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थर्मोइलेक्ट्रिक जेनरेटर दूर कर सकते हैं ऊर्जा का गतिरोध

तकनीकी तंत्र
देवांग्शु दत्ता /  October 14, 2019

सौर ऊर्जा हरित आंदोलन के आधारस्तंभों में से एक है। जहां सौर उपकरण विनिर्माता पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं, वहीं इसने जीवाश्म ईंधनों की जरूरत कम कर दी है। लेकिन सौर ऊर्जा की एक बड़ी खामी भी है। उसमें निरंतरता की कमी है। रात के समय पडऩे वाले गतिरोध के अलावा ध्रुवों के नजदीक ऐसे इलाके भी हैं जहां कई महीनों तक सूर्य दिखता ही नहीं है। इसका मतलब है कि वहां अन्य ऊर्जा स्रोतों की भी जरूरत है। ऐसा ही एक वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत 200 वर्षों से प्रचलित परिघटना का दोहन कर सकती है। यह स्रोत थर्मोइलेक्ट्रिसिटी है यानी तापमान भिन्नता से पैदा होने वाली बिजली। कई तरह के प्रायोगिक थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटरों का प्रयोगशाला एवं वास्तविक हालात में परीक्षण किया जा रहा है। इटली के वैज्ञानिक अलेसांद्रो वोल्टा ने 1790 में पाया था कि ताप  भिन्नता होने पर विद्युत-धारा एक सर्किट के जरिये प्रवाहित होती है। इसके उलट अगर कोई विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है तो ताप भिन्नता की स्थिति पैदा होती है। थॉमस सीबेक और ज्यां-चाल्र्स पेटियर ने 1820 के दशक में इस धारणा को और परिष्कृत किया। 

 
लॉर्ड केल्विन ने भी 1850 के दशक में इस पर शोध कर प्रभावों को परिभाषित करने वाले अहम समीकरणों के बारे में बताया। किसी घर की भीतरी एवं बाहरी दीवारों के बीच भी प्राकृतिक रूप से ताप विभेद हो सकती है। इन प्राकृतिक ताप भिन्नताओं का चतुराई से प्रयोग कर थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटरों का निर्माण किया जा सकता है। स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के वेई ली की अगुआई वाली टीम ने यह कहा है कि उन्होंने किस तरह एक ऐसा जनरेटर बनाया जो एलईडी बल्बों को रोशन करने लायक बिजली पैदा कर लेता है। इस जनरेटर में दो एल्युमीनियम प्लेटें लगी हैं जिनमें से निचली प्लेट तत्त्वों के संपर्क में रहने के नाते आसपास की हवा के तापमान से प्रभावित होती है। वहीं ऊपरी प्लेट एक पारदर्शी आवरण में सीलबंद होती है जिससे होकर सौर विकिरण गुजरता है। ऊपरी प्लेट पर परत चढ़ाई जाती है ताकि वह हवा के संपर्क में आकर गर्म या ठंडी न हो जाए। रात में यह सीलबंद प्लेट तेजी से ठंडी हो जाती है क्योंकि यह उष्मा को इन्फ्रारेड में बिखेर देती है। इस दौरान निचली प्लेट आसपास की हवा के चलते गर्म होती रहती है। 
 
गत दिसंबर में कैलिफोर्निया में किए गए इस उपकरण के परीक्षण के दौरान तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की भिन्नता पाई गई थी। इतनी भिन्नता प्रति वर्ग मीटर प्लेट में 25 मिलीवाट बिजली पैदा करने के लिए काफी है। शोध टीम का मानना है कि बेहतर डिजाइन और अधिक चतुर उपयोग से पैदा होने वाली बिजली की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। करीब 500 मिलीवाट प्रति वर्ग मीटर बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा जा सकता है। वह बिजली भी सौर पैनलों से पैदा होने वाली बिजली से काफी कम होगी जो प्रति वर्ग मीटर इलाके में 100 वाट से भी अधिक बिजली पैदा करता है। हालांकि जगह के अभाव को कोई अवरोध न मानें तो ऐसे 'नाइट पैनल' सौर ऊर्जा से वंचित इलाकों में लगाए जा सकते हैं। यह शोधपत्र कहता है, रात में बिजली पैदा करने की क्षमता हासिल करने का मतलब यह है कि दूरदराज के मौसमी स्टेशनों में रोशनी करने एवं कम खपत वाले सेंसरों जैसे कई कामों में इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा। अगर इस डिजाइन को जमीन पर उतारा जा सकता है तो रात के समय की प्राकृतिक शीतलता का इस्तेमाल सलीके से हो सकेगा। 
 
