बिजनेस स्टैंडर्ड - चीन का उत्थान और उसकी चुनौतियां
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चीन का उत्थान और उसकी चुनौतियां

हर्ष वी पंत /  October 15, 2019

राजनीतिक वैधता के लिए उच्च आर्थिक वृद्धि दर पर निर्भर शासन  व्यवस्था के लिए मौजूदा आर्थिक सुस्ती बड़ी समस्या बनकर उभरी है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं हर्ष वी पंत

 
चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के शासन के 70 वर्ष पूरे होने का जश्न पूरे शानो-शौकत से मनाया गया। इस मौके पर सैन्य टुकडिय़ों एवं हथियारों की परेड के साथ चीन ने अपनी बढ़ती ताकत का प्रदर्शन किया। हाइपरसोनिक ड्रोन एवं अंतर-महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें भी प्रदर्शित की गईं। चीन के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, इस परेड में 15,000 सैन्य जवानों के साथ 580 सैन्य उपकरणों एवं 160 विमानों ने हिस्सा लिया। चीन में साम्यवादी शासन के संस्थापक माओत्से तुंग की तरह ताकतवर एवं प्रभावी स्थान हासिल कर चुके चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने इस मौके पर ऐसा भाषण दिया जो आंतरिक के साथ-साथ विश्व समुदाय को भी संबोधित था। माओ ने 1 अक्टूबर, 1949 को जहां से चीनी जनवादी गणराज्य की स्थापना की घोषणा की थी, वहीं पर खड़े होकर शी ने कहा, 'इस महान राष्ट्र का रुतबा डिगाने की ताकत किसी के भी पास नहीं है। कोई भी ताकत चीनी अवाम एवं राष्ट्र को आगे बढऩे से नहीं रोक सकती है।'
 
वैसे माओ की विरासत अब भी विवाद का विषय है क्योंकि सत्ता पर कब्जा करने के उनके 'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' अभियान के दौरान लाखों लोग मारे गए थे। इसके अलावा समूचा चीन कई वर्षों तक चली सांस्कृतिक क्रांति के दौरान हिंसा की चपेट में रहा था। माओ के 1976 में निधन के बाद शासन की बागडोर संभालने वाले तंग श्याओ फिंग ने आर्थिक सुधारों का सिलसिला शुरू किया था जिसे आज के समय में वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के रूप में चीन के  नाटकीय उदय के लिए श्रेय दिया जाता है। गत चार दशकों में चीन ने व्यापक बाजार सुधार किए हैं जिसके फलस्वरूप उसकी अर्थव्यवस्था के दरवाजे बाकी दुनिया के लिए खुल गए और करोड़ों लोग गरीबी के दलदल से बाहर आ सके। बड़ी चुनौतियों के बीच एक राष्ट्र के उदय की यह उल्लेखनीय कहानी बताती है कि दुनिया के निर्धनतम देशों में शुमार देश आज वैश्विक आर्थिक एजेंडा तय करने की हैसियत में आ खड़ा हुआ है। 
 
चीन ने आज अपने वैश्विक आर्थिक विकास के अगले चरण पर ध्यान केंद्रित किया हुआ है। इसके लिए उसने 'बेल्ट एवं सड़क पहल' के रूप में वैश्विक ढांचा एवं संपर्क का महत्त्वाकांक्षी नजरिया दुनिया के समक्ष रखा है। इस पहल को लेकर गहरा विवाद बना हुआ है और इसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इसने संपर्क के मुद्दे पर वैश्विक विमर्श को ही बदलकर रख दिया है। इसके चलते बड़ी शक्तियों को भी अपना वैकल्पिक प्रस्ताव लाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
 
पिछले कुछ वर्षों में सत्ता पर अपना दबदबा कायम करने के बाद शी ने पुराने वैभव को बहाल करने के 'चीनी स्वप्न' को पुनर्जीवित करने की जरूरत पर लगातार जोर दिया है। शी के कार्यकाल में चीन ने अपने अभ्युदय की घोषणा से जुड़ा संकोच त्याग दिया है और अपनी वैश्विक हैसियत को लेकर उसका दावा साफ नजर आता है। एक समृद्ध एवं सशक्त देश के तौर पर चीन के विकास में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका रेखांकित करना भी जरूरी है। आखिर, यह दल ही चीन की मौजूदा सत्ता के वजूद का कारण है। और अभी तक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी राष्ट्रीय मामलों को संभालने में काफी सफल रही है और साम्यवादी शासन के मामले में यह सोवियत संघ से अधिक पुरानी हो चुका है। 
 
