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तनावग्रस्त वित्तीय परिसंपत्ति की समस्या का हल

अजय शाह /  October 09, 2019

विफल होने वाले बैंकों, बीमा कंपनियों और महत्त्वपूर्ण वित्तीय फर्म के लिए निस्तारण की आवश्यकता पर बल दे रहे हैं अजय शाह

 
तनावग्रस्त वित्तीय परिसंपत्तियों का निस्तारण मौजूदा आर्थिक नीति के समक्ष एक प्रमुख गतिरोध है। यदि किसी वित्तीय कंपनी ने आम परिवारों से कोई गहरा वादा नहीं किया हो तो ऐसी कंपनियों का निस्तारण किसी भी तरह गैर वित्तीय कंपनियों के निस्तारण से अलग नहीं है। एनबीएफसी जैसी वित्तीय कंपनियों के निस्तारण के लिए तो ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) ही सही तरीका है। एक विशिष्ट सांविधिक वित्तीय निस्तारण निगम सीमित समस्याओं को हल कर सकता है जबकि सिर्फ आईबीसी का प्रदर्शन कमजोर रहेगा। 
 
वर्ष 2011 के बाद से देश की एक प्रमुख समस्या रही है तनावग्रस्त परिसंपत्तियां। जब कोई कंपनी अपने आप को सीमित कर लेती है तो सामान्य कारोबारी गतिविधियां रुक जाती हैं। इसका अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर होता है। जब ऐसी आशंका बलवती होती है कि कर्जदार पैसे गंवा बैठेंगे तो ऋण बाजार में भी ठहराव आ जाता है। बाजार आधारित हर अर्थव्यवस्था में किफायती निस्तारण आवश्यक है। भारत ने यह शुरुआत सन 2016 में आईबीसी के गठन के साथ की थी। उस वक्त आईबीसी में गैर वित्तीय कंपनियां शामिल थीं। 
 
आईएलऐंडएफएस या दीवान हाउसिंग जैसी तनावग्रस्त एनबीएफसी पर विचार करते हैं। इन कंपनियों ने पेशेवर संस्थानों से ऋण लिया था। उन पर आम परिवारों की कोई उधारी नहीं थी। इनमें से कोई संस्थान व्यवस्थागत दृष्टि से अहम नहीं है। एक मोटे नियम के तौर पर व्यवस्थागत दृष्टि से महत्त्वपूर्ण किसी भी संस्थान की बैलेंस शीट जीडीपी के कम से कम 2 फीसदी के बराबर होनी चाहिए। आज के भारत में इसके लिए बैलेंस शीट का आकार करीब 4 लाख रुपये होना चाहिए। एचडीएफसी व्यवस्थागत रूप से अहम है लेकिन आईएलऐंडएफएस अथवा दीवान हाउसिंग के साथ ऐसा नहीं है।
 
इन परिस्थितियों में विशुद्ध आईबीसी को अपनाना कारगर होगा। जब कोई एनबीएफसी पहली बार डिफॉल्ट करेगी तो उसका कोई एक ऋणदाता एनसीएलटी के पास जा सकता है और कंपनी का नियंत्रण ऋणदाताओं की समिति के पास आ जाएगा। ऋणदाताओं की समिति का गठन एनबीएफसी को कर्ज देने वाले बैंकों, म्युचुअल फंड और अन्य पेशेवर ऋणदाताओं में से किया जाएगा। ऋणदाताओं की समिति ही यह विचार करेगी कि उसके हित में क्या है: पूरी फर्म को बेचना, पहले कुछ हिस्से बेचकर नकदी जुटाना, कर्ज का पुनर्गठन करना या नकदीकरण करना। ऋणदाताओं की समिति के पास यह अधिकार है कि वह समस्या को हल करे। दिवालिया प्रक्रिया से होने वाला नुकसान इन पेशेवरों पर आयद होगा। डिफॉल्ट के एक वर्ष के भीतर हम समस्या को पीछे छोड़ सकते हैं।
 
फिलहाल निस्तारण ढांचे की अनुपस्थिति में ऋणदाता अनिश्चितता के शिकार रहते हैं। प्रवर्तक वह प्राथमिकता तय करता है जिसके आधार पर ऋणदाताओं को भुगतान किया जाता है। इसके विपरीत आईबीसी ऐसे अनुमानित नियम प्रस्तुत करती है जिनके माध्यम से निस्तारण को अंजाम दिया जाएगा। बिना आईबीसी के प्रत्येक ऋणदाता अपना पैसा निकालना चाहेगा और एनबीएफसी के निस्तारण के बारे में नहीं सोचेगा। अगर किसी ऋणदाता का अपना पैसा निकल रहा है तो वह एनबीएफसी के गलत कदमों को भी सही ठहराएगा। 
 
