बिजनेस स्टैंडर्ड - कृषि और छोटे उद्योगों के पास उच्च वृद्धि की कुंजी
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कृषि और छोटे उद्योगों के पास उच्च वृद्धि की कुंजी

नितिन देसाई /  October 10, 2019

बड़ी कंपनियों को राहत देने से आर्थिक वृद्धि की रफ्तार तेज करने में मदद मिलने की संभावना कम है। इसके लिए कृषि एवं छोटे उद्योगों में व्यापक सुधार की जरूरत है। बता रहे हैं नितिन देसाई

 
कॉर्पोरेट कर में की गई हालिया कटौती ने शेयर बाजार को उत्साह से भर दिया है लेकिन यह भारतीय अर्थव्यवस्था को पांच लाख करोड़ डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए वृद्धि दर के जरूरी स्तर के करीब भी नहीं है। कॉर्पोरेट कर में कटौती से आय बढ़ेगी लेकिन उससे निवेश को बढ़ावा नहीं मिलेगा जब तक कि कंपनियों को मांग बढऩे के स्पष्ट संकेत न दिखें। बुनियादी उपभोक्ता उत्पादों की मांग बढ़ाने का स्वाभाविक तरीका यह है कि रोजगार गारंटी योजना मनरेगा पर खर्च बढ़ाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पैसे डाले जाएं। अगर इसका मतलब एफआरबीएम के बजट गतिरोधों को तोडऩा ही है तो होने दीजिए। मुद्रास्फीति नियंत्रण की सनक ऐसी अर्थव्यवस्था में गलत है जहां बड़ा खतरा वृद्धि का बेपटरी होना और बढ़ती बेरोजगारी है। महंगे उपभोक्ता एवं पूंजीगत उत्पादों के मामले में राहत केवल तभी आएगी जब वृद्धि एवं रोजगार सृजन की स्थिति सुधरती है और ऋण बाजार की सेहत बेहतर होती है।
 
तात्कालिक मांग बढ़ाने पर जोर देने वाला कीन्स मॉडल अच्छा शुरुआती कदम माना जाएगा। लेकिन हमें सकल सावधि निवेश में वर्ष 2011-12 के शीर्ष स्तर की तुलना में आई पांच फीसदी गिरावट पर भी ध्यान देने की जरूरत है। इस गिरावट का बड़ा हिस्सा गैर-कॉर्पोरेट क्षेत्र का है। इस गिरावट में कुछ योगदान नोटबंदी एवं जीएसटी जैसे गतिरोधों का भी रहा है। लेकिन गिरावट का बड़ा कारण कृषि एवं छोटे उद्योगों के लिए हमारे नीतिगत प्रारूप का पुराना पड़ जाना है जो अब इन क्षेत्रों के विकास की संभावनाओं का दोहन कर पाने में सक्षम नहीं रह गया है। इन क्षेत्रों का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में योगदान करीब आधा है।  
 
हमारी कृषि नीति 1960 के दशक के मध्य में बनाई गई थी। उस समय हम खाद्यान्नों की भारी कमी से जूझ रहे थे। उसमें हरित क्रांति की तकनीकों का इस्तेमाल करने के लिए किसानों को मनाने पर जोर दिया गया था। चावल और गेहूं जैसे खाद्यान्नों की उदार मूल्यों पर सार्वजनिक खरीद का भरोसा दिलाया जाता था। लेकिन इस नीतिगत परिप्रेक्ष्य का अब कोई औचित्य नहीं है। साठ के दशक में आए बहुचर्चित सूखे से ऐन पहले भारत में चावल और गेहूं का प्रति व्यक्ति उत्पादन करीब 100 किलोग्राम था। वर्ष 2018-19 में यह बढ़कर 160 किलोग्राम प्रति व्यक्ति हो चुका है और गेहूं एवं चावल के भंडारों का बढ़ता आकार अधिक उत्पादन की तस्दीक करता है। 
 
बहरहाल साठ के दशक में गेहूं एवं चावल की उपज के लिए तगड़ा प्रोत्साहन देकर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की रणनीति आज के दौर में अपनी अहमियत खो चुकी है। गेहूं एवं चावल का अंशदान फसल के उपज मूल्य के एक तिहाई से भी कम है। गन्ने की बात करें तो चीनी मिलें अक्सर समय पर भुगतान नहीं करती हैं और सहकारी समितियां भी खरीदे गए दूध का भुगतान ठीक से नहीं करती हैं। इस तरह हमारे किसानों की उपज का करीब 80 फीसदी हिस्सा बाजार जोखिमों के अधीन होता है और वे उपज को मनचाही जगह पर बेचने से रोकने वाले कानूनों से भी बंधे हुए हैं। यह एकांगी व्यवस्था किसानों को हतोत्साहित करती है जिससे परेशान होकर कई बार वे पारिस्थितिकी के हिसाब से गलत फसल चुन लेते हैं और सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ा देते हैं।
 
