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वापस लौट रहा स्वदेशी अर्थव्यवस्था का जिन्न!

शेखर गुप्ता /  October 13, 2019

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख जिन्हें सरसंघचालक कहकर पुकारा जाता है, वह दशहरे के दिन नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय पर जो भाषण देते हैं उसे राष्ट्र के नाम संबोधन के समान माना जाता है। यह संबोधन हमेशा सुर्खियां बटोरता है लेकिन अब जबकि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दूसरी बार सत्ता में है और पहले से ज्यादा बहुमत से सत्ता में है तो इसकी अहमियत भी बढ़ गई है। इतना ही नहीं सरकार ऐसे सभी कदम उठा रही है जिन्हें आरएसएस की मूल चिंताओं में शामिल किया जाता है: कश्मीर में अनुच्छेद 370 समाप्त करना, समान आचार संहिता और अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण।

करीब एक दशक से आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत इस वर्ष ज्यादा खबरों में रहे क्योंकि उन्होंने लिंचिंग के अलावा हिंदू और भारतीय को परिभाषित करते हुए कहा कि दोनों एक ही हैं। दोनों मुद्दों पर उनकी दलीलें विवादास्पद थीं जिन्होंने खूब ध्यान खींचा। उनकी आलोचना भी हुई और उनको मानने वालों ने सराहना भी की। इस प्रक्रिया में एक अहम मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया गया जबकि उन्होंने उस पर विस्तार से चर्चा की थी। हम उसका विश्लेषण करेंगे।

अगर आप उनके 63 मिनट के भाषण के कुछ हिस्से दोबारा सुनें तो उपयोगी होगा। मसलन पहला मिनट और उसके बाद 28वें मिनट से 42वें मिनट तक। इस दौरान वह अपने आर्थिक दर्शन का जिक्र कर रहे हैं। असल बात चंद शुरुआती सेकंड में निहित है। वह इसकी शुरुआत देश की दो महान विभूतियों गुरुनानक देव (550वीं वर्षगांठ) और महात्मा गांधी (150वीं वर्षगांठ) से करते हैं। मुझे नहीं लगता कि आरएसएस-भाजपा के दायरे के बाहर या भारतीय राजनीति पर गहरी पकड़ रखने वाले किसी व्यक्ति को दत्तोपंत ठेंगड़ी के बारे में कोई गहन जानकारी होगी। भागवत ने जिक्र किया कि उनका शताब्दी वर्ष 10 नवंबर को आरंभ हो रहा है।

सच तो यह है कि कोई भी, यहां तक कि आरएसएस भी उन्हें गुरुनानक या गांधी की श्रेणी में नहीं रखेगा। परंतु वह इतने महत्त्वपूर्ण तो थे कि उपरोक्त दोनों के साथ उनका जिक्र किया गया। जब आप उनके भाषण के दूसरे हिस्से के 14 मिनट सुनेंगे तो आपको पता चलेगा कि यह कोई चलताऊ उल्लेख नहीं था। ठेंगड़ी सन 1920 में वर्धा में जन्मे जो नागपुर से ज्यादा दूर नहीं है। ठेंगड़ी आजादी के बाद के आरएसएस के आधुनिक संस्थापकों में से एक थे। उन्होंने आरएसएस के राजनैतिक अवदानों भाजपा और जनसंघ के लिए वैचारिक जमीन तैयार की। अर्थशास्त्र उनकी रुचि का विषय था। उनके विचारों ने आरएसएस की आर्थिक विश्वदृष्टि तैयार करने में मदद की। खासतौर पर गत 30 वर्षों में या कहें जब भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था का उदारीकरण शुरू किया।

ठेंगड़ी अटल बिहारी वाजपेयी के साथी थे और दोनों ने सन 1955 में भोपाल में आरएसएस की श्रमिक शाखा भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) की स्थापना की थी। वाजपेयी सरकार के छह वर्ष के दौरान दोनों आपस में बुरी तरह लड़ते रहे। ठेंगड़ी वाजपेयी सरकार के तमाम आर्थिक निर्णयों का विरोध करते रहे। खासतौर पर सरकारी कंपनियों के निजीकरण, आयात शुल्क में कमी और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ाने के निर्णयों का। उन्होंने तो उस वक्त बतौर वित्त मंत्री सुधारों को बढ़ावा दे रहे यशवंत सिन्हा की बलि तक मांगी थी। वाजपेयी ने एक वर्ष तक प्रतिरोध करने के बाद समर्पण कर दिया था। ठेंगड़ी को संगठन के भीतर वास्तविक शक्ति हासिल थी। जब सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि किसी सरकारी कंपनी को बेचने के पहले संसद की मंजूरी आवश्यक है तो शौरी की राह रुक गई थी। ठेंगड़ी ने इसकी खुशी मनाई थी। आज के संदर्भ में यह याद रखना होगा कि ऐसा तब हुआ था जब वाजपेयी सरकार ने दो बड़ी तेल विपणन कंपनियों हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम को बेचने का निर्णय कर लिया था।

ठेंगड़ी ऐसा कहने वाले अकेले व्यक्ति नहीं थे। बीएमएस ने भी वाजपेयी के सुधारों का विरोध किया था। यह विरोध वाम संगठनों और कांग्रेस से जुड़े संगठन इंटक से भी अधिक तीव्र था। इस बीच उन्होंने दो और दबाव समूहों का गठन किया: सन 1979 में भारतीय किसान संघ और सन 1991 में स्वदेशी जागरण मंच। सन 1991 में ही नरसिंह राव और मनमोहन सिंह ने सुधारों की शुरुआत की थी। स्वदेशी जागरण मंच ने देश भर में वैश्वीकरण का भरपूर विरोध किया। के एन गोविंदाचार्य जो भाजपा में आरएसएस के आदमी थे, ने बतौर भाजपा महासचिव इसकी पुरजोर मुखालफत की।

