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पुराने बनाम नए बुर्जुआ की बहस में उलझा देश

श्याम सरन /  October 11, 2019

परिसंपत्ति निर्माण करने वालों की बुराई और नागरिकों पर ठप्पा लगाना राजनीतिक रूप से लाभदायक हो सकता है लेकिन देश के भविष्य के लिए यह सही नहीं होगा। विस्तार से बता रहे हैं श्याम सरन 

 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मौजूदा सरकार लगातार खुद को पिछली सरकारों से अलग बताती रही है। यहां तक कि उसने अपने आपको अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा की पिछली सरकार से भी अलग दर्शाया है। यह सरकार एक नव राजनीतिक बुर्जुआ के रूप में सामने आई है जो अधिक समकालीन, विश्वसनीय और देसी सामाजिक और सांस्कृतिक भारतीय यथार्थ का प्रतिनिधित्व करती है। इसे इस बात से महसूस किया जा सकता है कि यह सरकार सचेत ढंग से और जानबूझकर सामाजिक और आर्थिक प्रगति के मामले में अंग्रेजी भाषा और शिक्षा का अनादर करती है। उसमें उच्च वर्गीय शिक्षण और अनुभव से प्राप्त पेशेवर विशेषज्ञता और कौशल को लेकर निरंतर संदेह का भाव बना रहता है, खासतौर पर अगर इनका प्रदर्शन अंग्रेजी भाषा में किया जाए। परंतु अंतरिक्ष और नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में देश की सफलता को देखें तो वह पुराने बुर्जुआओं द्वारा किए गए दूरदर्शी सामूहिक निवेश का नतीजा है। अंग्रेजी भाषा में पकड़ के बिना यह संभव नहीं था। इन पुराने बुर्जुआ ने जो संस्थान, मानक और प्रक्रियाएं तय किए थे उन्हें नष्ट किया जा रहा है या बदला जा रहा है और नया संगठनात्मक ढांचा और मानक तय किए जा रहे हैं। ये नए मानक और ढांचे ऐसे हैं जो नए उभरते बुर्जुआ वर्ग के साथ तालमेल बिठा सकें।
 
परंतु हमें वैकल्पिक मॉडल के बारे में कोई अंदाजा नहीं है। नए संस्थान और मानकों को अपनी जड़ें जमाने में वक्त लगता है। निश्चित तौर पर एक दौर तदर्थ प्रावधानों और विवेकाधीन निर्णय प्रक्रिया का भी होता है। उदाहरण के लिए कैबिनेट सचिव की अफसरशाही के मुखिया और अफसरशाही के विभिन्न अंगों के बीच समन्वयक की संवैधानिक भूमिका खत्म की जा चुकी है। प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों को अब कैबिनेट दर्जा हासिल है। जाहिर है ऐसे में कैबिनेट सचिव का कद घटा है। सशस्त्र बलों की बात करें तो अतीत में जो मानक सख्ती से प्रवर्तित किए गए थे उन्हें खारिज किया जा रहा है। 
 
वरिष्ठ कमांड ऑफिसर ने सार्वजनिक रूप से सामने आकर ऐसी घोषणाएं करनी शुरू कर दी हैं जो प्रयोजनमूलक आवश्यकताओं से परे हैं। हमारा सामना विरोधाभासी परिस्थितियों से होता है जहां एक ऐसी सरकार जो मजबूत नेतृत्व और बेहतर प्रदर्शन क्षमता के कारण खुद पर गर्व करती है लेकिन उसमें सुसंगतता की कमी भी नजर आ रही है। इसकी ताकत रणनीतिक चपलता, संवाद की कुशलता और सार्वजनिक बहस में उसकी प्रवीणता है। परंतु संस्थानों के कमजोर होने, दूरगामी नीति तैयार करने को लेकर धैर्य न होने और अक्सर हकीकत से कोसों दूर लक्ष्य तय करने के चलते राष्ट्रीय हित में भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। मौजूदा राजनीतिक प्रतिष्ठान लगातार मंदी की ओर बढ़ती अर्थव्यवस्था और कम होते रोजगार पर से जनता का ध्यान हटाने में कामयाब रहा है। इसके लिए जबरदस्त जनसंपर्क अभियान की सहायता ली गई है। इस बहस में 'लुटियन में रहने वाले बुर्जुआ', 'खान मार्केट गैंग' और 'सीमापार के दीमक' आदि केंद्र में आ गए हैं जो देश को खोखला कर रहे हैं। अल्पसंख्यकों के बारे में प्रचारित किया गया है कि वे हमारे पश्चिमी शत्रु के साथ विश्वासघाती सहानुभूति रखते हैं। ऐसे निराशावादियों का भी जिक्र किया जाता है जो इस सरकार की उपलब्धियों को कभी स्वीकार नहीं करते। 
 
