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हरियाणा : जाति के जोर में विपक्ष कमजोर!

अंकुर भारद्वाज /  October 13, 2019

हरियाणा और महाराष्ट्र के मतदाता राज्य में नई सरकार चुनने के लिए 21 अक्टूबर को मतदान करेंगे और 24 अक्टूबर को मतगणना होगी। इस साल की शुरुआत में हुए आम चुनावों के दौरान ये दोनों राज्यों के मतदाता पूरी तरह से भाजपा (हरियाणा) या भाजपा की अगुआई वाले गठबंधन (महाराष्ट्र) के पक्ष में खड़े थे। महाराष्ट्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (भाजपा एवं शिवसेना) ने 48 में से 41 सीटें जीती थीं और हरियाणा में भाजपा ने सभी 10 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी। दोनों राज्यों में वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के गठन के बाद राज्य की सरकारें चुनी गई थीं। हरियाणा में पहली बार विधायक बने मनोहर लाल खट्टर ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। संघ प्रचारक रहे खट्टर ने मुख्यमंत्री के तौर पर कई बार कठिन समय का सामना किया और अब एक बार फिर सत्ता में वापसी के लिए कमर कस रहे हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने यह जानने की कोशिश की कि हरियाणा में राज्य सरकार के पक्ष में क्या काम करेगा और किससे सरकार को मुश्किलें पैदा होंगी। 

नरेंद्र मोदी फैक्टर

भाजपा ने राज्य में पहली बार 2014 में सरकार बनाई और उस समय देश में 2014 लोकसभा चुनावों की मोदी लहर दौड़ रही थी। राज्य में होने वाली राजनीति केंद्र से काफी हद तक प्रभावित रहती है। पिछले 30 वर्षों में लोकसभा चुनाव जीतने वाली पार्टी ने ही हरियाणा में भी अपनी सरकार बनाई है। वर्ष 2014 में भूपेंद्र सिंह हुड्डा एक दशक से सत्ता में थे और सत्ता विरोधी लहर से लड़ाई कर रहे थे। जैसे जैसे मोदी लहर हिंदी भाषी क्षेत्र में बढ़ती गई, इसने हरियाणा में भी विपक्षियों को चित कर दिया। इस बार हुए लोकसभा चुनाव में भी पार्टी ने पिछली बार की सात सीटों के मुकाबले सभी 10 सीटों पर जीत दर्ज की है। प्रधानमंत्री की लोकप्रियता से खट्टïर सरकार पहले ही एक कदम आगे है।  

टूटती विपक्षी एकता 

राज्य में विपक्षी दलों के तौर पर दो प्रमुख राजनीतिक दल, कांग्रेस और इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) हैं। ओम प्रकाश चौटाला और देवी लाल जैसे हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्रियों वाली राजनीतिक पार्टी इनेलो को इस बार लोकसभा चुनावों के दौरान काफी नुकसान हुआ और पार्टी नेता दुष्यंत चौटाला ने अपनी नई राजनीतिक पार्टी 'जननायक जनता पार्टी' बना ली। परिवार के संरक्षक ओम प्रकाश चौटाला एक मामले में दोषी पाए जाने के बाद उन्हें सजा मिल चुकी है। हालांकि वह पैरोल पर हैं लेकिन पार्टी नेतृत्व अभाव के गहन संकट से जूझ रही है। इसके चलते जिन इलाकों में पार्टी की गहरी पैठ थी, वहां भी इनेलो की स्थिति कमजोर होती जा रही है। दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी भी पिछले कुछ समय से ऐसी समस्याओं का सामना कर रही है।  हरियाणा में विपक्षी पार्टियों में असहमति तथा उधेड़बुन के बीच भाजपा की राह आसान हो सकती है।  

