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आगे की राह

संपादकीय /  October 13, 2019

मामल्लपुरम (महाबलीपुरम) में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनौपचारिक शिखर बैठक से भारत और चीन के रिश्तों में अहम बदलाव की आशा करना अतिरंजना था। वुहान में सन 2018 में हुई मुलाकात के बाद यह दूसरा अवसर था जब दोनों नेता इस तरह मिले। कश्मीर को लेकर तनाव, यात्रा से ऐन पहले अरुणाचल प्रदेश में सैन्य कवायद, एक बेल्ट-एक रोड पहल और भारत यात्रा के ऐन पहले पाकिस्तान और बाद में नेपाल के नेताओं से चिनफिंग की मुलाकात बताती है कि इस मुलाकात से ऐसा कुछ हासिल नहीं होना था जो दोनों देशों के लिए बहुत अहम हो। परंतु इस दो दिवसीय आयोजन से तीन संकेत निकलते हैं जो बताते हैं कि रिश्तों में संतुलन कायम हो रहा है, आगे की राह नजर आ रही है। पहला संकेत कूटनीतिक है। अगर इस बैठक से कुछ अहम लाभ हासिल करना मुश्किल था तो इस तथ्य पर जोर दिया जाना चाहिए कि विभिन्न मतभेदों को भी बढऩे नहीं दिया गया। वह भी तब जब महज महीने भर पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा में कुछ आक्रामकता नजर आई थी। ऐसा मोटे तौर पर इसलिए हुआ क्योंकि राष्ट्रपति चिनफिंग और प्रधानमंत्री मोदी का आपसी तालमेल बहुत अच्छा है। 

मामल्लपुरम से यह संकेत निकला कि वे आपसी रिश्ते को महत्त्व देते हैं। दूसरा आश्वस्त करने वाला संकेत था व्यापारिक रिश्तों पर जोर और आर्थिक और व्यापारिक बातचीत के लिए मंत्रिस्तरीय व्यवस्था का गठन। इस वार्ता का नेतृत्व चीन के उप-प्रधानमंत्री और भारत के वित्त मंत्री करेंगे। इससे दोनों देशों के व्यापारिक असंतुलन को हल करने में मदद मिलेगी। चीन के साथ भारत का वार्षिक व्यापार घाटा 50 अरब डॉलर से अधिक है। बातचीत के जरिये आपसी निवेश और साझा विनिर्माण साझेदारी वाले क्षेत्र चिह्नित किए जाएंगे। चीन ने क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) मुक्त व्यापार समझौते को लेकर भारत की चिंताओं को भी माना है और इससे भी मदद मिली है। भारत के नजरिये से देखें तो चीन आरसीईपी पर हस्ताक्षर की राह में प्रमुख बाधा है। 

चीन और भारत अब इन चिंताओं पर बातचीत को तैयार हैं जो चीन के सहज रुख को दर्शाता है। तीसरी और शायद सबसे अहम बात यह है कि बैठक में सीमा संबंधी मसलों को लेकर 2005 में तय दो प्रमुख सिद्धांतों को दोहराया गया। भारत की दृष्टि से दोनों अहम हैं। एक, बड़ी भौगोलिक विशिष्टताओं को सीमा का विभाजक मानना और दूसरा बसी हुई आबादी के हितों को ध्यान में रखना (सीमावर्ती कस्बे तवांग के लोगों के लिए अहम)। इससे पहले चीन के नेता इन सिद्धांतों से पीछे हट गए थे। ऐसे में मामल्लपुरम में उनका दोहराया जाना अहम है।

चीन द्वारा बार-बार भारत के पारंपरिक भू-राजनैतिक साझेदार नेपाल को धन और निवेश प्रस्ताव देना, दर्शाता है कि वह दक्षिण एशिया में अपने भू-राजनैतिक दखल के प्रयास कम नहीं करने वाला। न्यूयॉर्क में गत माह जापान, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और भारत के विदेश मंत्रियों की बैठक (एशिया प्रशांत क्षेत्र में चीन को संतुलित करने के लिए) के साथ रखकर देखें तो यह स्पष्ट है कि इस द्विपक्षीय रिश्ते में दोनों में से कोई देश पीछे हटने को तैयार नहीं है। 

भारत के लिए राहत की बात थी कि इस चर्चा में कश्मीर का मुद्दा नहीं उछला। इसके बजाय चिनफिंग ने मोदी को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की 8 अक्टूबर की पेइचिंग यात्रा के बारे में जानकारी दी। परंतु सबसे अहम बात यह है कि वुहान में हुई पिछली मुलाकात की तरह मामल्लपुरम में हुई अनौपचारिक मुलाकात ने एक बार फिर संवाद और संचार की महत्ता को रेखांकित किया है। मोदी ने अगले वर्ष तीसरी बैठक के चिनफिंग के न्योते को स्वीकार कर लिया है। उस लिहाज से देखें तो मामल्लपुरम ने दोनों देशों के रिश्ते को आगे बढ़ाने का काम किया है।
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