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डीटीएच ग्राहकों के गुम होने से जुड़े मिथक का सच

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  October 11, 2019

जब परंपरागत मीडिया को लेकर बुरी खबर आती है तो विश्लेषकों एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया कमोबेश अनुमानित ही होती है। हर बात को बड़ी तेजी से 'डिजिटल क्रांति' और 'कॉर्ड कटिंग' के जिम्मे डाल दिया जाता है। पिछले हफ्ते भी कुछ ऐसा ही हुआ। द हिंदू बिज़नेसलाइन अखबार में 2 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल फरवरी में दूरसंचार नियामक ट्राई की तरफ से नया शुल्क आदेश लागू किए जाने के बाद से डीटीएच ऑपरेटरों को 2 करोड़ घरों में अपने कनेक्शन से हाथ धोना पड़ा। इस रिपोर्ट में ट्राई के आंकड़ों का ही इस्तेमाल किया गया था।

 
इससे तीन सवाल खड़े होते हैं। पहला, आखिर डीटीएच कनेक्शन में गिरावट क्यों आई? वजह यह है कि डीटीएच कनेक्शन दर्ज करने का पैमाना ही बदल गया है। कई वर्षों तक ट्राई 120 दिनों से सक्रिय कुल ग्राहकों को आधार बनाता था। दरअसल उसे ऑपरेटर इसी तरह से आंकड़े देते थे। इसमें वे ग्राहक भी शामिल थे जो निष्क्रिय थे और 120 दिनों से रिचार्ज नहीं कराए होते थे। इस तरह मार्च 2019 में समाप्त तिमाही में 7.24 घरों में डीटीएच कनेक्शन थे। बहरहाल डीटीएच ऑपरेटरों ने आंतरिक निगरानी एवं प्रसारकों को किए जाने वाले भुगतान की गणना के लिए हमेशा ही एक महीने में चार खास दिनों पर आधारित औसत सक्रिय ग्राहकों का इस्तेमाल किया है। अपने नए शुल्क आदेश में पूरी पारदर्शिता पर जोर देने वाले ट्राई ने भी औसत सक्रिय ग्राहकों का ही इस्तेमाल करते हुए इनकी संख्या 5.43 करोड़ बताई है। इस तरह दोनों आंकड़ों में 1.8 करोड़ से भी बड़ा फासला है।
 
अब टेलीविजन दर्शकों के बारे में रिपोर्ट जारी करने वाली संस्था बार्क के आंकड़ों पर नजर डालते हैं। भारत में 19.7 करोड़ घरों में टीवी सेट हैं जिनमें से 10.5 करोड़ घरों में केबल, 5.5 करोड़ घरों में डीटीएच और करीब 2.5-3 करोड़ घरों में डीडी के फ्रीडिश कनेक्शन हैं। मोटा अनुमान है कि केवल दूरदर्शन के चैनलों तक पहुंच रखने वाले 80 लाख घर भी हैं। इसके अलावा इंटरनेट प्रोटोकॉल टीवी वाले घर भी हैं। इन सबको जोड़कर सही आंकड़ा सामने आता है। 120 दिन बनाम बीती रात में सक्रिय कनेक्शन की बहस कुछ वैसी ही है जैसे प्रिंट मीडिया में कुल पाठक संख्या (पिछले महीने अखबार पढऩे वाले) बनाम औसत प्रतियां पाठक संख्या (कल अखबार पढऩे वाले) की बहस है। कुल पाठक संख्या औसत प्रतियां पाठक से अमूमन तीन-चौथाई अधिक होती है। हालांकि विज्ञापनदाता औसत प्रतियां पाठक संख्या को ही मानक मानते हैं। डीटीएच उद्योग को शुद्ध सक्रिय ग्राहक का पैमाना बहुत पहले ही छोड़ देना चाहिए था।
 