हालांकि थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटरों को क्रियाशील बनाने और उन्हें वाणिज्यिक रूप से सक्षम बनाने के लिए कई इंजीनियरिंग चुनौतियों से पार पाना है। पहला, जनरेटर में इस्तेमाल सामग्री उच्च विद्युत चालक हो और आदर्श रूप में तापीय चालकता निम्न हो। उच्च विद्युत चालकता होने से धारा का प्रवाह आसान हो जाता है जबकि निम्न तापीय चालकता यह सुनिश्चित करती है कि ताप विभेद बहुत जल्द सामान्य न हो जाए। ऐसी अधिकांश सामग्री बहुत महंगी होती है। फिर भी स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के डिजाइन में एल्युमीनियम का इस्तेमाल कर समस्या दूर करने की कोशिश की गई है। नैनो-तकनीक भी विद्युत चालकता पर डाले बगैर सामान की तापीय चालकता कम करने का किफायती रास्ता बताने का वादा करती है। थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटरों के कुछ खास लाभ भी हैं। उसका कोई हिस्सा चलायमान नहीं होने से रखरखाव की भी कम जरूरत है। इसके अलावा उन्हें ईंधन या लुब्रिकेंट की भी जरूरत नहीं है। वे अवशिष्ट ऊष्मा को बिजली में तब्दील कर सकते हैं जो कारों एवं कई औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिए बड़ी बात है।
 
नासा एवं अन्य अंतरिक्ष एजेंसियां इनका खास तौर पर इस्तेमाल करती हैं। ये उपकरण अंतरिक्ष में भी काफी कारगर हैं जहां सीधी रोशनी और अंधेरे में रखी वस्तुओं के तापमान में बड़ा फर्क होता है। थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटरों के लिए वैश्विक बाजार वर्ष 2015 में महज 32 करोड़ डॉलर ही था लेकिन इसके 15 फीसदी की चक्रवृद्धि दर से बढऩे का दावा किया जा रहा है। इस वृद्धि के पीछे एक बड़ी वजह वाहन निर्माताओं से मांग में आई तेजी है। ऑटो कंपनियां इंजन से निकलने वाली गर्मी को बिजली में तब्दील करने के लिए इसका इस्तेमाल करने लगी हैं। शरीर में पहने जा सकने वाले उपकरण भी मददगार हो सकते हैं। यह संभव है कि शरीर की उष्मा का इस्तेमाल छोटे उपकरणों को चलाने में किया जाए। सोनी ने जेब के आकार के एयर कंडिशनर 'रेयॉन पॉकेट' को प्रदर्शित किया है। क्राउड-सोर्सिंग से तैयार इस जेबी एयर कंडिशनर को अगले साल उतारने की तैयारी है। यह 13 डिग्री सेल्सियस तक तापमान घटा और फिर 8 डिग्री तक बढ़ा सकता है। 
 
इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) की वजह से कम ऊर्जा वाले थर्मोइलेक्ट्रिक को रफ्तार मिल सकती है। आईओटी में अमूमन कम ऊर्जा वाले सेंसरों की जरूरत होती है और इसमें रखरखाव की भी कम जरूरत होती है। इसका भी बड़ा बाजार हो सकता है।
Keyword: power, electric, generator,,
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