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कर्मियों की नकारात्मकता दूर करती हैं अच्छी कंपनियां

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  October 09, 2019

आपने अपने वरिष्ठ अधिकारी के साथ अपने कार्य प्रदर्शन की समीक्षा संबंधी बातचीत खत्म की। आपका मूल्यांकन काफी अच्छा रहा और उसमें आपकी मजबूती और उपलब्धियों का जिक्र था। परंतु कुछ टिप्पणियां ऐसी हैं जहां आपके प्रदर्शन में सुधार की गुंजाइश बताई जाती है। आपका पूरा ध्यान इन्हीं टिप्पणियों में लग जाता है। अपने प्रदर्शन की समीक्षा में कही गई सकारात्मक बातों को लेकर प्रसन्न होने के बजाय आप चंद आलोचनात्मक टिप्पणियों को लेकर खिन्न और नाराज हो जाते हैं। या फिर अगर आप तमाम सहकर्मियों द्वारा मिली तारीफों के बारे में सोचें तो शायद उस पल के लिए आप एकदम मुग्ध हो जाएं लेकिन बाद में आप उसे भूल जाते हैं। अब जरा इसकी तुलना एक नकारात्मक टिप्पणी से कीजिए, वह शायद आपको अधिक गहराई से प्रभावित करेगी और नकारात्मक भावना कई दिनों तक आपके भीतर बनी रहेगी।

 
नकारे जाने पर महसूस होने वाला अपमान, सराहना से होने वाली खुशी पर भारी क्यों पड़ जाता है, इस बारे में 2002 के नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री डेनियल कानमैन का एक अध्ययन है। इस अध्ययन में प्रतिभागियों को 50 डॉलर की रकम गंवाने या इतनी ही रकम पाने की कल्पना करने को कहा गया। हालांकि राशि समान है लेकिन पैसा गंवाने की कल्पना करने वालों में भावनात्मक प्रतिक्रिया कहीं तगड़ी रही। दूसरे शब्दों में कहें तो कुछ गंवा देने की नकारात्मकता कुछ हासिल करने की अच्छाई से कहीं ज्यादा होती है। शोध पत्रों ने दिखाया है कि नकारात्मकता हमारे लिए ज्यादा मायने रखती है और सकारात्मकता की तुलना में हमारा ध्यान ज्यादा आकर्षित करती है। 
 
यह सब हमारे मस्तिष्क के एक हिस्से की वजह से होता है जिसका नाम प्रमस्तिष्क खंड है। तंत्रिका मनोविज्ञानी रिक हैंसन ने यह बताया है कि प्रमस्तिष्कखंड नकारात्मकता का पता लगाने में अपने दो-तिहाई न्यूरॉन का इस्तेमाल करता है और उसे दीर्घावधि की स्मृति में दर्ज कर देता है। यानी हमारी भावनाओं का दो तिहाई हिस्सा इस तैयार हुआ है जो प्रमुख तौर पर नकारात्मकता पर ध्यान देता है। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय द्वारा लोगों की डायरियों पर किया गया अध्ययन बताता है कि किसी झटके का नकारात्मक असर, किसी सकारात्मक घटना के असर की तुलना में दोगुना प्रभावी होता है। 
 
बड़ी कंपनियां यह बात जानती हैं। यही कारण है कि वे अपने कार्यस्थल को खुशनुमा बनाने में बहुत अधिक समय और पैसे का निवेश करती हैं। कर्मचारी अपने कार्यस्थल से जुड़ाव महसूस करते हैं और उनका प्रदर्शन भी अच्छा रहता है। कई लोग कहते हैं कि सकारात्मक सोच हमारे मस्तिष्क के नकारात्मक पूर्वग्रह से लडऩे में मदद करता है। यानी अगर आपके पास पहले से जो कुछ है उसे लेकर आपके मन में सराहना का भाव है तो आप जीवन में आगे खुश रह सकते हैं। यह बात कहने में तो आसान है लेकिन प्रबंधक कहते हैं कि इसका क्रियान्वयन करना कतई आसान नहीं है। उदाहरण के लिए विशेषज्ञ कहते हैं कि हमें पांच मिनट तक अपनी श्वास पर ध्यान देना चाहिए लेकिन ऐसा करना बहुत मुश्किल है क्योंकि हमारा मस्तिष्क तमाम चीजों की ओर भटकेगा।
 
यानी सकारात्मक विचार को लेकर भाषण देने के बजाय बड़ी कंपनियां सकारात्मकता को व्यवहार में लाती हैं। यह एक तरह की मनोवैज्ञानिक कवायद है जो हमें बताती है कि कुछ करके प्रसन्नता कैसे अर्जित की जाए। उदाहरण के लिए वे 50 दंड-बैठक या आधे घंटे की जॉगिंग का मनोवैज्ञानिक समतुल्य। इन कंपनियों के मानव संसाधन प्रबंधक भी जानते हैं कि यदाकदा के सकारात्मक अनुभव हमारे मस्तिष्क पर इतना प्रभाव नहीं डालते कि हम नकारात्मकता से जूझ सकें। खुश रहने के लिए छिटपुट सकारात्मक अनुभव लगातार मिलते रहने चाहिए।
 
यही कारण है कि बड़ी कंपनियां छोटी-छोटी जीत का भी जश्न मनाती हैं। उन्हें पता होता है कि छोटी से छोटी उपलब्धि को मान्यता देने से कर्मचारियों के दिलोदिमाग में खुशी बढ़ती जाती है। भविष्य में जब कभी वे निराश होते हैं तो यही छोटी-छोटी खुशियां उनके काम आती हैं। नेतृत्वकर्ताओं को जानना चाहिए कि केवल कर्मचारियों की कमियों या कमजोरियों की ओर संकेत करना नुकसानदेह हो सकता है। हर बार जब वे अपने आसपास मौजूद लोगों की मजबूती की सराहना करते हैं तो न केवल उनका उत्साह बढ़ाते हैं बल्कि इससे उनका भी उत्साहवर्धन होता है। वे अपनी टीम के साथ बातचीत में अक्सर ऐसे सवाल करते हैं जो उन्हें सशक्त बनाते हैं। मिसाल के तौर पर यह पूछा जाना कि हम इस विचार पर कैसे आगे बढ़ सकते हैं, हमेशा यह पूछने से बेहतर होता है कि अमुक विचार को लागू करने में क्या दिक्कतें आ सकती हैं? नकारात्मक विचार से निपटने का सबसे बेहतर तरीका है निरंतर संवाद करते रहना। किसी तरह की सराहना करने वाला संदेश या ईमेल भेजते रहना बेहतर है लेकिन फोन करने या कर्मचारियों के पास जाकर उनसे सीधे बात करने का कोई विकल्प नहीं है। एलनॉर रूजवेल्ट की मशहूर उक्ति है कि आपकी सहमति के बिना कोई आपको कमतर महसूस नहीं करा सकता। जो कंपनियां अपने कर्मचारियों का ध्यान रखती हैं वे उन्हें सिखाती हैं कि वे खुद को कमतर न महसूस करें। दिमाग में कोई नकारात्मकता इसे पराजित नहीं कर सकती।
Keyword: company, employee,,
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