दूसरा सवाल, अगर इतने ग्राहक नदारद हैं तो फिर 1.8 करोड़ ग्राहक कहां हैं? यह रिपोर्ट इस बिंदु पर आंशिक रूप से सही है। नया शुल्क आदेश आने के बाद चैनलों के शुल्क में 40-400 फीसदी वृद्धि हुई है। ऐसे में कुछ घरों ने नि:शुल्क डीटीएच या सस्ता केबल कनेक्शन ले लिया या फिर ओवर-द-टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर चले गए या एकदम निष्क्रिय ही हो गए। याद रखें कि कई घरों में छुट्टियों, परीक्षाओं या फिर अन्य कारणों से टेलीविजन देखना बंद हो जाता है। लेकिन इस दावे पर चर्चा हो सकती है कि अधिकतर दर्शकों ने टीवी देखना ही बंद कर दिया है या ट्विटर पर उसे कॉर्ड कटिंग के तौर पर पेश किया जाता है। इस तथ्य पर गौर कीजिए- 1.8 करोड़ घरों का मतलब है कि करीब 7.6 करोड़ लोग दायरे से बाहर चले गए हैं। अगर 83.6 करोड़ टीवी दर्शकों में से 7.6 करोड़ लोगों ने टीवी देखना बंद कर दिया है तो फिर टीवी दर्शकों की संख्या में भारी गिरावट आनी चाहिए थी। लेकिन इस साल के पहले 39 हफ्तों में दर्शकों की संख्या 2018 की समान अवधि के आंकड़े से आगे निकल चुकी है।
 
आख्यानों के आंकड़े तो कुछ और ही कहानी कहते हैं। ट्राई के शुल्क आदेश में चैनलों एवं बुके को चुनने में कई तरह की शर्तें एवं पाबंदियां लगाई गई हैं। 10.5 करोड़ घरों में कनेक्शन देने वाले केबल ऑपरेटरों के पास ऐसी लोचशीलता एवं क्रियाशील सुविधा है कि करोड़ों ग्राहकों को एक-एक चैनल चुनने की सुविधा दे सकें। इससे हताश होकर उपभोक्ता डीटीएच प्लेटफॉर्म का रुख कर रहे हैं। तीसरा सवाल, टेलीविजन या अखबारों से मिलने वाली किसी भी बुरी खबर को लेकर इतना बेखबर उल्लास क्यों देखा जाता है?
 
भारत दुनिया में डिजिटल के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है लेकिन सारा मीडिया साथ-साथ बढ़ रहा है, कुछ अधिक तो कुछ कम। अखबार अब भी मीडिया उद्योग के सबसे लाभदायक क्षेत्रों में से एक है लेकिन पाठक संख्या में वृद्धि की दर धीमी पड़ रही है। टीवी दर्शक, कनेक्शनों की संख्या और राजस्व सबकी वृद्धि दो अंकों में हो रही है। ब्रॉडबैंड कनेक्शन वाले 59.4 करोड़ भारतीय रोजाना 50 मिनट तक ऑनलाइन वीडियो देखते हैं। यह 83.6 करोड़ भारतीयों द्वारा टीवी देखने में बिताए जाने वाले औसतन 3.45 घंटे के समय से काफी पीछे है। ध्यान रखें कि फिल्मों ने उस साल बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया है जब ओटीटी ने भी रफ्तार पकड़ा है। लिहाजा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की बढ़त पूरक साबित हुई है, स्वभक्षी नहीं।
 
ऐसे में डिजिटल के हाथों दूसरे उद्योगों को निगलते हुए देखने की इतनी जरूरत क्यों है? अगर भविष्य में ऐसा होने की संभावना देख आप रोमांचित होते हैं तो फिर इसके बारे में सोचिए। दुनिया के डिजिटल विज्ञापन राजस्व के तीन-चौथाई से भी अधिक हिस्सा गूगल एवं फेसबुक युगल के नियंत्रण में है। क्या भारतीय मीडिया बाजार को भी ऐसा ही हो जाना चाहिए?
Keyword: media, DTH, TV, social media,,
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