बिजनेस स्टैंडर्ड - नकली दवा पर नकेल
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नकली दवा पर नकेल

संपादकीय /  October 10, 2019

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के दिल्ली स्थित उप औषधि नियंत्रक को गत अगस्त में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने हिरासत में ले लिया था। उस अधिकारी पर दवाओं को अनुमति देने में भ्रष्ट तरीके अपनाने का आरोप था। उसके बाद केंद्र एवं राज्यों में औषधि नियंत्रण से जुड़े कई अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया गया है। खुद नियामक ने भी माना है कि उसे अपने कामकाज से जुड़े कुछ पहलुओं को दुरुस्त करने की जरूरत है। इसी वजह से नियामक संस्था में व्यापक पुनर्गठन के अलावा बड़े पैमाने पर अधिकारियों के स्थानांतरण भी साल के शुरू में किए गए थे। इसके बावजूद उपभोक्ता संरक्षण के पैरोकारों को पक्का यकीन है कि भारत में औषधि नियंत्रण दोषपूर्ण है और यहां पर नकली दवाओं की संख्या काफी अधिक है। इसके उलट छोटे दवा निर्माताओं का मानना है कि नियामक उनकी दवाओं को दोयम दर्जे का बताने पर आमादा है ताकि बड़े जेनेरिक दवा निर्माताओं को लाभ पहुंचाया जा सके। भारत के औषधि प्रशासन में व्याप्त अव्यवस्था का ही असर है कि किसी को भी नहीं मालूम है कि बाजार में बिक रही दवाएं कितनी भरोसेमंद हैं? कुछ आधिकारिक आंकड़े दावा करते हैं कि घटिया एवं नकली दवाएं स्टोर में उपलब्ध दवाओं के दो फीसदी से भी कम हैं। लेकिन इस दावे पर यकीन कर पाना खासा मुश्किल है। कई अफ्रीकी देशों में करीब एक तिहाई दवाएं नकली पाई जाती हैं। इन नकली दवाओं का बड़ा हिस्सा भारत से ही आयात होता है। 

 
ऐसे में अचरज नहीं है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अध्ययन में नकली दवाओं का बढ़ा हुआ आंकड़ा सामने आया है। लेकिन ऐसे स्वतंत्र अध्ययनों को भारतीय अधिकारी खारिज कर देते हैं। ऐसी स्थिति में पहला और सबसे अहम कदम नकली एवं कमतर दवाओं के बारे में वास्तविक स्थिति का सही अंदाजा लगाना होगा। यह देखना आसान है कि इस बारे में कोई स्पष्टता क्यों नहीं है? दवा नियामक और दवा कंपनियों को अपने-अपने क्षेत्रों में क्षमता के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाने के बारे में अधिक समझ से खास फायदा नहीं होगा। लेकिन एक व्यापक, पारदर्शी एवं सुप्रचारित सर्वेक्षण न केवल अपनी खूबियों के नाते अहम होगा बल्कि आम लोगों एवं राजनीतिक तबके को औषधि आपूर्ति शृंखला के व्यापक सुधार के लिए प्रेरित करने में भी काफी मददगार होगा। हालांकि इस बात पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता है कि ऐसी राजनीतिक ऊर्जा एवं निवेश लंबे समय से अपेक्षित है। जरा नकली दवा के दुष्परिणामों के बारे में सोचिए। नकली दवाओं पर असली दवा का लेबल चिपका होता है लेकिन उसमें कारगर अवयवों की मात्रा बहुत कम होती है। 
 
जब ऐसी दवा एंटीबायोटिक हो तो फिर जीवाणुओं के उत्परिवर्तन के संदर्भ में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर उसके परिणाम काफी गंभीर होते हैं। भारत के 'सुपरबग हॉटस्पॉट' होने के पीछे यह भी एक कारण है। डॉक्टर एंटी-बायोटिक दवाएं बार-बार लिखते हैं और अक्सर वे दोयम दर्जे की होती हैं। अगला कदम यह है कि दवाओं की आपूर्ति शृंखला से जुड़े हरेक कदम को अलग किया जाए और यह तय किया जाए कि समुचित नियामकीय क्षमता विकसित हो चुकी है और हरेक कदम पर नियमन लागू हो चुका है। यह पूछा जाना भी जरूरी है कि क्या राज्य एवं केंद्र के औषधि नियंत्रक अपनी क्षमता एवं मेहनत का दोहराव कर रहे हैं और क्या एक व्यापक पुनर्गठन एवं सुसंगतीकरण की जरूरत है? आखिर में, नियामकीय क्षमता में निवेश और नियामकों की स्पष्ट जवाबदेही तय करना भी बेहद जरूरी होगा। कई बार संदिग्ध अधिकारी नियामक का हिस्सा रहने के बाद जवाबदेही से बचने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय में लौट आते हैं। इस प्रवृत्ति पर रोक लगानी होगी। औषधि नियामक के पास समुचित संसाधन होने जरूरी हैं और इसमें स्टॉफ की तैनाती स्वास्थ्य मंत्रालय से स्वतंत्र की जानी चाहिए।
Keyword: pharma, medicine, CDSCO,,
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