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चीन को तगड़ी वृद्धि की चुकानी पड़ी कीमत: मोहंती

आदिति फडणीस /  October 10, 2019

दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर मनोरंजन मोहंती की हाल में आई पुस्तक 'चाइनाज ट्रांसफॉर्मेशन : दी सक्सेस स्टोरी ऐंड दी सक्सेस ट्रैप' की व्यापक प्रशंसा हुुई है। उन्होंने इस पुस्तक में चीन के पिछले 70 वर्षों की समीक्षा की है। आदिति फडणीस से उनकी बातचीत के अंश : 

 
चीन के इन 70 वर्षों से भारत क्या सीख सकता है?
 
विकास का खुद का रास्ता चुनें। इतिहास से सीखें, लेकिन बदलाव की ऐसी रणनीति बनाएं, जो आपकी परिस्थितियों से मेल खाती है। चीनी जनवादी गणराज्य अपनी 70वीं वर्षगांठ मना रहा है। ऐसे में भारत के बहुत से लोग सोचते हैं कि चीन के सुधारों के रास्ते पर चलने के लिए भारत और अन्य विकासशील देशों को प्रेरित होना चाहिए। लेकिन यह एक गलती होगी। चीन ने सात दशकों के सामाजिक सुधारों, विशेष रूप से पिछले 40 वर्षों के सुधारों के तहत सरकार की अगुआई में बाजार सुधारों का मॉडल अपनाया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि चीन ने शानदार आर्थिक सफलता हासिल की है, विशेष रूप से गरीबी उन्मूलन लोगों का जीवन स्तर सुधारने, विश्व स्तरीय बुनियादी ढांचा खड़ा करने, अत्यधिक औद्योगिक एवं सैन्य ताकत और वैश्विक प्रभाव हासिल करने के क्षेत्र में। हर चीनी को इस उपलब्धि पर गर्व है और पूरी दुनिया को इसके लिए चीन को बधाई देनी चाहिए। लेकिन चीन को उपलब्धि की कीमत चुकानी पड़ी है। वहां असमानता बढ़ी है, पर्यावरण बिगड़ा है, सामाजिक अलगाव बढ़ा है और नागरिक स्वतंत्रताएं लुप्त हो गई हैं।  वैश्विक और चीनी मीडिया ने चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के 1 अक्टूबर के भाषण में सबसे ज्यादा इस पंक्ति को उद्धृत किया था, 'कोई भी ताकत चीन के दर्जे को कम नहीं कर सकती या चीन के लोगों और राष्ट्र को आगे बढऩे से रोक सकती है।' चीन का यह शीर्ष नेता अपने देश के राष्ट्रवाद को सख्त शब्दों में बयां कर रहा था और दुनिया के सामने चुनौती पेश कर रहा था।  क्या भारत को ऐसे राष्ट्रवाद की राह पर चलना चाहिए? बहुत से भारतीय इसके पक्ष में हो सकते हैं। लेकिन क्या रवींद्रनाथ ठाकुर और महात्मा गांधी यह नजरिया रखते थे? उन्होंने राष्ट्रवाद और औद्योगीकरण के पश्चिमी मॉडल को खारिज कर दिया था। उन्होंने एक लोकतांत्रिक, बहुलवादी, समतावादी, संघीय, पर्यावरण अनुकूल और नैतिक भारत की उम्मीद की थी, जहां सभी लोगों, समूहों एवं क्षेत्रों के लिए शांति, समानता और स्वतंत्रता मुख्य निर्देशक सिद्धांत होंगे। 
 
भारत की तरह चीन में भी अफसरशाही बहुत विशाल एवं जटिल है, लेकिन इस अफसरशाही के संगठन के सिद्धांत भारत से बहुत अलग हैं। अफसरशाही और उसके साथ पैदा होने वाली भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं को लेकर आपका क्या मत है? 
 
भारत और चीन में राजनीतिक और प्रशासनिक प्रणाली में एक चीज समान है, लेकिन दो बड़े अंतर भी हैं। भारत में बहुदलीय लोकतंत्र और चीन में कम्युनिस्ट पार्टी की एक दल के शासन के बावजूद लोक सेवा, सुरक्षा ढांचा और वित्तीय संसाधनों के जरिये केंद्रीकृत नियंत्रण दोनों शासन प्रणालियों में समान है। दोनों देशों में अंतर प्रतिस्पर्धी दलीय व्यवस्था और न्यायपालिका एवं मीडिया की भूमिका के स्तर पर है।  भारत में राज्यों में सत्तारूढ़ विभिन्न दल अपनी-अपनी नीतियां लागू कर सकते हैं। नागरिक अदालतों और मीडिया से संपर्क साध सकते हैं। लेकिन इन अंतरों से दोनों ही देशों में भ्रष्टाचार की गुंजाइश खत्म नहीं होती है। 
 
चीन को जिस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में क्या वह राष्ट्रीयता को लेकर अपनी नीति में बदलाव करेगा? 
 
इस बात के आसार नहीं हैं कि शी चिनफिंग नेतृत्व शिनच्यांग और तिब्बत को लेकर अपनी नीति में बदलाव करेगा। शिनजियांग में प्रदर्शनकारियों पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई की गई। इसके साथ ही एक तरफ व्यापक शिक्षा शिविर शुरू किए हैं, दूसरी तरफ शिनच्यांग में विकास परियोजनाओं में निवेश बढ़ाया गया है। विदेश में इन शिविरों को 'बंदी शिविर' करार दिया गया। लेकिन अगर यह सही है कि कुछ समय तक 'कौशल प्रशिक्षण' देने के बाद शिविरों को बंद कर दिया गया और लोगों की विभिन्न नौकरियों में नियुक्ति से पहले ही उन्हें घर भेज दिया गया तो यह अपने आप में एक नई पहल है। लेकिन शिनच्यांग और तिब्बत को अहम राजनीतिक स्वायत्तता देने का कोई संकेत दिखाई नहीं पड़ रहा है। 
 
राष्ट्रपति शी चिनफिंग के समक्ष एक बड़ी चुनौती बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) को सफल बनाना है। उन्हें वित्तीय एवं परिचालन चुनौतियों और बहुत से देशों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में बीआरआई का क्या भविष्य है?
 
अब बीआरआई चिनफिंग की योजना एक अहम हिस्सा है। यह पीआरसी के संविधान का एक हिस्सा है और इसे चीन के बुद्धिजीवियों ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एक नए ढांचे के रूप में पेश किया है। बीआरआई फोरम की 2017 और 2019 में दो बैठक हो चुकी हैं। वर्ष 2019 की बैठक में 23 देशों के शासनाध्यक्षों समेत 130 देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा था, जो इसके महत्त्व को स्पष्ट रूप से बयां करता है। 
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को चीन से होने वाली दिक्कतों को 'दांत का दर्द' बताया है। ऐसा लगता है कि उनका इशारा सीमा विवाद की तरफ था। क्या आपको लगता है कि इसका समाधान होगा? 
 
चीनी प्रेस की खबरों में चीन के 70वें राष्ट्रीय दिवस पर विदेशी नेताओं के बधाई संदेशों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदेश को सबसे ऊपर जगह दी गई, यहां तक कि राष्ट्रपति पुतिन के बधाई संदेश से भी ऊपर। मोदी और शी केबीच महाबलीपुरम में दूसरी अनौपचारिक बैठक से भारत और चीन के बीच तेजी से संबंध सुधरने की नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं। 
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