शासन का सवाल 

मनोहर लाल खट्टर सरकार और स्वयं मुख्यमंत्री को शासन संबंधी अनुभव की कमी और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करने में विफलता पर विपक्ष लगातार घेरता रहा है। पिछले पांच वर्षों के दौरान हाल ही में हुई दो घटनाओं ने इसे साबित भी किया है। पहला, 2016 में हुआ आरक्षण संबंधी जाट आंदोलन, जिसका अंत दंगों के साथ हुआ। पहले सरकार आंदोलनकारियों के साथ सफल संवाद स्थापित करने में विफल हुई और बाद में कानून व्यवस्था को प्रबंधित नहीं करने से यह हिंसात्मक हो गया। रोहतक और झज्जर जैसी जगहों पर उपद्रवियों ने दुकानों को आग के हवाले कर दिया था। इस मामले की जांच के लिए सरकार ने प्रकाश सिंह समिति भी बनाई जिसकी रिपोर्ट का पहला हिस्सा सरकार की चूक की ओर इशारा कर रहा है। परेशान सरकार ने समिति से दूसरे हिस्से पर काम करने से मना कर दिया।  वर्ष 2017 में इसी तरह की स्थिति पैदा हो गई जब डेरा सच्चा सौदा के मुखिया गुरमीत राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद पंचकूला और दूसरे हिस्सों में दंगे भड़क गए। सरकार पर ढीला रवैया अपनाने का आरोप लगाया गया। 30 से अधिक लोगों ने इसमें अपनी जान गंवा दी।  

जाति का गणित 

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार हरियाणा की 87.46 प्रतिशत जनसंख्या हिंदू है। राज्य के 22 में से 21 जिले हिंदू बहुल  हैं। राज्य की राजनीति में जाति अहम भूमिका निभाती है। यहां की 25 प्रतिशत आबादी जाट है और ऐतिहासिक तौर पर उन्होंने राज्य की राजनीति को काफी हद तक प्रभावित किया है। हालांकि राज्य की राजनीति '36 बिरादरी' के बीच घूमती रहती है। 2016 का जाट आंदोलन भले ही खट्टïर सरकार की विफलता माना जाए लेकिन यह भाजपा के लिए राजनीतिक सफलता साबित हो सकता है। 

राज्य में किसी भी तरह के धार्मिक ध्रुवीकरण के अभाव में जातीय ध्रुवीकरण के संकेत मिलते हैं। यहां के राजनीतिक विशेषज्ञ विभिन्न जाति समूहों को मजबूत करने के तहत भाजपा की 35 बिरादरी वाली रणनीति के बारे में बात करते हैं। लोकसभा चुनाव के नतीजों से लगता है कि इस रणनीति से पार्टी को राज्य में भारी लाभ पहुंचा है। विपक्षी दलों में से इनेलो और जेजेपी को जाट हितों के साथ अधिक निकटता से जोड़कर देखा जाता है जबकि कांग्रेस पार्टी राज्य में ऐतिहासिक रूप से सभी समूहों की पार्टी रही है और 2016 के दंगों के बाद भाजपा ने इस छवि को बदलने की कोशिश की है। आगामी राज्य विधानसभा चुनाव में ये मुद्दे अहम होंगे, लेकिन इसके साथ ही कुछ अन्य कारक राजनीतिक दलों के लिए अहम होंगे।  

बेरोजगारी 

राज्य की अर्थव्यवस्था 1966 में कृषि आधारित थी और अब इसमें उदद्योग एवं सेवा क्षेत्र का योगदान अहम हो गया है। सीएमआईई की एक रिपोर्ट (मई-अगस्त 2019) के अनुसार अगस्त 2019 में देश की सबसे अधिक बेरोजगारी दर (28.68 प्रतिशत) हरियाणा राज्य में थी। वाहन क्षेत्र के संकट और गुडग़ांव-मानेसर में वाहन  उद्योगों में बड़े पैमाने पर नौकरियों के जाने से राज्य में चुनाव की राजनीति इन मुद्दों को उठा सकती है।

सदस्य का चुनाव 

राज्य में भाजपा मजबूत स्थिति में है और इसने पार्टी पर टिकट देने का दबाव भी बनाया है। पार्टी ने सात हालिया विधायकों (दो मंत्री) को चुनावी सूची से बाहर रखा है। कांग्रेस पार्टी दलबदली का सामना कर रही है और कुछ सीटों पर भाजपा को भी इसका सामना करना पड़ सकता है। 'अबकी बार 75 पार' के नारे के साथ भाजपा ने राज्य की 90 सीटों में से 75 सीटें जीतने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। कहा जा सकता है कि कम महत्त्वपूर्ण चुनाव में भाजपा एक कदम आगे चल रही है। 
Keyword: Haryana, Mahrashtra, Election, Assembly, BJP, Shivsena, Congress, PM, Prime Minister, Narendra Modi, INALO,
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