आईबीसी के अधीन तमाम ऋणदाता अपनी साझा समस्या को लेकर एक निस्तारण के लिए बातचीत करेंगे। ऐसे में तमाम ऋणदाताओं की ऊर्जा बेहतर से बेहतर निस्तारण योजना की तलाश में लगेगी। यह खुशनुमा तस्वीर उस समय भंग हो जाती है जब आम परिवार भी परिदृश्य में होते हैं। खासकर बैंकों के मामले में। बैंक जमाकर्ता एनबीएफसी ऋणदाताओं की तुलना में विशिष्ट स्थिति में होते हैं जहां वे अपना पैसा कभी भी वापस निकाल सकते हैं। बैंकों के लिए आईबीसी का इस्तेमाल दो स्तरों पर गड़बड़ होता है। पहला, इससे जमाकर्ता की दिक्कत बढ़ती है और वह संकट का पहला संकेत मिलते ही अपना पैसा बाहर निकालने के बारे में सोचता है। दूसरा, ऋणदाता समिति में बड़ी तादाद में लोगों को देखते हुए बातचीत का आयोजन मुश्किल होता है।
 
इसके लिए एक विशिष्ट निस्तारण निगम की आवश्यकता होगी जो तनावग्रस्त वित्तीय फर्म पर पूरा नियंत्रण करे। ऐसे निस्तारण निगम की तीन विशिष्ट विशेषताएं हैं। पहली बात, यह सक्रियता से काम करेगी और शुद्घ परिसंपत्ति मूल्य के नकारात्मक होने के पहले ही कदम उठाएगी। दूसरा, यह आईबीसी प्रक्रिया की तुलना में कहीं अधिक तेजी से कदम उठाएगी क्योंकि ऋणदाताओं के बीच लंबी बातचीत की आवश्यकता नहीं होगी। तीसरा, यह आम परिवारों को जमा बीमा मुहैया कराएगा या उन्हें किसी नए बीमा प्रदाता की सेवा देगा।
 
ऐसा सांविधिक वित्तीय निस्तारण निगम एफएसएलआरसी के डिजाइन का हिस्सा थी जो आईबीसी के पहले आई थी। अब जबकि आईबीसी आ चुकी है तो हमें निस्तारण निगम की सीमित भूमिका पर गौर करना होगा। बैंकों, बीमा कंपनियों और व्यवस्थागत दृष्टि से अहम कंपनियों मसलन एचडीएफसी आदि की नाकामी के लिए निस्तारण निगम पर ध्यान देना होगा। यह आईएलऐंडएफएस जैसी सामान्य एनबीएफसी पर लागू नहीं होता जहां केवल आईबीसी पर्याप्त हो। निस्तारण निगमों की स्थापना का प्रयास एफआरडीआई बिल के माध्यम से किया गया जिसे समाप्त कर दिया गया। यह एक अहम नीतिगत प्राथमिकता बना हुआ है और इसे बढ़ावा दिया जाना चाहिए। लेकिन हमें इस राह की सीमाओं को भी समझना होगा। निस्तारण निगम एक नई सरकारी अफसरशाही की तरह होगा। देश की अधिकांश सरकारी एजेंसियां खराब तरीके से काम करती हैं। इसके अलावा सरकारी प्रशासन की व्यापक विफलता भी इसे प्रभावित करेगी।
 
निस्तारण निगम के पास एक उल्लेखनीय अधिकार है: वह बैंक के डिफॉल्ट होने के पहले निस्तारण प्रक्रिया शुरू कर सकता है। इसका दुरुपयोग रोकने के लिए हमें व्यापक पैमाने पर जांचपरख और संतुलन कायम करना होगा। निस्तारण निगम के अधिकारियों के लिए वित्तीय फर्म में उस वक्त हस्तक्षेप करना आसान नहीं होगा क्योंकि इस वक्त उपयुक्त हल तलाशना मुश्किल होगा। बेहतर परियोजना प्रबंधन के अधीन इसे अपनी जमीन तैयार करने में कम से कम तीन वर्ष लगेंगे। लब्बोलुआब यह कि एचडीएफसी जैसी महत्त्वपूर्ण वित्तीय फर्म अथवा बैंकों या बीमा कंपनियों के निस्तारण के रूप में दो तरह की दिक्कतों के निवारण के क्रम में निस्तारण निगम से दूरी नहीं बनाई जा सकती। यह प्रक्रिया एक वर्ष की नहीं है। इसमें समय लगेगा और इसे यथाशीघ्र आरंभ किया जाना चाहिए। परंतु तमाम अन्य वित्तीय फर्म के लिए उन कर्जदारों का हित निस्तारण निगम की अफसरशाही की तुलना में बेहतर काम करेगा जो ऋणदाताओं की समिति से बातचीत करेंगे। हमें आईबीसी का बेहतर कामकाज सुनिश्चित करने के लिए और प्रयास करने होंगे। इस क्रम में कई श्रेणियों के वित्तीय निस्तारण को इसके जरिये अंजाम देना होगा। 
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