बिजनेस स्टैंडर्ड - प्रदूषण की चुनौती
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प्रदूषण की चुनौती

संपादकीय /  October 09, 2019

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने कानपुर में चमड़ा कारखानों को बंद करने का आदेश दिया है। अगस्त में यूपीपीसीबी ने 126 चमड़ा कारखानों को 50 फीसदी क्षमता के साथ काम करने की मंजूरी दी थी बशर्ते कि वे प्रदूषण मानकों का पालन करें। परंतु राष्ट्रीय हरित पंचाट की गंगा निगरानी शाखा ने कहा है कि कानपुर के जाजमऊ औद्योगिक क्षेत्र में स्थित चमड़ा कारखानों से निकले प्रदूषक तत्त्व गंगा में मिल रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप इन कारखानों को इस माह के अंत तक बंद रखने का आदेश दिया गया है। कानपुर का चमड़ा उद्योग करीब 12,000 करोड़ रुपये का है। इसमें से करीब 50 फीसदी मूल्य का माल निर्यात किया जाता है। यह उद्योग करीब 10 लाख लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध कराता है। दिलचस्प बात यह है कि प्रदूषित जल के उपचार संयंत्रों का संचालन सरकारी संस्था जल निगम करता है, न कि चमड़ा कारखाने। जल निगम ने अपनी प्रतिबद्धता नहीं निभाई और उसने सुधार के लिए और अधिक वक्त मांगा है लेकिन इसका खमियाजा कारखानों को भुगतना पड़ रहा है।

 
व्यापक स्तर पर देखें तो यह घटना देश के समक्ष मौजूद तमाम आर्थिक और संचालन संबंधी चुनौतियों को उजागर करती है। ये चुनौतियां बढ़ते शहरीकरण और तेज विकास के प्रयास से उपजी हैं। बहरहाल, बाह्य कारकों का मुद्दा नया नहीं है और कानपुर के चमड़ा कारखानों के मामले में गंगा के प्रदूषण के व्यापक निहितार्थ हैं। अर्थशास्त्री ऐसी समस्याओं पर पिछले एक दशक से विमर्श कर रहे हैं। सबसे पहले ऐसा मुद्दा अल्फ्रेड मार्शल ने उठाया था और आर्थर पिगू ने उसे आगे बढ़ाया। पिगू ने अपनी पुस्तक द इकनॉमिक्स ऑफ वेलफेयर में (जो सन 1920 में प्रकाशित हुई थी) कहा, 'स्वहित राष्ट्रीय लाभांश में इजाफा करने वाला नहीं है, इसके परिणामस्वरूप सामान्य आर्थिक प्रक्रिया के साथ हस्तक्षेप के कुछ खास कदमों की अपेक्षा होनी चाहिए जो लाभांश को नुकसान नहीं पहुंचाएं बल्कि उसमें इजाफा करें।' पिगू ने हस्तक्षेप के तमाम तरीकों पर चर्चा की जिन्हें पिगूवियन कर के नाम से जाना जाता है। उदाहरण के लिए कार्बन कर ऐसे हस्तक्षेप का अच्छा उदाहरण है। बहरहाल, बाद के वर्षों में पिगूवियन कर की आलोचना होने लगी। मिसाल के तौर पर कहा गया कि यह सामाजिक लागत का आकलन करने में सक्षम नहीं है।
 
देश को औद्योगिक विकास और तेजी से हो रहे शहरीकरण के नकारात्मक प्रभाव से निपटना होगा। प्रदूषण से निपटने तथा पर्यावरण को हो रही हानि से निपटने के क्रम में हमेशा कर लगाना कारगर नहीं होता। उत्तर प्रदेश सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद सीवेज के पानी का बड़ा हिस्सा अभी भी गंगा में मिल रहा है। कानपुर के चमड़ा कारखानों के साथ यह मुद्दा भी दर्शाता है कि भारत को ऐसे मसलों से निपटने के लिए क्षमता विस्तार करना जरूरी है। चमड़ा कारखाने इसलिए बंद हुए क्योंकि सरकारी एजेंसी अपना काम ठीक से नहीं कर सकी। प्रदूषण से निपटने के लिए न केवल स्थानीय शासन की संस्थाओं को मजबूत करना होगा बल्कि विभिन्न एजेंसियों में तालमेल कायम करना होगा। भारत जैसे देश में हर जगह एक हल कारगर नहीं होगा इसलिए स्थानीय संस्थाओं को जोडऩा जरूरी है। सरकार को जरूरी निवेश करना चाहिए और स्थानीय स्तर पर पर्यावरण मानकों के पालन की निगरानी करनी चाहिए। कचरा प्रबंधन में निजी निवेश कारगर कदम हो सकता है। इससे लागत कम करने और नवाचार करने में मदद मिलेगी। प्रदूषण नियंत्रण की चुनौती आगे बढ़ेगी और सरकार को स्थायी वृद्धि और विकास सुनिश्चित करने के लिए कई स्तरों पर काम करना होगा। ऐसे में औद्योगिक इकाइयों को बंद करना कोई विकल्प नहीं बनना चाहिए। 
Keyword: uttar pradesh, UPPCB, pollution, lather,,
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