वाजपेयी के कार्यकाल के समापन तक दोनों के रिश्ते बेहद खराब हो गए थे। जब भी कोई नया विचार सामने आता तो वाजपेयी बनावटी हंसी के साथ कहते, अरे भाई ठेंगड़ी जी को कौन संभालेगा? परंतु इस लड़ाई के बावजूद वाजपेयी ने बीटी कॉटन को मंजूरी दी। जबकि मनमोहन ङ्क्षसह और मोदी के कुल 16 साल के कार्यकाल में एक भी नए बीज को मंजूरी नहीं मिली। 2004 में इस लड़ाई का अंत हो गया। मई 2004 में वाजपेयी की सत्ता चली गई और उसी वर्ष 14 अक्टूबर को ठेंगड़ी गुजर गए। उन्हें इस बात की संतुष्टि रही होगी कि वाम नियंत्रण वाली नई संप्रग सरकार ने निजीकरण को त्यागकर कल्याण योजनाओं का ऐसा सिलसिला शुरू किया जैसा शायद वे चाहते। अब जबकि हम ठेंगड़ी के बारे में अधिक जानते हैं, वही ठेंगड़ी जिन्हें सरसंघचालक ने गुरुनानक और महात्मा गांधी के साथ रखा, तो अर्थव्यवस्था पर दिए 14 मिनट को बेहतर समझ सकते हैं। 

सार-संक्षेप: 

आर्थिक संकट मौजूद है लेकिन इसे बहुत अधिक तवज्जो देने की आवश्यकता नहीं है। जीडीपी वृद्धि को मापने का इकलौता मानक नहीं है। भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम उठाइए लेकिन मासूमों को परेशान मत कीजिए। हमें स्वदेशी की अवधारणा पर यकीन है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हम खुद को अलग-थलग कर लें। व्यापार वैश्विक है लेकिन हमें वही चीजें खरीदनी चाहिए जो हम नहीं बना सकते और हमें उसकी जरूरत है। भारतीय और ब्राजीली गोवंश की संकर नस्ल के आयातित वीर्य का प्रयोग क्यों? स्वदेशी का इस्तेमाल हो। आगे वह निर्यात की अच्छाई और आयात की बुराई की बात करते हैं। आरएसएस की सादगी का मंत्र कहता है कि केवल जरूरी चीजें खरीदें और अपनी बनाई चीजों को संरक्षण दें।

यह शब्दश: अनुवाद नहीं है बल्कि मेरी ओर से ईमानदारीपूर्वक की गई व्याख्या है। इसके बाद वह एफडीआई पर कहते हैं कि विदेशी यहां निवेश कर सकते हैं लेकिन हमें उन देशों से सीखना चाहिए जो घरेलू बोर्ड सदस्यों को वीटो अधिकार देते हैं। यानी हिस्सेदारी विदेशियों के पास रहे और शक्ति सरकार के पास। दूसरी ओर क्या हो रहा है? हमारी नई कंपनियां भारतीयों के स्वामित्व वाली दिख रही हैं लेकिन गहराई से देखें तो उनमें चीन की हिस्सेदारी है। इसे चिरपरिचित ठेंगड़ोनॉमिक्स कहा जा सकता है।

मोदी सरकार 2008 के बाद सबसे गहन आर्थिक मंदी से जूझ रही है और इस बीच उसने जो कदम उठाए या वादे किए वे भी उसके उलट ही ठहरते हैं। यह नए क्षेत्रों को एफडीआई के लिए खोल रही है, नए व्यापार समझौते कर रही है, खासतौर पर अमेरिका के साथ तथा क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी को अंजाम देने में लगी है। इसने बड़े पैमाने पर निजीकरण की घोषणा भी की है। 

मोदी सरकार ने हर मोर्चे पर विपरीत कदम उठाया है। मोदी सरकार ने जिस सबसे बड़ी सरकारी कंपनी को बिक्री के लिए सामने किया है यह वही बीपीसीएल है जिसे बेचना वाजपेयी ने 2003 में टाल दिया था। मोदी ने इस विषय पर अचानक सोचा हो ऐसा भी नहीं है। मोदी ने सन 2016 में जिन 187 पुरातन कानूनों को समाप्त किया था उनमें 1976 में इंदिरा गांधी द्वारा पारित वह कानून भी था जिसके जरिये बहुराष्ट्रीय कंपनी बर्मा शेल का राष्ट्रीयकरण कर उसे बीपीसीएल नाम दिया गया।

हम कह नहीं सकते कि स्वदेशी अर्थशास्त्र का इतने विस्तार से जिक्र कर भागवत एक बार फिर विरोध का इरादा दिखा रहे हैं या नहीं। वाजपेयी और मौजूदा प्रधानमंत्री की ताकत में अंतर को देखकर ऐसा लगता नहीं लेकिन यह असंभव भी नहीं। हम बस यही आशा करते हैं कि अभी ऐसी विचारधारा का सामने आना बाकी है जो मानती हो कि देश की अर्थव्यवस्था जिस गर्त में गिरी है उसे वहां से निकालने के लिए और गहरी खुदाई की आवश्यकता है।

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