बिजनेस स?टैंडर?ड - अभिजित को अर्थशास्त्र का नोबेल
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अभिजित को अर्थशास्त्र का नोबेल

मिहिर शर्मा / नई दिल्ली 10 14, 2019

सम्‍मान

शोध जिससे गरीबी मिटाने में मिली मदद
शुरुआती परीक्षणों में उन्होंने दिखाया कि ज्यादा किताबों और मुफ्त भोजन का थोड़ा असर हुआ था जबकि कमजोर छात्रों के लिए लक्षित मदद से उनकी पढ़ाई में उल्लेखनीय सुधार हुआ। इससे साबित होता है कि कमजोर छात्रों के लिए लक्षित मदद एक कारगर उपाय था।
नया दृष्टिकोण
इस साल नोबेल पुरस्कार जीतने वाले अर्थशास्त्रियों ने साबित किया है कि वैश्विक गरीबी को छोटे और ज्यादा सटीक सवालों के जरिये कैसे निपटा जा सकता है
परिणाम
सुधारात्मक शिक्षण के अध्ययन व्यापक पैमाने के सहायता कार्यक्रमों की हिमायत करता है जो अब तक 50 लाख से अधिक भारतीय बच्चों तक पहुंच चुका है। पेट के कीड़े मारने की दवा के मुफ्त वितरण के अध्ययनों से पता चलता है कि इससे न केवल स्कूली बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार आता है बल्कि इससे यह साबित भी होता है कि  माता-पिता दवा की कीमतों को लेकर कितने संवेदनशील होते हैं। इन नतीजों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 80 करोड़ से अधिक स्कूली बच्चों को पेट के कीड़े मारने की दवा मुफ्त वितरित करने की सिफारिश की है।

बिजनेस स?टैंडर?ड अभिजित को अर्थशास्त्र का नोबेलइस साल अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से तीन अर्थशास्त्रियों अभिजित बनर्जी, एस्थर डफ्लो और माइकल क्रेमर को दिया गया है। भारतीय मूल के बनर्जी और उनकी फ्रांसीसी-अमेरिकी पत्नी डफ्लोमैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में पढ़ाते हैं जबकि अमेरिका के क्रेमर हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अध्यापन करते हैं। ये दोनों परिसर मैसाच्युसेट्स के कैम्ब्रिज में स्थित हैं और उनके विकास अर्थशास्त्र कार्यक्रम अक्सर संसाधनों और छात्रों को साझा करते हैं। इस तिकड़ी को विकास अर्थशास्त्र को पुनर्जीवित करने में उनके योगदान के लिए यह पुरस्कार दिया गया है। उन्होंने खासकर रेंडमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल्स (आरसीटी) को लोकप्रिय बनाया जो अध्ययनों के परीक्षण के लिए नीतिगत हस्तक्षेप के बड़े सवालों को छोटे और आसान प्रश्नों में तोड़ता है। 

नोबेल समिति ने उनके योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि कैसे उनके प्रयोगधर्मी दृष्टिकोण ने पिछले कई दशकों में विकास अर्थशास्त्र को बदला है। उसने खासतौर पर इस बात का जिक्र किया कि उनके स्कूलों में उपचारात्मक शिक्षण के प्रभावी कार्यक्रमों से 50 लाख से अधिक भारतीय बच्चों को लाभ मिला है। बनर्जी, डफ्लो और क्रेमर विकास अर्थशास्त्र के तहत एक अभियान शुरू किया है जिससे इस सवाल का स्पष्ट जवाब मिल सकता है कि कोई खास नीतिगत हस्तक्षेप प्रभावी है या नहीं। गरीब और मध्य आय वाले देशों में नीति बनाने में यह अत्यंत प्रासंगिक है जहां सरकार की क्षमता सीमित होती है और अधिक प्रभावी नीतियों को प्राथमिकता देना ज्यादा जरूरी होता है। डुफ्लो और बनर्जी की किताब 'पूअर इकनॉमिक्स' खासकर भारतीय संदर्भ में इस तरह की प्रमाण आधारित नीति के पक्ष में सशक्त दलील है। 