जम्मू कश्मीर में सरकार ने जिस तरह बदलाव किए हैं उनसे इस सरकार को तात्कालिक राजनीतिक लाभ मिले हैं। गलती करने की जरूरत नहीं है, जम्मू कश्मीर की राजनैतिक और संवैधानिक स्थिति में जो बदलाव किया गया है उसे लेकर चिंता के बजाय आम जनता में सराहना का भाव है। वहां देश के नागरिकों के साथ जो कुछ हो रहा है, उसके बारे में कोई यह नहीं सोच रहा कि संवैधानिक व्यवस्था और संस्थागत सीमाओं से परे परिस्थितियों में ऐसा हमारे साथ भी हो सकता है। राजनीतिक विचलन की यह नीति कब तक कारगर रहेगी? शायद लंबे समय तक लेकिन इसमें मौजूदा विरोधाभास इसे अस्थायी भी बनाता है। सरकार का लक्ष्य है देश को विश्व समुदाय में अग्रणी स्थान दिलाना। उसे शक्ति और प्रतिष्ठा संपन्न देश बनाना और नागरिकों को पूरे विश्व में सम्मान दिलाना। हालांकि अतीत की कमियों को बार-बार याद करना बेहतर भविष्य की गारंटी नहीं है हालांकि इससे आत्मविश्वास जरूर आ सकता है। माओ के काल में चीन का उदय हुआ होगा लेकिन उसकी मौजूदा शक्ति सीखने और विकसित देशों से निरंतर सबक लेने से आई है। लाखों चीनी छात्र और विद्वान इसलिए अंग्रेजी सीखते हैं ताकि वे बेहतरीन वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान हासिल कर सकें। चीन ने अतीत में जो हासिल किया उसके प्रति गौरवबोध था और उसके पास उपलब्धियों की भी कमी नहीं थी। इसे जानने के लिए जोसफ नीधम को पढऩा श्रेयस्कर होगा। परंतु आज की दुनिया अलग है और हमें यह मानना होगा कि हमें लंबे समय तक दूसरों से ज्ञान लेना होगा भले ही हम ज्ञान के उत्पादक बनने की आकांक्षा में रहें। 
 
इस राष्ट्रीय प्रयत्न के आयोजन में अंग्रेजी भाषा के साथ करीबी और सीखने के उन्नत केंद्रों तक पहुंच (भले ही सीमित वर्ग) महत्त्वपूर्ण परिसंपत्ति है जिसका समझदारीपूर्वक लाभ लिया जाना चाहिए।  प्रधानमंत्री मोदी को प्रवासी भारतीयों के बीच अपार लोकप्रियता हासिल है। हमें हाल ही में ह्यूस्टन में इसका नमूना देखने को मिला। लेकिन क्या अमेरिका, ब्रिटेन अथवा ऑस्ट्रेलिया के प्रवासी पुराने भारतीय बुर्जुआ हैं या नए? उन्होंने जो हासिल किया है क्या वह अंग्रेजी भाषा को नकार कर हासिल किया जा सकता था? और क्या उन देशों में उनका स्वागत इसलिए नहीं हुआ कि वे साझा राजनीतिक मूल्यों और संस्थानों वाले देशों से आते हैं?
 
पुराने और नए बुर्जआ की बहस देश को शक्तिशाली बनाने के तय लक्ष्यों को हासिल करने की राह में बाधा बन रही है। सरकार को प्रतिभाओं को आगे बढ़ाना चाहिए और नागरिकों के कौशल और ऊर्जा को सकारात्मक ढंग से बढ़ावा देकर लक्ष्य हासिल करना चाहिए। नागरिकों का नामकरण करके, उन्हें राष्ट्रवादी और राष्ट्रद्रोही में बांटकर देखना, परिसंपत्ति निर्माताओं की आलोचना करने जैसी रणनीति राजनीतिक रूप से कारगर हो सकती है लेकिन यह देश के भविष्य के लिए कतई नुकसानदेह है। 
Keyword: narendra modi, BJP, economy,,
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