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फैसला लेने की प्रक्रिया में क्यों होनी चाहिए ज्यादा सहभागिता?

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  October 10, 2019

नरेंद्र मोदी सरकार का छठा साल चल रहा है और आर्थिक नीति निर्माण की उसकी शैली में एक ऐसा रुझान दिखता है जो समस्याग्रस्त होने के साथ-साथ हैरानी भी पैदा करता है। सरकार फैसला लेेने की प्रक्रिया की अपनी कमजोरी को पहचानने में नाकाम है और इस कारण उसके प्रतिकूल प्रभावों को कम या खत्म करने में भी असफल है। इस समस्या की जड़ मोदी सरकार की यह नाकामी है कि वह एक कारगर आर्थिक सलाहकार और नीतिनिर्माता टीम नहीं बना पाई। इसकी कमी अब ज्यादा खल रही है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी की चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार के पास आर्थिक सलाहकार परिषद नहीं है या उसके पास वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार नहीं है या आर्थिक मंत्रालयों में बैठे सचिव समक्ष नहीं है। सलाहकार संस्थाएं मौजूद हैं और आर्थिक मंत्रालयों में बैठे अधिकारियों के पास आर्थिक नीतियों के क्रियान्वयन के लिए जरूरी अनुभव और क्षमता है।

 
लेकिन इन सबको एक तरह से निष्प्रभावी बना दिया गया है। इसकी वजह यह है कि मोदी सरकार उन लोगों की सलाह नहीं सुनती है जिन्हें अर्थव्यवस्था पर नजर रखने और आर्थिक नीति के उपाय सुझाने का काम सौंपा गया है। निर्णय लेने की प्रक्रिया काफी हद तक केंद्रीकृत बनी हुई है। जब अहम आर्थिक मंत्रालयों के शीर्ष अधिकारियों से सलाह मशविरा किया जाता है तो माहौल प्रस्ताव पर चर्चा या असहमति का नहीं होता है। इसके बजाय वरिष्ठ अधिकारियों की मानसिकता ऊपर से आने वाले हर प्रस्ताव को मंजूरी देने की है।
 
सरकार के कई आर्थिक सलाहकार किनारा कर चुके हैं। लेकिन सरकार की सलाहकार व्यवस्था में कोई सुधार नहीं आया है। शायद नए सलाहकार इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि उन्हें सीमित भूमिका निभानी है। स्वाभाविक है कि इस स्थिति में सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्री सरकार को आर्थिक नीति पर सलाह देने के लिए आगे नहीं आएंगे। अहम आर्थिक मंत्रालयों में कई वरिष्ठ सचिवों की भी यही सोच है। आर्थिक नीति निर्माण में इस तरह की स्थिति सरकार की राजनीतिक एजेंडे को लागू करने की क्षमता के प्रतिकूल है। जिस तरह सरकार ने जम्मू-कश्मीर से संबंधित अनुच्छेद 370 को संशोधित किया और राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित किया, वह सरकार की अग्रिम योजना, इससे पैदा होने वाली स्थिति को संभालने की तैयारी और व्यवस्था के प्रबंधन का उदाहरण है। संभव है कि जिस तरह यह इस योजना पर अमल किया गया या व्यवस्था को संभाला गया, उससे आप सहमत न हों लेकिन सरकार ने कभी भी अपने राजनीतिक जनादेश से ध्यान नहीं हटाया। जिस तरह सरकार नागरिकता कानून में संशोधन कर रही है या राष्ट्रीय नागरिक पंजी को लागू कर रही है, उसमें भी यह सोच देखी जा सकती है।
 