डफ्लो और बनर्जी ने भारतीय मूल के एक अन्य अर्थशास्त्री सेंथिल मुल्लैनाथन ने 2000 के दशक की शुरुआत में एमआईटी प्रभावशाली पॉवर्टी एक्शन लैब की स्थापना की थी जबकि क्रेमर ने केन्या में स्कूलों के अध्ययन में सबसे पहले आरसीटी को लोकप्रिय बनाया था। इस तरह की नीतिगत परीक्षणों के पीछे सोच यह है कि नीतिगत हस्तक्षेप को इलाज या नई दवा के परीक्षण के समान माना जाए। अगर किसी खास समूह को कंट्रोल सेट और एक्सपेरीमेंटल सेट में बांटा जाता है और फिर एक्सपेरीमेंटल सेट पर नीतिगत हस्तक्षेप लागू किया जाता है और इसके बाद दोनों के परिणामों की तुलना से विश्लेषक यह सुनिश्चित कर सकता है कि परिणामों पर दूसरे कारकों का असर नहीं पड़ा है। 

उदाहरण के लिए अगर किसी जिले में आधे स्कूल किसी खास परीक्षण जैसे शिक्षकों की बायोमेट्रिक उपस्थिति दर्ज करने के लिए चुने जाते हैं जबकि दूसरे स्कूलों को इसमें शामिल नहीं किया जाता है। फिर दोनों तरह के स्कूलों के परीक्षाफल से यह पता लगाया जा सकता है कि इससे पढ़ाई में सुधार हुआ या नहीं। नीति विश्लेषण पर इस तरह के प्रयोग का उल्लेखनीय असर पड़ता है और यही वजह है कि आरसीटी मूवमेंट विकास अर्थशास्त्र के क्षेत्र में पूरी तरह छा गया है। हालांकि इस बदलाव को आलोचना का भी सामना करना पड़ा है। कुछ लोगों की दलील है कि आरसीटी के लिए समस्याओं को प्रबंधनीय आकार तक कम करके विकास अर्थशास्त्र पेशा इन बड़े और कठोर सवालों से बच रहा है कि क्या विकास के लिए व्यवस्थागत बदलाव की जरूरत है या नहीं। 

लेकिन भारत जैसे देशों के लिए जहां खासकर कम विकसित राज्यों और क्षेत्रों में संसाधनों की कमी है, वहां आरसीटी के परिणाम फैसले लेने के लिए बेहद अहम जानकारी है। उनसे अहम समय और बजट की बरबादी रुकती है। एमआईटी की पॉवर्टी एक्शन लैब की भारत में भी एक सहायक संस्था है। चेन्नई स्थित इस संस्था का नाम इंस्टीट्यूट फॉर फाइनैंशियल मैनेजमेंट ऐंड रिसर्च है। बनर्जी और डुफ्लो अक्सर भारत आते हैं। बनर्जी ने भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा समस्याओं के बारे में विस्तार से लिखा है। उन्होंने कोलकाता के साउथ पॉइंट स्कूल और प्रेसिडेंसी कॉलेज से पढ़ाई की।

नोबेल से सम्मानित भारतीय/भारतीय मूल की शख्सियत

रवींद्रनाथ ठाकुर को उनकी कालजयी रचना 'गीतांजलि' के लिए 1913 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।


सीवी रमण को 1930 में 'प्रकाश के प्रकीर्णन' पर किए गए उनके काम के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया था।


भारतीय मूल वैज्ञानिक हर गोविंद खुराना को 1968 में दो अन्य के साथ चिकित्सा क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।


अल्बानियाई मूल की भारतीय नागरिक मदर टेरेसा को 1979 में नोबेल के शांति पुरस्कार से नवाजा गया था। टेरेसा को यह पुरस्कार पीडि़त मानवता की सेवा करने के लिए दिया गया था।


भारतीय मूल के अमेरिकी सुब्रमण्यम चंद्रशेखर को 1983 में संयुक्त रूप से भौतिकी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें यह पुरस्कार तारों की संरचना और उसकी उत्पत्ति में भौतिकी प्रक्रियाओं के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए दिया गया।


अमर्त्‍य सेन को 'कल्याणकारी अर्थशास्त्र' में उनके योगदान के लिए 1998 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया।


भारतीय मूल के वेंकटरमण रामाकृष्णन को 2009 में दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ राइबोजोम की संरचना और उसके प्रक्रियात्मक पहलुओं के अध्ययन के लिए रसायनशास्त्र के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया।


कैलाश सत्यार्थी को 2014 में संयुक्त रूप से नोबेल के शांति पुरस्कार प्रदान किया गया।

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