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सार्वजनिक क्षेत्र के मामले में मोदी सरकार का तरीका समस्यापरक

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  October 15, 2019

नरेंद्र मोदी सरकार के अपने प्रशासकीय नियंत्रण वाली सार्वजनिक इकाइयों के साथ कार्य-व्यवहार के कई स्तर हैं। मसलन, भारतीय रेल समेत करीब 250 केंद्रीय सार्वजनिक संगठनों में इक्विटी डालने का इसका फैसला। मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के पहले पांच वर्षों में इन उपक्रमों में इक्विटी के तौर पर करीब 6.26 लाख करोड़ रुपये डाले। यह राशि मनमोहन सिंह सरकार के समय 2009-10 से लेकर 2013-14 के दौरान सार्वजनिक इकाइयों में डाली गई इक्विटी का करीब तिगुनी थी। लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र में डाली गई इक्विटी की संरचना पर करीबी नजर डालें तो थोड़ी अलग तस्वीर उभरकर सामने आती है। मोदी के पहले कार्यकाल में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की पूंजी कुल इक्विटी निवेश का करीब 40 फीसदी है। इसमें भारतीय रेल की हिस्सेदारी 33 फीसदी, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की हिस्सेदारी 18 फीसदी और एयर इंडिया की हिस्सेदारी तीन फीसदी है। इस तरह सार्वजनिक क्षेत्र की चार इकाइयों का कुल हिस्सा पांच वर्षों में किए गए कुल इक्विटी निवेश का 94 फीसदी रहा है।

 
दूसरे शब्दों में, करीब 250 सार्वजनिक संगठनों में से केवल चार में ही इतनी इक्विटी डाल दी गई कि बाकी सार्वजनिक इकाइयों में पांच साल के भीतर केवल छह फीसदी राशि यानी 34,931 करोड़ रुपये ही डाले जा सके। लिहाजा अगर आप यह सोच रहे थे कि मोदी सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के सभी संगठनों को इक्विटी आवंटन में सदाशयता दिखाई तो इस पर दोबारा गौर करें। उसने सार्वजनिक क्षेत्र की समूची इक्विटी का 94 फीसदी हिस्सा केवल चार इकाइयों में ही बांट दिया। मनमोहन सरकार इक्विटी आवंटन के मामले थोड़ी अधिक लोकतांत्रिक थी। उसने 2009-14 के दौरान सार्वजनिक संगठनों के लिए जो 2.34 लाख करोड़ रुपये का इक्विटी आवंटन किया था उसमें से 45 फीसदी भारतीय रेलवे, 20 फीसदी एनएचएआई, 19 फीसदी सार्वजनिक बैंकों और छह फीसदी एयर इंडिया को दिया गया था। इस तरह इन चार संगठनों के खाते में कुल इक्विटी आवंटन का 90 फीसदी हिस्सा आया था और बाकी 10 फीसदी इक्विटी अन्य सार्वजनिक संगठनों के लिए था। इस संदर्भ में पिछले हफ्ते घटित दो घटनाओं पर खास ध्यान देने की जरूरत है। 
 
पहला, सरकार दो खस्ताहाल संचार कंपनियों- बीएसएनएल एवं एमटीएनएल को मुश्किल से उबारने के लिए दूरसंचार मंत्रालय की तरफ से पेश प्रस्ताव पर फिर से सोचने की मुद्रा में दिख रही है। राहत पैकेज पर पुनर्विचार का जाहिर कारण तो इसकी ऊंची लागत ही लग रही है जिस पर 74,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च आने का अनुमान है। इस तरह की समीक्षा समझी जा सकती है। दोनों उपक्रमों के कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वीआरएस) के जरिये मुआवजा पैकेज देने के बाद उन्हें बंद करने के सुझाव पर गौर किया जा सकता है। और इन दोनों को बंद करने पर आने वाली लागत अपेक्षाकृत सस्ती पड़ेगी क्योंकि बहुतेरे कर्मचारी सीधी भर्तियों के जरिये इनका हिस्सा नहीं हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, कुल कर्मचारियों के महज 10 फीसदी ही सीधी भर्ती के जरिये रखे गए हैं जिनमें बड़ी संख्या तकनीकी पदों की है। इन लोगों को वीआरएस देने पर बहुत लागत नहीं आएगी। बाकी कर्मचारी या तो भारतीय दूरसंचार सेवा (आईटीएस) के हैं या अन्य सार्वजनिक उपक्रमों से प्रतिनियुक्ति पर तैनात हैं।
 
लिहाजा जाहिर सवाल यह है कि सरकार ने अपने दो संचार संगठनों को आईटीएस एवं अन्य सार्वजनिक उपक्रमों से ऐसे स्टाफ का बोझ बढ़ाने की अनुमति क्यों दी? इन दोनों संगठनों को आईटीएस संवर्ग या अन्य सरकारी उपक्रमों के अतिरिक्त स्टाफ के लिए पार्किंग स्थल नहीं बनाया जाना चाहिए। उनके कुल राजस्व का तीन-चौथाई हिस्सा कर्मचारियों के वेतन पर ही खर्च हो जाता है। ऐसे में पहला कदम यही होगा कि इन संचार संगठनों को इस बोझ से कैसे आजादी दिलाई जाए और उन्हें न्यूनतम स्टाफ के साथ कारगर ढंग से चलाया जा सके। दोनों संगठनों का एक व्यवहार्य कारोबार एवं ग्राहक आधार है जो किसी भी विरोधी संचार कंपनी के लिए ईष्र्या का विषय हो सकती है। आगे का रास्ता यही होगा कि इन कंपनियों को ऐसे भारी वेतन बिल के बोझ से निजात दिलाकर उनके कारोबार को एक नई इकाई को सौंप दिया जाए। इस नई इकाई को सार्वजनिक- निजी भागीदारी में गठित करना चाहिए और एक समयबद्ध योजना के तहत सरकार को इस कारोबार से पूरी तरह निकल जाना चाहिए।
 
पिछले हफ्ते की दूसरी घटना सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) से संबंधित है। सरकार की तरफ से खाद्यान्न की खरीद करने का जिम्मा एफसीआई के पास ही होता है। अपनी अक्षमता एवं जरूरत से ज्यादा कर्मचारी होने के साथ ही सरकार की तरफ से किए जाने वाले बिल भुगतान में देरी भी इसकी समस्या की वजह है। एफसीआई पर भारी कर्ज का बोझ है, उसने बाजार के अलावा राष्ट्रीय लघु बचत कोष जैसी संस्थाओं से भी उधार लिया हुआ है। इसकी वित्तीय मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं क्योंकि सरकार उसके बकाये का भी भुगतान नहीं कर रही है। बीएसएनएल, एमटीएनएल और एफसीआई जैसे संगठनों की वित्तीय परेशानियां सार्वजनिक क्षेत्र के संगठनों के प्रति मोदी सरकार के रवैये को दर्शाती हैं। यह प्रवृत्ति इन संगठनों की वित्तीय सेहत के लिए समस्यापरक होने के साथ नुकसानदायक भी है। 
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