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी यह उम्मीद कर रही होगी कि सत्ता की 70वीं वर्षगांठ के समारोह ऐसे समय में उसकी पकड़ मजबूत करेंगे, उसकी वैधता पुख्ता होगी और लोकप्रिय समर्थन बढ़ेगा जब चीन को आर्थिक एवं राजनीतिक दोनों मोर्चों पर तमाम चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ट्रंप प्रशासन ने वैश्विक व्यवस्था में चीन को समाहित करने को लेकर वॉशिंगटन में बनी दशकों पुरानी राजनीतिक सहमति त्याग दी है। अब यह विभिन्न स्तरों पर चीन के साथ तनातनी की मुद्रा में है। सबसे बड़ी समस्या कारोबार के क्षेत्र में है जहां दुनिया के दो सर्वाधिक ताकतवर देशों के बीच व्यापार युद्ध जोर पकड़ता जा रहा है। इससे चीन की अर्थव्यवस्था को भी चोट पहुंची है और उसकी वृद्धि दर में गिरावट आई है। अपनी राजनीतिक वैधता के लिए जनता को उच्च आर्थिक वृद्धि देने पर लंबे समय से निर्भर राजनीतिक व्यवस्था के लिए यह एक बड़ी समस्या है। 
 
रणनीतिक स्तर पर चीन को विस्तारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अब तगड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। इस क्षेत्र में क्षेत्रीय शक्तियां चीन के आक्रामक तेवरों का मुकाबला करने के लिए नए गठबंधन बना रही हैं। एक जैसी सोच रखने वाले देश हिंद-प्रशांत में चीन के उभार को काबू में रखने के लिए एक नया सुरक्षा ढांचा खड़ा करना जरूरी मान रहे हैं। भले ही एक औपचारिक व्यवस्था के आकार लेने में वक्त लगेगा लेकिन अनौपचारिक गठबंधन तेजी से बढ़ रहे हैं और आज मुद्दा-आधारित गठबंधन सामान्य हो चुके हैं। यह साफ है कि चीन के हठधर्मी रवैये को चुनौती का सामना करना होगा।
 
शायद चीन के लिए सबसे अहम अपने केंद्रीय हितों से जुड़ी वे समस्याएं हैं जिन्हें संभाल पाना भारी पड़ रहा है। शिनच्यांग क्षेत्र में उइगर अल्पसंख्यकों के साथ चीनी सत्ता का बरताव दुनिया भर में आलोचना का मुद्दा बन रहा है। पड़ोसी ताइवान में भी चीन की मंशा को लेकर अविश्वास बढ़ रहा है और वहां पर चीन-विरोधी राजनीतिक नेतृत्व को समर्थन बढ़ता जा रहा है। उधर हॉन्ग कॉन्ग में चीन को थ्येन आन मन संहार के बाद पहली बार ऐसे संकट का सामना करना पड़ रहा है। शी ने अपने संबोधन में हॉन्ग कॉन्ग की दीर्घकालिक समृद्धि एवं स्थायित्व बनाए रखने का वादा करते हुए कहा कि इस व्यापारिक शहर को आंशिक स्वायत्तता देने वाला 'एक देश, दो व्यवस्था' का राजनीतिक ढांचा बना रहेगा। चीनी सत्ता को अब तक यह साफ हो चुका होगा कि शी की यह प्रतिबद्धता अब हॉन्ग कॉन्ग में कारगर नहीं रह गई है। विवादास्पद प्रत्यर्पण विधेयक को लेकर हॉन्ग कॉन्ग में शुरू हुए सत्ता-विरोधी प्रदर्शन कहीं बड़ा दायरा बना चुके हैं। और चीन के साथ भावी प्रावधान तय करने में अब इस गुस्से की केंद्रीय भूमिका होगी। जब चीन अपनी साम्यवादी सत्ता की वर्षगांठ मना रहा था तो हॉन्ग कॉन्ग में पुलिस गोलीबारी में एक किशोर की मौत के बाद हालात बदतर हो गए।
 
चीन जहां अपने राजनीतिक विकास में हासिल बड़े मुकाम का जश्न मना रहा है वहीं उसके नेतृत्व को घरेलू एवं वैश्विक स्तर पर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदले हालात का सामना करना पड़ रहा है। चीन के उदय की भावी राह इसी बात से तय होगी कि इन चुनौतियों का सामना कितनी बखूबी से किया जाएगा?
 
(लेखक किंग्स कॉलेज लंदन के रक्षा अध्ययन विभाग में प्रोफेसर हैं)
Keyword: india, china, narendra modi, xi jinping, tamilnadu, economy,,
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