कृषि नीति का जोर चुनिंदा फसल या आगत-केंद्रित दखल से हटकर व्यापक समर्थन पर होना चाहिए जो फसल और बागवानी से लेकर पशुधन को भी समाहित करे। कृषि शोध एवं विस्तार, बाजार ढांचे का विकास, कृषि प्रसंस्करण और भंडारण गतिविधियों में सभी फसलों एवं सभी क्षेत्रों को तवज्जो दी जानी चाहिए। यह कृषि एवं कृषि प्रसंस्करण में कंपनियों एवं परिवारों दोनों के निवेश को बढ़ावा देगा। हालांकि बड़ा बदलाव यह होगा कि अपनी उपज बेचने को लेकर किसानों पर लगी सभी तरह की पाबंदियां हटा दी जाएं। खरीदारों और संगठित कृषि प्रसंस्करण इकाइयों के बीच उपज खरीद के लिए प्रतिस्पद्र्धा होने पर उस उत्पाद की कीमतों में होने वाली उठापटक कम हो सकती है। ऐसा होने पर कृषि उपज खरीद को लेकर अधिक विश्वसनीय एवं स्थिर नीति बन सकेगी जबकि अभी सरकार हर मौसम में उपज की घट-बढ़ पर घबराहट में फैसले लेने लगती है। हालांकि इससे कृषि को सब्सिडी देने की जरूरत खत्म नहीं होगी क्योंकि दूसरे देशों में कृषि सब्सिडी जारी रहेगी। लेकिन इसका आधार कृषि उत्पादन में दी जाने वाली सब्सिडी न होकर आय समर्थन हो सकता है। 
 
विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्र में सक्रिय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम इकाइयों का जीडीपी में योगदान करीब 30 फीसदी है। सूक्ष्म इकाइयों में करीब 10.7 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है जबकि छोटी एवं मझोली इकाइयां 30 लाख रोजगार देती हैं। विनिर्माण, कारोबार एवं अन्य सेवा वर्ग में इनकी हिस्सेदारी एक-एक तिहाई है। खासकर कारोबार क्षेत्र की सूक्ष्म एवं लघु इकाइयां नोटबंदी की वजह से बुरी तरह प्रभावित हुई थीं क्योंकि उनका कारोबार मूलत: नकदी पर चलता था। कुछ महीनों बाद ये इकाइयां जीएसटी के सही तरीके से लागू नहीं होने से दोबारा प्रभावित हुईं। इसके चलते फौरी तौर पर कई इकाइयां बंद हो गईं। जीडीपी, निर्यात एवं रोजगार में इन इकाइयों की बड़ी हिस्सेदारी को देखते हुए उपभोग व्यय वृद्धि में सुस्ती, निर्यात ठहराव और पारिवारिक निवेश में गिरावट को काफी हद तक समझा जा सकता है।
 
हमारे कई छोटे उद्योग कर दायरे से बाहर रहने की वजह से न केवल बचे रहे बल्कि फले-फूले भी। लेकिन जीएसटी के आने के बाद ऐसा हो पाना काफी मुश्किल हो रहा है। छोटे उद्योगों को कर दायरे में लाना वांछनीय है लेकिन ध्यान इस रास्ते में आने वाली अड़चनें दूर करने पर होना चाहिए। लेकिन मुख्य ध्यान एक ऐसे नीतिगत प्रारूप पर होना चाहिए जो स्थायी रूप से छोटा बने रहने का ही पोषण न करती हो।  लघु उद्योग नीति ऐसे आग्रहों पर आधारित थी जो उन्हें बड़ा होने से हतोत्साहित करती थी। अच्छा प्रदर्शन कर रहे कई छोटे उद्यमी भी छोटे कारखानों की संख्या बढ़ाकर मिलने वाले लाभ को बढ़ाने का तरीका अपनाते थे। इन उत्पादों को मिलने वाले लाभ अब खत्म हो चुके हैं और कारखाना अधिनियम, दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम एवं श्रम कानूनों में नियामकीय विसंगतियां बरकरार हैं लेकिन छोटी इकाइयां अब भी छोटी ही बनी रहना चाहती हैं।
 
मानकों का पालन करने वाले कानूनों को स्वरोजगार में लगे लोगों के अलावा सब पर लागू किया जाए। बड़ी इकाइयों के मानकों में थोड़ी शिथिलता लाने और छोटी इकाइयों के मानकों को सख्त करने की जरूरत होगी। औपचारिक एवं अनौपचारिक क्षेत्र का विभेद इतिहास हो जाना चाहिए। कुछ मायनों में जीएसटी ऐसा कर रहा है। चुकाए गए कर का क्रेडिट मिलने से छोटी इकाइयां भी जीएसटी नेटवर्क में शामिल होने को बाध्य हो रही हैं। छोटे-बड़े अवरोध खत्म होने से कंपनियों के आकार का भी नया ढांचा उभरेगा जिससे आर्थिक सूझबूझ, छोटी इकाइयों के क्रेडिट प्रवाह में सुधार और गैर-कॉर्पोरेट उद्यम निवेश को बल मिलेगा। परिवार के स्तर पर किए जाने वाले निवेश में इसका बड़ा हिस्सा होता है। परिवारों की बचत एवं निवेश में सुधार हालात में बदलाव का लिटमस टेस्ट है।
 
उच्च वृद्धि की राह पर जाने के लिए निर्यात वृद्धि जरूरी है और वर्ष 2011-12 के बाद से निर्यात के स्थिर मूल्य होने से यह मुद्दा तात्कालिक अपरिहार्य बन जाता है। कुल निर्यात में 45-50 फीसदी अंशदान रखने वाले कृषि एवं छोटे उद्यमों के लिए आधुनिक एवं सुधरी नीति अपनाने से बड़ी मदद मिलेगी। निश्चित रूप से इसे व्यापार सहूलियत में दूसरे विशिष्ट सुधारों और वैश्विक प्रतिस्पद्र्धा पर केंद्रित विनिमय दर नीति की जरूरत पड़ेगी। सरल शब्दों में, हमें बड़ी कंपनियों से परे देखना होगा और अपने किसानों एवं छोटे उद्यमियों की वृद्धि संभावनाओं को नई उड़ान देनी होगी।
Keyword: agri, farmer, crop, share market,,
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