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निजीकरण की राह

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  October 11, 2019

इस समय निजीकरण पर जोर है। रेलवे स्टेशन और रेलगाडिय़ां, हवाई अड्डे, कंटेनर कॉर्पोरेशन, शिपिंग कॉर्पोरेशन, राजमार्ग परियोजनाएं, एयर इंडिया, भारत पेट्रोलियम इन सभी का तथा अन्य संस्थानों का भी निजीकरण होना है। यहां हम विनिवेश नहीं बल्कि पूर्ण निजीकरण की चर्चा कर रहे हैं। यानी स्वामित्व में बदलाव। पिछली बार ऐसा वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में अरुण शौरी ने किया था। ऐसा लग रहा है कि आखिरकार प्रधानमंत्री मोदी अपनी कही उस बात पर अमल करने जा रहे हैं कि सरकार का काम कारोबार करना नहीं है। 

 
इसके लिए तमाम प्रेरक वजहें हो सकती हैं। उदाहरण के लिए सकारात्मक कदम उठाने की सरकार की प्रतिष्ठा बहाल करना। दरअसल 2016 की नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर के कमजोर क्रियान्वयन से ऐसी धारणा बन गई थी कि मंदी के लिए ये कदम भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं। एक अन्य लक्ष्य बढ़ते राजकोषीय घाटे को कम करना भी हो सकता है। सरकार एक के बाद एक नए व्यय कार्यक्रमों की घोषणा कर रही है और कर रियायतें प्रदान की जा रही हैं। एक ओर जहां व्यय बढ़ा है, वहीं कर राजस्व में कमी आई है। इससे पहले कि राजकोषीय अंतर शर्मिंदा करने वाले स्तर पर पहुंचे, कहीं न कहीं से तो धन जुटाना होगा। भारतीय रिजर्व बैंक को एकबारगी हस्तांतरण करने पर मजबूर किया गया लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। ऐसे में निजीकरण उपयोगी हो सकता है लेकिन दिक्कत यह है कि अभी आधे से अधिक वित्त वर्ष बाकी है और जिन सरकारी परिसंपत्तियों की बिक्री की घोषणा की भी गई है, वह मार्च के अंत तक पूरी होती नहीं दिखती। 
 
बहरहाल, चाहे जो भी हो, निजीकरण का स्वागत है। राजकोषीय शुद्घतावादी कहेंगे कि मौजूदा व्यय की पूर्ति के लिए परिसंपत्तियों की बिक्री करना उचित नहीं है। वैसे ही जैसे किसानों या स्वास्थ्य बीमा योजना पर व्यय की प्रक्रिया निरंतर नहीं चल सकती। कभी न कभी तो बिक्री के लिए उपलब्ध परिसंपत्ति समाप्त हो जाएगी। हालांकि वह अभी दूर की संभावना है और सकारात्मक रूप से देखें तो निजी कारोबारियों द्वारा संपत्ति के व्यवस्थित इस्तेमाल के अपने लाभ हैं। निजीकरण के पीछे वास्तविक दलील भी यही है। 
 
क्या यह कारगर साबित होगा? यह कारगर हो सकता है बशर्ते कि सरकार बिक्री या लीज की शर्तें समझदारीपूर्वक तय करे। वरना एयर इंडिया जैसी स्थिति बन सकती है। जहां तक खरीदारों की बात है तो यह सच है कि अधिकांश देसी कारोबारी घराने अभी नकदी खर्च करने के मिजाज में नहीं हैं। वे कर्ज कम करने पर केंद्रित हैं। इसके अलावा कई स्थापित कारोबारियों की निवेश करने की क्षमता दिवालिया प्रक्रिया के कारण बुरी तरह प्रभावित हुई है। ऋण के बदले जारी किए गए शेयर एकदम मिट्टी के मोल बिक रहे हैं। अनिल अंबानी, रुइया बंधु, सुभाष चंद्रा और अन्य कारोबारी यह झेल चुके हैं जबकि गौतम थापर और रैनबैक्सी से जुड़े रहे सिंह बंधुओं को वित्तीय पूंजी के साथ-साथ सामाजिक साख भी गंवानी पड़ी है। दूसरी ओर बीते कुछ वर्षों के दौरान हालात ऐसे बने हैं कि कुछ कंपनियों के पास पर्याप्त नकदी और ज्यादा ऋण लेने की गुंजाइश है लेकिन वे खपत में धीमापन आने के कारण निवेश नहीं कर रहे। नया कारोबार शुरू करने या खराब परिसंपत्ति खरीदने के लिए उन्हें पैसे खर्च करने पड़ सकते हैं। इसके अलावा कुछ अंतरराष्ट्रीय हित भी जुड़े हो सकते हैं। 
 
इन बातों का राजनीतिक जोखिम भी है। आरएसएस प्रमुख ने इस नीति के कुछ पहलुओं को लेकर चेतावनी दी है। श्रम संगठनों द्वारा भी असंतोष दर्ज किया जा रहा है। मोदी सरकार ऐसे प्रतिरोध से पार पाने में सक्षम है लेकिन उसे अपनी प्रतिष्ठा को उत्पन्न जोखिम को भी ध्यान में रखना होगा। भारत समेत कई देशों में निजीकरण के साथ विवाद जुड़े रहते हैं। जब लंबे समय की लीज जैसे जटिल वित्तीय मसलों पर जल्दबाजी में बिना मशविरे के निर्णय लिया जाए तो विवाद उत्पन्न होते हैं। हवाई अड्डों को अदाणी समूह को देना इसका उदाहरण है। 
 
इस बीच यह स्पष्ट नहीं है कि पूरा ध्यान परिवहन क्षेत्र पर क्यों केंद्रित है? निजीकरण की प्रक्रिया जहां प्रधानमंत्री कार्यालय और नीति आयोग की निगरानी में है और नितिन गडकरी और पीयूष गोयल के रूप में दो अत्यंत जीवंत मंत्री परिवहन से जुड़े क्षेत्रों के प्रभारी हैं। लेकिन यह कोई वजह नहीं है कि सरकार अन्य क्षेत्रों की संकट से गुजर रही सरकारी इकाइयों के निजीकरण पर ध्यान न दे। खासतौर पर घाटे में चल रही दोनों सरकारी दूरसंचार कंपनियां जिनमें सुधार की उम्मीद नहीं। इसके अलावा सरकारी बैंकों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए जो बीते पांच सालों में जनता के 2 लाख करोड़ रुपये पचा चुके हैं। 
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