में डूबते वित्तीय संस्थानों को उबारने का एक सांचा भी खड़ा करता है।

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