इसकी तुलना सरकार द्वारा अपनी प्रमुख आर्थिक नीतियों को लागू करने के तरीके से कीजिए और आपको अंतर पता चल जाएगा। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का क्रियान्वयन बड़ी आर्थिक दिक्कत बन रही है क्योंकि न तो इसे अच्छा और सरल कर बताया जा रहा है और न ही इससे केंद्र और राज्यों को उम्मीद के मुताबिक राजस्व मिल रहा है। इससे एक बड़ी चुनौती यह पैदा हुई है कि इसके अनुपालन का बोझ लाखों कारोबारियों और छोटे उद्यमियों पर डाल दिया गया जो कभी भी अपने लेनदेन का रिकॉर्ड रखने के आदी नहीं रहे हैं। 
 
कर व्यवस्था में सुधार से ज्यादा, जीएसटी से यह उम्मीद की जा रही थी कि इससे करदाताओं के व्यवहार में आमूलचूल बदलाव आएगा। भारतीय व्यापारियों और छोटे उद्यमियों से अनुपालन के स्तर में इस तरह की छलांग की उम्मीद करना ज्यादा महत्त्वाकांक्षी विचार था। जीएसटी के क्रियान्वयन से महज आठ महीने पहले ही उन्हें नोटबंदी का अतिरिक्त दबाव झेलना पड़ा था। सरकार की यह उम्मीद कि असंगठित क्षेत्र के सारे कारोबारी शत प्रतिशत इस व्यवस्था को अपनाएंगे, गलत थी। उन्हें जीएसटी अपनाने के लिए ज्यादा समय की जरूरत थी क्योंकि भारतीय कारोबारियों और छोटे उद्यमों का मौजूदा अनुपालन स्तर बहुत खराब था। 
 
जीएसटी लागू होने के बाद अर्थव्यवस्था अभी स्थिर भी नहीं हुई थी कि सरकार ने एकल इस्तेमाल प्लास्टिक पर प्रतिबंध के संकेत दे दिया है। लगता है कि हाल के दिनों में सरकार ने इस पर पुनर्विचार किया है लेकिन इससे एकल इस्तेमाल प्लास्टिक का उत्पादन, आपूर्ति और इस्तेमाल करने वाले छोटे उद्यमियों पर भारी असर पड़ा है। उदाहरण के लिए हलोल में हजारों छोटी इकाइयों में अनिश्चितता की स्थिति है क्योंकि उन्हें आशंका है कि एकल इस्तेमाल प्लास्टिक पर जल्दी ही प्रतिबंध लग सकता है। 
 
ऐसा नहीं है कि सरकार को करदाताओं के अनुपालन स्तर में सुधार के लिए बड़े आर्थिक नीतिगत बदलाव नहीं लाने चाहिए या पर्यावरण को नुकसान से बचाने के लिए प्लास्टिक के इस्तेमाल को हतोत्साहित नहीं करना चाहिए। इन बदलावों की जरूरत है और इसका उद्देश्य सराहनीय है। लेकिन आर्थिक नीति निर्माण का मतलब केवल साहसिक घोषणाएं करना नहीं है। इसके लिए पर्याप्त अग्रिम योजना और विभिन्न पक्षों के बीच सलाह मशविरे की जरूरत होती है जिसमें विशेषज्ञ और सरकार के अपने सलाहकार तथा अफसरशाह भी शामिल हैं।
 
इस दिशा में पहला कदम निर्णय लेने में केंद्रीकृत व्यवस्था में कटौती होगा। सरकार के सलाहकारों और अफसरशाहों को विभिन्न प्रस्तावों पर अपनी राय रखने की आजादी होनी चाहिए। नीति निर्माण में अहम मंत्रालयों को ज्यादा कारगर भूमिका दी जानी चाहिए जो मंत्रिमंडल को अपना फीडबैक दे सकते हैं। अर्थव्यवस्था में सुस्ती के संकेत हैं और उसमें तेजी के उपायों पर फैसला लेने में गलती की कोई गुंजाइश नहीं है। ज्यादा भागीदारी वाली निर्णय लेने की प्रक्रिया में गलतियों की गुंजाइश कम होगी।
Keyword: narendra modi, economy, GST, plastic,,
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