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बैंकिंग क्षेत्र ऋण आवंटन की सुस्त रफ्तार से परेशान

हंसिनी कार्तिक /  October 13, 2019

एक साल पहले जब आईएलऐंडएफएस संकट के बाद नकदी की किल्लत का पहला संकेत मिला था तो किसी के जेहन में यह बात नहीं आई थी कि इसका भारत की वित्तीय प्रणाली पर इतना व्यापक  असर होगा। तब शायद यह बात भी किसी के दिमाग में नहीं आई कि सार्वजनिक  क्षेत्र के बैंकों की संख्या कम हो जाएगी और रीपो दर में कमी का लाभ ग्राहकों को देने के लिए उन पर इतना दबाव पड़ेगा कि उन्हें शुद्ध ब्याज मार्जिन (एनआईएम)बचाने के लिए जद्दोजहद करनी होगी। 

हालांकि बैंकों को जो बात सबसे अधिक परेशान कर रही है वह है ऋण आवंटन की धीमी दर। जब कुछ तिमाही पहले गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) ने ऋण आवंटन की रफ्तार कम कर दी तो उसका खपत/उपभोग पर बुरा असर पड़ा था। जून तिमाही में इसका असर बैंकों पर देखने को भी मिला। मोटे तौर पर पूरे बैंकिंग क्षेत्र की वृद्धि दर प्रभावित हुई है और निजी बैंकों को इसका अधिक खमियाजा भुगतना पड़ा है। पिछले पांच वर्षों के दौरान निजी बैंक बिना किसी खास मशक्कत के 20 से 25 प्रतिशत (खासकर अधिक खुदरा कारोबार करने वाले) की तेजी के साथ आगे बढ़ रहे थे।

एचडीएफसी बैंक और बजाज फाइनैंस की तरफ से जारी आंकड़ों के अनुसार कुछ न कुछ तेजी अब भी बरकरार है, लेकिन पिछली रफ्तार पकडऩा अब भी दूर की बात लग रही है। एचडीएफसी बैंक का ऋण खाता सितंबर तिमाही में 19 प्रतिशत बढ़ा, जबकि बजाज फाइनैंस ने 18 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 19 लाख नए ग्राहक अपने साथ जोड़े। यह संख्या पिछले आंकड़ों की तुलना में खासी कम है। 

कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के विश्लेषकों का कहना है कि जुलाई-अगस्त के दौरान ऋण आवंटन दर सालाना आधार पर 17 प्रतिशत रही, लेकिन असुरक्षित ऋण खंड में आवंटन की दर कम होकर करीब 22 प्रतिशत रह गई है, जो वित्त वर्ष 2019 में 35 प्रतिशत रही थी। अच्छी बात यह रही है कि बैंक आवास ऋण खंड में एनबीएफसी की जगह लेने में सफल रहे है। कुल मिलाकर इस ब्रोकरेज कंपनी का मानना है कि कुछ खंडों में अगले कुछ महीनों के दौरान खुदरा ऋण वृद्धि दर कमजोर रह सकती है। विश्लेषकों ने कहा,'खुदरा ऋण में धीरे-धीरे सुस्ती से कुल ऋण आवंटन की रफ्तार प्रभावित होगी।' 

परिसंपत्ति गुणवत्ता बरकरार रखने के लिए ऋण आवंटन में इजाफा अहम हो जाता है। ऐक्सिस बैंक और आईसीआईसीआई बैंक को छोड़कर दूसरे निजी बैंकों की सकल गैर-निष्पादित आस्तियां (एनपीए) अनुपात में पिछले एक साल में वृद्धि दर्ज की गई है। वैसे सरकारी बैंकों के एनपीए आंकड़े कम हो रहे हैं, लेकिन मौजूदा समेकन के बीच यह सिलसिला जारी नहीं रह सकता है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में इस जोखिम का असर पहले ही दिख चुका है, जबकि निजी बैंकों के शेयरों में असर दिखना बाकी है।  इस बीच, इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि एनबीएफसी, रियल एस्टेट क्षेत्र और खुदरा ऋणों को लेकर बैंक निश्चिंत नहीं हो सकते हैं। ये तीनों खंड पूर्व में बैंकों, खासकर निजी क्षेत्र के बैंकों, के लिए वृद्धि के मजबूत स्तंभ रहे हैं। इनकी मदद से बैंक अधिक मूल्यांकन हासिल करने और निवेशकों को आकर्षित करने में सफल रहे हैं। अब एचडीएफसी बैंक और ऐक्सिस बैंक जैसे बड़े नामों के मूल्यांकन में सुधार दिखा है, जबकि बैंकिंग क्षेत्र के इर्द-गिर्द नकारात्मक खबरों से इंडसइंड बैंक, आरबीएल बैंक और येस बैंक के मूल्यांकन पर बुसर असर हुआ है।

हालांकि एक अच्छी खबर भी है। के्रडिट सुइस के विश्लेषकों ने कहा है कि ऋण आवंटन कम होने के बाद भी निजी बैंक एनआईएम बरकरार रख पा रहे हैं। आवंटित ऋणों पर अधिक कमाई और कंपनियों को दिए गए ऋण मोटे तौर पर कम फंसने से निजी बैंकों का एनआईएम लगातार 3.6 से 4.0 प्रतिशत के दायरे में है, जो सरकारी बैंकों के मुकाबले काफी अधिक है। सरकारी बैंक अब भी 3 प्रतिशत एनआईएम हासिल करने में जूझ रहे हैं। लिहाजा मुनाफा अधिक रहने से निजी बैंकों को बैंकिंग क्षेत्र में कमजोरी से निपटने और सुरक्षित खुदरा ऋणों के लिए अपना बहीखाता पुनर्संतुलित करने में मदद मिल रही है। इसके लिए अगर थोड़ा मूल्यांकन गंवाना भी पड़ता है तो खास फर्क नहीं पड़ता है। अधिक मार्जिन से खुदरा ऋणों को बाहरी मानक दरों से जोडऩे में भी मदद मिलेगी। इसका असर दिसंबर तिमाही से पडऩा शुरू हो जाएगा।  

