बिजनेस स्टैंडर्ड - वाणिज्यिक अदालत में नहीं सुना जाएगा हरेक लेनदेन विवाद
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, November 12, 2019 06:28 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम खबर

वाणिज्यिक अदालत में नहीं सुना जाएगा हरेक लेनदेन विवाद

एम जे एंटनी /  October 13, 2019

अधिक मूल्य के लेनदेन से जुड़े विवादों को वाणिज्यिक वाद नहीं माना जा सकता है और न ही उन्हें त्वरित निपटारे के लिए वाणिज्यिक अदालतों में ले जाया सकता है। उच्चतम न्यायालय ने अंबालाल साराभाई इंटरप्राइजेज बनाम केएस इन्फ्रास्पेस वाद में यह फैसला देते हुए कहा है कि अगर लेनदेन से जुड़ा हर मामला वाणिज्यिक अदालत के समक्ष लाया जाता है तो इन अदालतों के गठन का असली मकसद ही धराशायी हो जाएगा।

न्यायालय ने कहा, 'यही कारण है कि वाणिज्यिक विवाद से संबंधित न होते हुए भी केवल बड़ा लेनदेन होने और जल्द निपटारा होने की मंशा के साथ अगर मामले को वाणिज्यिक अदालत में लाया जाता है तो असली वाणिज्यिक विवादों के निपटारे की राह अवरुद्ध हो जाएगी। कानून निर्माताओं ने इन अदालतों का गठन करते समय सोचा होगा कि वाणिज्यिक मामलों का जल्द निपटारा हो सकेगा।' यह मामला वडोदरा में एक अचल संपत्ति को गिरवी रखने से जुड़ा हुआ था। वाणिज्यिक अदालत इस मामले को तभी सुन सकती है जब उस संपत्ति का विशेष रूप से व्यापार या वाणिज्य में ही इस्तेमाल हो रहा हो। लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं होने से अदालत ने अपील खारिज कर दी।  

रियायतें देने का अपना वादा करना होगा पूरा

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा है कि राज्य एक औद्योगिक नीति में रियायतों के सरकारी वादे पर भरोसा कर वहां अपनी इकाइयां लगाने वाले उद्यमियों को धता नहीं बता सकता है और न ही नई नीति में शर्तों को संशोधित कर सकता है। इस मामले में 2004-09 नीति में उद्योगों को कई रियायतें दी गई थीं जिसके आधार पर कंपनियों ने भारी निवेश किया था। लेकिन 2009-14 की नीति घोषित होने पर ये लाभ एकतरफा ढंग से वापस ले लिए गए। लाभों को खत्म करने के लिए पुरानी नीति की शर्तें भी बदल दी गईं। इस बदलाव को जिंदल स्टील ऐंड पावर लिमिटेड और श्री बजरंग पावर ऐंड इस्पात लिमिटेड ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। न्यायालय ने उनकी याचिका को स्वीकार करते हुए कहा है कि सरकार इस कदम को यह कहते हुए न्यायसंगत नहीं ठहरा सकता है कि यह गलती को दुरुस्त करने का कदम है। उद्योग अपने से किए गए वादों को पूरा करने की वैधानिक अपेक्षा के हकदार हैं। न्यायालय ने दो महीनों के भीतर कंपनियों को दिए जाने वाले लाभों का विस्तार करने का सरकार को निर्देश दिया है। निवेश सब्सिडी को एरियर के साथ कर दायित्व के मद में देने की इजाजत भी दी। 

सड़क हादसे में फौजदारी मुकदमा चलाना वैध

उच्चतम न्यायालय ने मोटर वाहन दुर्घटनाओं में दोषियों पर मोटर वाहन अधिनियम के ही तहत अभियोग चलाने संबंधी गौहाटी उच्च न्यायालय के आदेश को निरस्त कर दिया है। उच्च न्यायालय ने अधीनस्थ अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वाहन हादसों में अभियोजन भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत नहीं, मोटर वाहन अधिनियम के ही तहत चलाया जाए। असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश के अधिकारियों को यह आदेश जारी किया गया था। उच्च न्यायालय ने कहा था कि सड़क यातायात या मोटर वाहन से जुड़े मामलों में आईपीसी के प्रावधानों के तहत अभियोग चलाना गैरकानूनी है। ऐसे में सवाल उठा कि ऐसे मामलों में कौन सा नियम लगेगा- मोटर वाहन अधिनियम या आईपीसी? उच्च न्यायालय ने कहा कि आपराधिक कानून मोटर वाहन अधिनियम के वैधानिक प्रावधानों के अधीन हो जाता है लिहाजा कोई भी जांच इसके दायरे में ही होनी चाहिए। इस फैसले के खिलाफ अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा ने अपील दायर की थी। उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि लापरवाही के चलते होने वाले सड़क हादसों की बढ़ती संख्या को देखते हुए दोनों ही कानून लागू करने होंगे। फैसले के मुताबिक, 'दोनों ही कानून अपने अलग दायरे में पूरे दमखम से लागू होते हैं। अगर यह मान भी लें कि मोटर वाहन अधिनियम और आईपीसी के कुछ प्रावधान एक दूसरे का व्यपगमन करते हैं तो भी यह नहीं कहा जा सकता है कि दोनों कानूनों के तहत हुए अपकृत्य परस्पर-विरोधी हैं।' 