बैंकों के लिए बन सकता है परेशानी का मकाम 

रियल एस्टेट क्षेत्र पिछले कुछ अरसे से नाजुक दौर से गुज रहा है। इस क्षेत्र की कंपनियां एक के बाद एक धराशायी हो रही हैं और जो बचीं हैं उन्हें रकम जुटाने में खासी मुश्किलों को सामना करना पड़ रहा है। अगर रियल एस्टेट में ऑफिस स्पेस के क्षेत्र को छोड़ दें तो आवास और अन्य वाणिज्यिक परियोजनाओं जैसे मॉल और होटलों के लिवाल नहीं मिल रहे हैं। इन्हें मांग की कमी का सामना करना पड़ रहा है। नतीजतन परियोजनाओं का अंबार खड़ा हो गया है। रियल एस्टेट में खलबली मची हो और बैंकों पर इसका असर ना हो, ऐसा संभव नहीं है। इस क्षेत्र को बैंकों ने भी ऋण दिए हैं और मामला गंभीर होने से उनकी परिसंपत्ति गुणवत्ता प्रभावित होने का भी जोखिम बढ़ता जा रहा है। रियल एस्टेट क्षेत्र को आवंटित ऋणों से बैंक को ब्याज की मोटी कमाई हो रही थी। 

जेफरीज की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2010 के आंकड़ों के अनुसार रियल एस्टेट क्षेत्र को निजी बैंकों ने करीब 6.67 प्रतिशत ऋण दिए हैं, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का आंकड़ा 2.4 प्रतिशत रहा है। इससे स्पष्ट है कि रियल एस्टेट क्षेत्र डगमगाने से निजी बैंकों को अधिक जोखिम हो सकता है। हालांकि जेफरीज का यह भी मानना है कि रियल एस्टेट कंपनियों द्वारा भुगतान में चूक से उत्पन्न असर बहुत बड़ा नहीं होगा। वास्तविकता इससे अलग हो सकती है। 

बैंकिंग क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले 6 से 9 महीनों के दौरान गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) ने रियल एस्टेट क्षेत्र को ऋण देना बंद कर दिया है और यही बात मौजूदा संकट की एक प्रमुख वजह है। एक मझोले बैंक के आला अधिकारी ने कहा, 'अब तक रियल एस्टेट ऋणों से बैंकों को कोई परेशानी नहीं हो रही थी, क्योंकि रियल एस्टेट कंपनियां एनबीएफसी से रकम ले रही थीं। अब पिछले छह महीनों से एनीबीएफसी का विकल्प बंद होने के बाद हमें इस क्षेत्र पर पैनी निगाह रखनी होगी।' बैंकों का अब भी यही कहना है कि एनबीएफसी की जगह भरने के लिए वे किसी तरह की जल्दबाजी में नहीं है। एक निजी क्षेत्र के बैंक प्रमुख ने कहा, 'पिछले साल दिसंबर से हमने रियल एस्टेट क्षेत्र को ऋण आवंटन नहीं बढ़ाया है और अब जितना भी ऋण दे रहे हैं, काफी सोच समझकर दे रहे हैं।'

बैंक कितनी ही सावधानी क्यों नहीं बरते, लेकिन रियल एस्टेट के मुश्किल में फंसने से उन पर दोहरा असर होगा। इतना ही नहीं उनके द्वारा एनबीएफसी को ऋण आवंटन भी प्रभावित हो सकता है। रियल एस्टेट क्षेत्र में बैंकों की रकम पर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की नजर रही है। लेकिन इससे बैंकों को एनबीएफसी को रकम देने में कोई परेशानी नहीं आ रही थी। दूसरी तरफ एनबीएफसी बैंकों से रकम लेकर रियल एस्टेट परियेाजनाओं में लगा रही थीं। रकम की मौजूदा दिक्कतों से एनबीएफसी के लिए डेवलपरों को दिए गए ऋण खंड में भुगतान में देरी के मामले बढ़ गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बैंकों को इस चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। एक विदेशी ब्रोकरेज कंपनी के विश्लेषक ने कहा, 'बैंकों पर इसका सीधा असर तो नहीं पड़ेगा क्योंकि मध्य एवं छोटी रियल एस्टेट परियोजनाओं में बैंक का बड़ा निवेश नहीं है। 
हालांकि इससे बैंकों द्वारा एनबीएफसी को आवंटित ऋण जरूर परेशानी का सबब बन सकते हैं।' इस संबंध में बैंक सितंबर तिमाही को लेकर क्या कहते हैं, इस पर बाजार की नजरें होंगी। इसके बाद ही बाजार अनुमान लगा पाएगा कि रियल एस्टेट क्षेत्र को आवंटित ऋणों से जोखिम किस हद तक हो सकता है। 
Keyword: Banking, Bank, Loss, NPA, Debt, NIHM, NBFC, Real Estate,
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