क्लब सदस्यों के लिए ड्रिंक पर सेवा कर नहीं

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि क्लब के स्थायी सदस्यों को परोसे जाने वाले खानपान पर सेवा कर नहीं लिया जा सकता है। यह कर वर्ष 2005 के बाद से क्लब में परोसे जाने वाले खानपान पर लागू किया गया है। न्यायालय ने कलकत्ता उच्च न्याायलय के फैसले के खिलाफ दायर राजस्व अधिकारियों की अपीलों को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया है। कलकत्ता क्लब लिमिटेड ने दलील दी थी कि पश्चिम बंगाल बिक्री कर अधिनियम के तहत उसे एक वितरक नहीं माना जा सकता है क्योंकि वह अपने स्थायी सदस्यों को खाने, नाश्ते और ड्रिंक के रूप में किसी भी उत्पाद की बिक्री नहीं करता है। उसने यह भी कहा था कि क्लब खुद को स्थायी सदस्यों का एक एजेंट मानता है और भोजन, ड्रिंक या पेय परोसने को लेकर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। सदस्यों की तरफ से उसे केवल भुगतान मिलता है लिहाजा कोई भी बिक्री कर नहीं लगना चाहिए। लेकिन अधिकारियों ने यह कहते हुए इसका प्रतिवाद किया था कि मुनाफा कमाने के मकसद को ही बिक्री कर लगाने का आधार नहीं माना जा सकता है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने अधिकारियों की दलील को खारिज करते हुए कहा है कि इस मामले में गुजरात एवं झारखंड उच्च न्यायालयों का नजरिया सही है। 

चाय कंपनी पर दिवालिया प्रक्रिया पाबंदी के परे 

चाय कंपनियों के मामले में दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने के लिए सरकार की सहमति लेना जरूरी नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने डंकंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम ए जे एग्रोकेम वाद में यह फैसला सुनाया है। देश भर में 14 चाय बागानों का संचालन करने वाली कंपनी डंकंस ने कर्ज लिया था। उसने राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीली अधिकरण में कहा था कि चाय अधिनियम के तहत किसी भी चाय कंपनी को बंद करने की दिशा में कदम उठाने के लिए सरकारी अनुमति अनिवार्य है। लेकिन इस मामले में सरकारी मंजूरी नहीं लिए जाने से ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के तहत दिवालिया प्रक्रिया शुरू किया जाना गलत है। अधिकरण ने उसकी इस दलील को अमान्य कर दिया था। अब उच्चतम न्यायालय ने भी डंकंस की अपील को नकारते हुए कहा है कि आईबीसी कानून चाय अधिनियम पर अध्यारोही प्रभाव रखता है। आईबीसी लाने का मकसद उद्योग में नई जान डालना था और कंपनी बंद करने का कदम अंतिम विकल्प है। इसके अलावा आईबीसी कानून बाद में प्रभावी होने से पुराने कानून चाय अधिनियम का व्यपगमन कर लेगा।

हवाईअड्डों की शुल्क-मुक्त दुकानें जीएसटी से बाहर

बंबई उच्च न्यायालय ने कहा है कि अगर हवाईअड्डों पर आने-जाने वाले यात्रियों को सेवा देने वाली शुल्क-मुक्त दुकानें अगर जीएसटी के दायरे में आती हैं तो फिर कर बोझ बढ़ जाएगा जिससे उत्पादों के दाम भी बढ़ जाएंगे। जबकि इन दुकानों को शुल्क एवं करों से मुक्त माना जाता है। ऐसा होने पर भारत में स्थित शुल्क-मुक्त दुकानें अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डों पर मौजूद दुकानों से प्रतिस्पद्र्धा नहीं कर पाएंगी। इसका असर हमारे विदेशी कारोबार एवं विदेशी मुद्रा की आय पर भी पड़ेगा। इस तरह न्यायालय ने फ्लेमिंगो ट्रैवल रिटेल लिमिटेड बनाम भारत संघ वाद में मुंबई हवाईअड्डों की इस दुकान को जारी कारण बताओ नोटिस को भी निरस्त कर दिया है। इसने यह भी कहा कि सरकार का यह कदम मनमाना एवं संविधान के अनुच्छेद 286 का उल्लंघन करने वाला है जो वस्तुओं या सेवाओं के आयात-निर्यात पर कर लगाने पर पाबंदी लगाता है।

Keyword: Supreme court, law, Business Law, GST, Tea, Airport,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या आईआईपी में गिरावट आर्थिक सुस्ती गहराने का संकेत है?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.